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मुद्दा: श्रम न्यायालयों से न्याय की आशा- श्रमिकों के लिए राह आसान बनाने के बजाय देरी का प्रतीक बन गईं अदालतें

रवि श्रीवास्तव Published by: Pavan Updated Thu, 26 Mar 2026 06:16 AM IST

सार

उत्तर प्रदेश में कामकाजी श्रमिकों की संख्या करोड़ों में है। किसी श्रमिक का अपने मालिकान/सेवायोजक से विवाद होता है, तो सबसे पहले वह श्रम कार्यालय में अपना दावा प्रस्तुत करता है। सामान्यतः विवाद का निस्तारण तीन माह के अंदर हो जाना चाहिए। लेकिन ऐसा न होने पर वह टूट-सा जाता है।
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला


इस अधिनियम के अंतर्गत श्रम न्यायालय और औद्योगिक न्यायाधिकरण में पीठासीन अधिकारियों की नियुक्तियों के विषय में एक उच्च स्तरीय समिति के गठन का प्रावधान किया गया। वहीं औद्योगिक न्यायाधिकरणों/श्रम न्यायालयों में पीठासीन अधिकारियों की नियुक्ति हेतु जो पात्रता की शर्तें रखी गई हैं, उनमें सेवारत/सेवानिवृत्त उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों/उच्चतर न्यायिक सेवा व राज्य न्यायिक सेवा के अधिकारीगण/भारतीय प्रशासनिक सेवा/श्रम सेवा के अधिकारीगण या राज्य सिविल सर्विस के अधिकारी चयन हेतु पात्र होते हैं। पीठासीन अधिकारियों की नियुक्ति तीन वर्ष के लिए या 65 वर्ष की आयु पूर्ण होने की तिथि (जो भी पहले हो) तक के लिए की जाती है।


उत्तर प्रदेश में कुल 20 श्रम न्यायालयों की स्थापना की गई है, जबकि छह औद्योगिक न्यायाधिकरण स्थापित किए गए हैं। इनके गठन का प्रमुख उद्देश्य श्रमिकों को सस्ता, सुलभ और त्वरित न्याय प्रदान करना है। लेकिन वास्तविकता में ये अदालतें श्रमिकों के लिए न्याय की राह आसान बनाने के बजाय देरी का प्रतीक बन गई हैं। लाख कोशिशों के बावजूद वादों के निस्तारण में कोई सुधार नहीं दिख रहा है। वादों के निस्तारण में 10-12 वर्ष का समय लग रहा है। इसकी अनेक वजहें हैं।


इन श्रम न्यायालयों अथवा न्यायाधिकरणों में पीठासीन अधिकारियों की बेहद कमी है, जबकि कई अवसरों पर उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को यह निर्देश दिया है कि किसी भी श्रम न्यायालय अथवा औद्योगिक न्यायाधिकरणों में पीठासीन अधिकारी का पद एक भी दिन के लिए रिक्त नहीं रखा जाएगा। पिछले कुछ वर्षों में यह देखने में आया है कि उत्तर प्रदेश के पीठासीन अधिकारियों की नियुक्ति अन्य आयोगों और ट्रिब्यूनल में भी हो गई। इसका परिणाम यह हुआ कि इन पीठासीन अधिकारियों की प्राथमिकता बदल गई।


श्रम कानून अन्य कानूनों से थोड़ा अलग है। श्रम वादों के निस्तारण की प्रक्रिया में कई चरण होते हैं। प्रशासनिक/न्यायिक सेवा से जो अधिकारी पीठासीन अधिकारी के रूप में आते हैं, वे सामान्यतः उम्र के अंतिम पड़ाव, अर्थात 60 वर्ष की आयु पूर्ण करने के बाद आते हैं। शासन की मंशा स्पष्ट है कि इनकी विद्वता और अनुभवों का लाभ उठाते हुए श्रम वादों का निस्तारण कराया जाए। लेकिन उन्हें एक से दो वर्ष का समय श्रम वादों को समझने में लग जाता है। जब तक वादों को समझते हैं, तब तक उनका कार्यकाल पूरा होने का समय आ जाता है। नतीजतन, लंबित मामलों का ढेर लग जाता है। इसके अलावा, शासन द्वारा ऐसा कोई तंत्र विकसित नहीं किया गया है कि संलग्न तंत्र में निर्णय लेने की क्षमता का विकास हो सके। इसके लिए शासन स्तर पर निरंतर योजनाबद्ध नीतिगत प्रयास व नियमित अनुश्रवण की व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिए। प्रदेश में न्यायिक प्रशासनिक/श्रम सेवा में कार्य करने वाले अधिकारियों की कमी नहीं है। इसलिए इन न्यायालयों में ऐसे अधिकारियों की ही नियुक्ति की जाए, जिन्हें श्रम वादों के निस्तारण में व्यापक अनुभव हो, ताकि वे गुणवत्तापूर्ण निर्णय समयसीमा में दे सकें।


श्रम न्यायालयों/औद्योगिक न्यायाधिकरणों में पीठासीन अधिकारियों के चयन से संबंधित भर्ती का विज्ञापन नहीं दिया जाता या आवेदन सार्वजनिक रूप से आमंत्रित नहीं किए जाते। इसके अलावा, इन न्यायालयों का इन्फ्रास्ट्रक्चर भी आधुनिक बनाए जाने की आवश्यकता है। अभिलेखों के उचित रखरखाव की पर्याप्त व्यवस्था किए जाने के साथ-साथ नियमित कर्मचारियों की स्थायी भर्ती की जानी चाहिए। पीठासीन अधिकारियों को न्यायिक प्रक्रिया/निर्णय दिए जाने हेतु समय-समय पर अद्यतन श्रम वादों से अवगत होने के संबंध में अनिवार्य प्रशिक्षण दिए जाने चाहिए एवं उनके निर्णयों की गुणवत्ता के न्यायिक परीक्षण की व्यवस्था की जानी चाहिए। वादों के निस्तारण हेतु शासन स्तर से एक समयबद्ध प्रक्रिया बनाई जाए। संचार क्रांति के युग में जब ई-कोर्ट और श्रम न्याय सेतु पोर्टल विकसित किए जा चुके हैं, तो ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि श्रमिक/सेवायोजक को वादों की अद्यतन जानकारी एक दिन पूर्व मिल सके।
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