अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण हूती बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य में समुद्री व्यापार को बाधित कर सकते हैं। यह लाल सागर के प्रवेश द्वार पर एक अहम ‘चोक पॉइंट’ है, जहां से समुद्री व्यापार का 12 से 15 प्रतिशत हिस्सा गुजरता है। लाल सागर के दूसरे छोर पर स्वेज नहर है, जो उत्तरी अमेरिकी व यूरोपीय बाजारों में जाने वाले तेल और तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) के लिए एक अहम मार्ग है। ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करने के कारण, हूती अब शक्तिशाली स्थिति में हैं। 2023 में शुरू हुए इस्राइल-गाजा युद्ध की शुरुआत में ही हूतियों ने सस्ते और कम-तकनीकी वाले उपकरणों, जैसे कि वन-वे अटैक ड्रोन, मिसाइल और बिना चालक वाले सतही जहाजों का इस्तेमाल करके लाल सागर में जहाजों पर हमले करके अपनी ताकत दिखा दी थी।
अब हाल ही में हूतियों ने लाल सागर में अपनी स्थिति और मजबूत की है। हूतियों ने रणनीतिक पेरिम (मयून) द्वीप पर कब्जा कर लिया, जबकि इससे एक दिन पहले वे महत्वपूर्ण मोखा बंदरगाह पर भी नियंत्रण कर चुके थे। इससे बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य में उनकी रणनीतिक पकड़ बढ़ी है। इसी बीच, हूतियों ने सऊदी अरब की राजधानी रियाद पर बैलिस्टिक मिसाइल और ड्रोन हमलों तथा यानबू स्थित तेल प्रतिष्ठान समेत अन्य ठिकानों को निशाना बनाने का भी दावा किया। इन घटनाओं से लाल सागर, बाब अल-मंदेब और सऊदी ऊर्जा ढांचे की सुरक्षा पर चिंता बढ़ी है। होर्मुज जलडमरूमध्य के लगभग बंद हो जाने के कारण, लाल सागर-स्वेज मार्ग और भी महत्वपूर्ण हो गया है।
खास बात यह है कि सऊदी अरब ने होर्मुज से बचने के लिए कच्चे तेल को पाइपलाइन के जरिये अपने पश्चिमी तट पर स्थित लाल सागर के यानबू बंदरगाह तक पहुंचाने की कोशिश की थी। हूतियों के नए हमलों ने इस विकल्प को बाधित कर दिया है। हूती अपने हितों को लेकर बेहद सजग हैं और अंतरराष्ट्रीय राजनीति को व्यावहारिक नजरिये से देखते हैं। संघर्ष में कब शामिल होना है और कब उसे बढ़ाना है, इसका फैसला वे काफी सोच-समझकर करते हैं। अगर होर्मुज के साथ बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य भी बंद होता है, तो इसके नतीजे गंभीर हो सकते हैं। जहां अमेरिका ईरान के साथ युद्ध को खत्म करने की कोशिश कर रहा है, वहीं हूती यमन में अपना युद्ध फिर से शुरू करने की धमकी दे रहे हैं। इससे सऊदी अरब के भी संघर्ष में उतरने, वैश्विक तेल व्यापार के प्रभावित होने और पूरे क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ने का खतरा है।
हूतियों से सीधे निपटे बिना क्षेत्रीय तनाव को कम करना मुश्किल होगा। यह मानना भी सही नहीं होगा कि ईरान से निपटने भर से इस समस्या का हल हो जाएगा। यह उम्मीद भी नहीं करनी चाहिए कि ईरान के साथ कोई समझौता हूतियों के अगले कदमों को नियंत्रित कर सकेगा। इसलिए, वैश्विक समुदाय को हूतियों को ऐसे व्यावहारिक, पर घातक पक्ष के रूप में देखना चाहिए, जो अपने हितों को ध्यान में रखकर फैसले लेता है।