पाकिस्तान के पास इस हफ्ते जश्न मनाने का कारण था, क्योंकि यूरोप और अमेरिका (जहां कोरोना वायरस के मामले बढ़ रहे हैं और हजारों लोगों की मौत हुई है) के विपरीत पाकिस्तान में कोरोना संक्रमण के नए मामले पिछले दो हफ्ते में घटे हैं। इसे इमरान खान सरकार ने अपनी सफल कोविड-19 रणनीति का नतीजा बताया है। यह कमोबेश स्मार्ट लॉकडाउन से संबंधित है, जिसके तहत पांच अगस्त तक पूरा मुल्क बंद रहेगा, तब तक ईद और हज के समारोह खत्म हो जाएंगे।
सबसे बड़ी आबादी वाले पंजाब में कोरोना से किसी की मौत नहीं हुई है, अस्पताल अभी भरे नहीं हैं और वेंटिलेटर बेड की कोई मांग नहीं है। इस्लामाबाद, मुजफ्फराबाद और गिलगित बाल्टिस्तान में सामूहिक रूप से चार दिनों में 100 से कम मामले सामने आए हैं। संघीय योजना मंत्री असद उमर, जो कोरोना वायरस अभियान के मुखिया भी हैं, ने हाल में वेंटिलेटर और ऑक्सीजन सिलेंडर की आवश्यकता वाले रोगियों की संख्या में 28 फीसदी की कमी का दावा किया है। उन्होंने ट्वीट करके कहा कि यह सरकार की स्मार्ट लॉकडाउन नीति, मानक संचालन प्रक्रियाओं के प्रवर्तन और लोगों की सामूहिक प्रतिक्रिया के कारण हुआ।
लेकिन दिलचस्प बात यह है कि पाकिस्तान सरकार यह बिल्कुल नहीं बता सकती है कि कोरोना मामलों में इस गिरावट के पीछे असली कारण क्या है, खासकर जब दुनिया भर में मौत की दर बहुत अधिक है। इसका एकमात्र कारण यह बताया जा रहा है कि हॉटस्पॉट वाले क्षेत्रों में स्मार्ट लॉकडाउन लगाना महत्वपूर्ण रहा। इससे यह सुनिश्चित करने में मदद मिली कि वायरस का सामुदायिक प्रसार नहीं हुआ।
लेकिन स्वास्थ्य विशेषज्ञ सरकार के दावे पर संदेह कर रहे हैं और चेतावनी दे रहे हैं कि जीत की घोषणा करना अभी जल्दबाजी होगी। सरकार ने नए मामलों में कमी और रोगियों के लिए होम क्वारंटीन नीति का हवाला देकर उत्तर-पूर्वी लाहौर में कोरोना रोगियों के लिए एक हजार बिस्तर वाला अस्पताल बंद कर दिया। लेकिन सरकार को डर है कि ईद और मोहर्रम के दौरान लोगों के एक साथ घूमने के कारण एक बार फिर अस्पताल भर सकते हैं।
यही नहीं, बुधवार की रात को पाकिस्तान के लोगों को उस समय तगड़ा झटका लगा, जब उन्हें यह खबर मिली कि जो आदमी मुल्क के स्वास्थ्य मंत्रालय का नेतृत्व कर रहा था और जो कोरोना के खिलाफ जंग में दिन-रात काम कर रहा था, उसे प्रधानमंत्री ने इस्तीफा देने के लिए कहा है। डॉ. जफर मिर्जा को अप्रैल 2020 में राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवाओं, विनियमों और समन्वय का मंत्रालय सौंपा गया था और वह कोविड-19 महामारी की निगरानी में लगे थे।
इसकी पृष्ठभूमि में विपक्षी दलों की सरकार से उन गैर-निर्वाचित विशेष सहायकों के नाम की मांग थी, जिनके पास दोहरी नागरिकता थी। डॉ. जफर मिर्जा भी उनमें से एक थे। जफर मिर्जा दवाओं के आयात और हाल के दिनों में दवाओं की कीमतों में वृद्धि के मामले में भी जांच का सामना कर रहे थे। दिलचस्प बात यह है कि इन दिनों डॉ जफर मिर्जा खुद भी कोरोना संक्रमित पाए जाने के बाद अपना इलाज करा रहे थे।
अपने इस्तीफे की पुष्टि करते हुए उन्होंने कहा कि वह प्रधानमंत्री के व्यक्तिगत आमंत्रण पर डब्ल्यूएचओ छोड़कर आए थे। उन्होंने कहा कि ‘मैंने काफी मेहनत और ईमानदारी से काम किया। मैं इस बात से संतुष्ट हूं कि मैं उस वक्त पद छोड़ रहा हूं, जब पाकिस्तान में कोरोना के मामले घट रहे हैं।’
गुरुद्वारा सौंपाः इस बीच, पाकिस्तान के सिख समुदायों के लिए भी एक और अच्छी खबर है कि बलूचिस्तान की प्रांतीय सरकार ने 200 साल पुराना गुरुद्वारा समुदाय को सौंप दिया है। यह सब ऐसे समय हुआ है जब तुर्की में हाजिया सोफिया म्यूजियम को मस्जिद में बदला गया है जिससे अता तुर्क द्वारा बनाई गई तुर्की की धर्मनिरपेक्ष छवि को धक्का लगा है।
विभाजन के बाद गुरुद्वारा की प्राचीन इमारत को लड़कियों के सरकारी स्कूल में बदल दिया गया था। अल्पसंख्यक मामलों के प्रांतीय संसदीय सचिव धानेश कुमार ने कहा, सेंट्रल क्वेटा की मस्जिद रोड में स्थित ऐतिहासिक गुरुद्वारा श्री गुरु सिंह सभा को 73 वर्ष बाद बहाल कर दिया गया है। इससे पहले इसी वर्ष फरवरी में बलूचिस्तान की सरकार ने एक दो सौ साल पुराना मंदिर हिंदू अल्पसंख्यकों को सौंपा था। (लेखिका पाकिस्तान की वरिष्ठ पत्रकार हैं।)