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घर खरीदने के सपनों में सेंध: कंपनियों को दिवालिया घोषित कर रहे बिल्डर, कानून का सख्त डंडा चले... तभी सही इंसाफ

विराग गुप्ता
Updated Fri, 21 Mar 2025 04:22 AM IST

सार

फर्जीवाड़े से अनेक बिल्डर खुद मालामाल होकर कंपनियों को दिवालिया घोषित कर रहे हैं। ऐसे बिल्डरों की निजी संपत्तियों को जब्त करके अधूरे प्रोजेक्ट्स पूरे किए जाएं। इसके अलावा, भ्रष्ट अधिकारियों व बिल्डरों के खिलाफ कानून का सख्त डंडा चले, तो खरीदारों को सही मायने में न्याय के साथ घर भी जल्द मिलेगा। 
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रीयल एस्टेड सेक्टर - फोटो : amarujala.com


सिस्टम से हताश और मुकदमेबाजी से परेशान घर खरीदारों की समस्याओं का मूल कारण समझकर ही उनका निवारण हो सकता है। दो साल पहले गठित अमिताभ कांत कमेटी की रिपोर्ट में रियल एस्टेट प्रोजेक्ट्स से जुड़े सभी पक्षकारों का विवरण शामिल है। इंडियन बैंक एसोसिएशन के अनुसार, पूरे देश में फंसे हुए दो तिहाई से ज्यादा प्रोजेक्ट एनसीआर और मुंबई मेट्रोपोलिटन क्षेत्र में हैं। सीएजी की पुरानी रिपोर्ट में नोएडा में बिल्डर, अफसर और नेताओं के गठजोड़ का विस्तार से खुलासा है। उसके अनुसार, वर्ष 2005 से 2018 के बीच सिर्फ तीन बिल्डरों को 80 फीसदी वाणिज्यिक प्लॉट का आवंटन हुआ था। उन कंपनियों से 14,958 करोड़ रुपये से ज्यादा का बकाया वसूलने में नोएडा के अधिकारी विफल रहे। उनमें से एक कंपनी के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के जजों ने ईडी की जांच कराने की बात कही है।


अफसरों और बिल्डरों के भ्रष्ट गठजोड़ के और भी कई आयाम हैं। ग्रेटर नोएडा के अधिकारियों ने कॉलोनाइजरों के साथ मिलकर तीन गांवों में 2,000 करोड़ रुपये की जमीन पर अवैध कॉलोनी और विला बनवा दिए। भ्रष्टाचार की भेंट चढ़े ऐसे प्रोजेक्ट्स में अफसर और बिल्डर मलाई हजम करके निरीह जनता को अदालतों के चक्कर काटने के लिए अभिशप्त कर देते हैं। घर खरीदारों की याचिका के अनुसार, डेवलपर्स की देरी के चलते उन्हें फ्लैट का कब्जा नहीं मिला, लेकिन ईएमआई के भुगतान के लिए बैंक उन्हें मजबूर कर रहे हैं। बैंकों के वकील के दावे के अनुसार, दिवालिया हो रहे बिल्डरों के लिए बैंकों की जवाबदेही नहीं है। इस पर जजों ने सवाल पूछा कि साइट पर एक ईंट भी नहीं, तो फिर बैंकों ने 60 फीसदी लोन कैसे दे दिया। इस पूरे मामले की तह में जाने पर घर खरीदारों के साथ देश के खजाने को लग रही चपत को समझा जा सकता है।


वित्त मंत्री द्वारा संसद में दी गई जानकारी के अनुसार, पिछले 10 वर्षों में 16.35 लाख करोड़ रुपये का कर्ज बट्टे खाते में डाला गया है। नेशनल हाउसिंग बैंक की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, देश में 33.53 लाख करोड़ रुपये का हाउसिंग लोन है, जो जीडीपी का 11.25 फीसदी है। सभी बिल्डर गलत या दागी नहीं हैं। उनमें से कई लोग सिस्टम की वजह से प्रोजेक्ट को सही वक्त पर पूरा करने में नाकाम हो रहे हैं। कोरोना और लॉकडाउन, किसान आंदोलन, बैंकों का पठानी ब्याज और सुस्त नौकरशाही की वजह से प्रोजेक्ट के अप्रूवल और मास्टर प्लान में विलंब, इसके कारण रहे हैं। अमिताभ कांत कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार, रियल एस्टेट सेक्टर की समस्याओं के समाधान के लिए केंद्र सरकार को राज्यों के साथ पहल करने की जरूरत है, जिससे कि घर खरीदारों को बेवजह की मुकदमेबाजी का सामना न करना पड़े।


