देश की चिंता में दुबले हुए काजियों ने बिहार में मोदी का रथ रोकने की कवायद तो बहुत पहले शुरू कर दी है, लेकिन क्या वे सफल भी होंगे? पहले तो वे एकजुट होने में ही शर्माते हैं। उन्हें लगता है कि दूसरे के साथ मिलेंगे, तो अपना कुछ घट जाएगा। रथ रोकने में खुद अपनी जमीन छिन गई तो? इस उधेड़बुन में छह दलों का छकड़ा भी तो नहीं बन पाया। लेकिन इन सबसे बेपरवाह नीतीश जी ने हर घर में दस्तक देना शुरू कर दिया है इस उम्मीद में कि दरवाजा खुलेगा, और चुनाव में वोट उन्हीं के पाले में गिरेगा। नीतीश जी के बगल में बैठे लालू जी मुस्करा रहे हैं कि चुनाव से पहले ही 'सांप्रदायिक राजनीति' परास्त हुई। लेकिन असली हंसी तो चुनाव के बाद देखी जाएगी।
कल्पना कर सकते हैं कि यदि छह दलों का छकड़ा बन जाता, तो उसमें कितने पहिए होते? उसका कोचवान या ड्राइवर किसे चुना जाता? छकड़े का पारिवारिक झंडा कैसा-क्या होता? चुनाव चिह्नों का बहुरंगी कोलाज मूर्तिमान करके चुनाव आयोग से कैसे पास कराया जाता? सब दलपति तो परिवार वाले हैं। उनके पुत्र-पुत्रियां-बहुएं-चाचा-भतीजे तथा पत्नियां हैं। इन रिश्तों को किस-किस रंग में समाहित किया जाता? इसलिए फिलवक्त तो बिहार में विहार कर लें। चुनाव तक हालात देखकर जुट लेंगे।
अगर यह छकड़ा बन जाता और चुनाव जीत जाता, तब भी पता नहीं, छकड़े का पहिया कौन किस दिशा में ले जाने की कोशिश करता।
उधर बूढ़ी कांग्रेस की मौके पर 'हाथ' खींच लेने की गिराऊ शैली का क्या भरोसा? बावजूद इस आशंका के कांग्रेस ने डोरे तो डाल दिए। कुछ पदलोलुप बिदक गए। मोदी का रथ रोकने में केजरीनंदन महागठबंधन बल-बुद्धि-विद्या तो दिलाएगा ही, अगली-पिछली हारों का अपार क्लेश भी हरेगा। हम तो समझ रहे थे कि छह दलों का ऐसा छकड़ा एक मिथक का रूप धर लेता, जैसे षड्कोण, षडरस, षड्ऋतु, षड्यंत्र, षडराग! पर हाय, ऐसा हो न पाया। अब जो होगा, वह तो बिहार में चुनाव का नतीजा ही बताएगा। तब तक दिल थामकर बैठें।