सुप्रीम कोर्ट की एक अन्य बेंच ने कहा है कि अधूरे प्रोजेक्ट्स को रिवाइव करने में ग्रेटर नोएडा अथॉरिटी साथ दे। अधूरे प्रोजेक्ट्स में घर खरीदारों को कब्जा और घर का रजिस्ट्रेशन कैसे मिले, इस बारे में एनक्लैट और सुप्रीम कोर्ट के अनेक फैसले हैं। सुप्रीम कोर्ट से घर खरीदारों को जल्द न्याय मिले, इसके लिए तीन मुद्दों को बारीकी से समझना जरूरी है। पहला-सुप्रीम कोर्ट के आदेश की आड़ में जांच को कैसे भटकाया जा सकता है, इसकी बानगी 23 जनवरी, 2025 के आदेश से मिलती है। उसके अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के आदेश से गठित एसआईटी के अधिकारी जांच की आड़ में मुआवजा पाने वाले भू-स्वामियों को ही धमका रहे हैं। इसलिए नई एसआईटी में उत्तर प्रदेश से बाहर के आईपीएस अधिकारियों को रखा गया है। लेकिन पुराने अनुभवों से साफ है कि एसआईटी या सीबीआई जांच से मीडिया की सुर्खियां भले ही बढ़ जाएं, लेकिन लोगों को जल्द न्याय मिलना मुश्किल है।


दूसरा-किसी एक प्रोजेक्ट में ग्राहकों के हितों को सुरक्षित करने के साथ दूसरे प्रोजेक्ट्स से जुड़े उन लोगों का ध्यान रखना भी जरूरी है, जो सुप्रीम कोर्ट में मुकदमा लड़ने की हैसियत नहीं रखते। इसलिए सुप्रीम कोर्ट के आदेशों से देश के सभी पीड़ित घर खरीदारों को न्याय मिलना चाहिए। तीसरा-आवास जनता का मौलिक अधिकार है, इसलिए ग्रीन बेंच की तर्ज पर घर खरीदारों के लिए सुप्रीम कोर्ट में विशेष बेंच का गठन होना चाहिए। एक अन्य मामले में जजों ने कहा है कि जब तक अधिकारियों के ऊपर कंटेंप्ट कार्रवाई नहीं हो, तब तक अदालतों के फैसलों का पालन नहीं होता। इसलिए अमिताभ कांत कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार, नियमों का उल्लंघन करने वाले दोषी बिल्डरों और अधिकारियों को सुप्रीम कोर्ट से कठोर दंड मिलना चाहिए।


नोएडा और ग्रेटर नोएडा की सरकारी अथॉरिटी में ग्राहकों के साथ हो रही ठगी को रोकने के लिए सरकार को सख्त कदम उठाने की जरूरत है। फर्जीवाड़े से अनेक बिल्डर सरकार और ग्राहकों का पैसा हवाला से ट्रांसफर करके खुद मालामाल होकर कंपनियों को दिवालिया घोषित कर रहे हैं। ऐसे बिल्डरों की निजी संपत्तियों को जब्त करके अधूरे प्रोजेक्ट्स का वित्त पोषण होना चाहिए। जिन भ्रष्ट अधिकारियों की मिलीभगत से लाखों परिवारों के घर के सपने बिखर गए हैं, उनकी पेंशन को रोकने के साथ संपत्तियों का सरकार अधिग्रहण करे। भ्रष्ट अधिकारियों और बिल्डरों के खिलाफ कानून का सख्त डंडा चले, तो घर खरीदारों को सही मायने में न्याय के साथ घर भी जल्द मिलेगा। 

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