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मुद्दा: किसी को बधाई, किसी को जहर... सरकार को जल्द कदम उठाने होंगे, वातावरण जहरीला होने का खतरा

विवेक एस अग्रवाल
Updated Tue, 15 Oct 2024 02:59 AM IST

सार

बधाई या आभार जताने वाले होर्डिंग खतरनाक तत्वों से बने होते हैं। फिर कूड़े के ढेर में पहुंचकर ये हवा को बहुत ज्यादा जहरीला बना देते हैं।
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घाटकोपर होर्डिंग हादसा (फाइल) - फोटो : पीटीआई


यों तो हर राज्य और शहर के लिए विज्ञापन संबंधी नियम-कायदे बने हुए हैं, जो निर्धारित स्थलों के अतिरिक्त कहीं पर भी प्रदर्शित विज्ञापन सामग्री को प्रतिबंधित करते हैं, किंतु अनाधिकृत प्रदर्शित विज्ञापन सामग्री पर यदा-कदा ही कार्रवाई हो पाती है।


इस प्रकार के बधाई संदेशों का चलन इतना बढ़ गया है कि इन्हें सार्वजनिक उत्पात की श्रेणी में रखा जाना चाहिए। अधिक से अधिक व्यक्तियों की दृष्टि में आने की लालसा में ये विज्ञापन होर्डिंग्स सड़क हादसों के लिए भी अनेक बार उत्तरदायी होते हैं। साथ ही सार्वजनिक स्थल पर गंदगी भी एकत्रित करते हैं। बढ़ते प्रदर्शन के दौर में जन्मदिन, बधाई, शुभकामना, आभार आदि संबंधी छोटे-बड़े होर्डिंग बेशुमार मात्रा में लगाए जाते हैं, जिनसे संबंधित व्यक्ति अपनी शक्ति का प्रदर्शन करता है, बिना यह जाने कि उस संदेश को विज्ञापित करने वाली सामग्री कितनी जहरीली है। इन सामग्रियों के संपूर्ण वातावरण पर दूरगामी प्रभाव होते हैं। प्रयुक्त सामग्री का किसी भी प्रकार से पुनः उपयोग नहीं हो पाता है और उसका जहां भी निष्पादन होता हैं, वहां वह वायु प्रदूषण की प्रमुख वजह बन जाती है।


पिछले दिनों दशहरे पर हमने देखा कि आजकल लग रहे बधाई पट्ट रावण जैसे पुतले बनाने में सबसे अधिक इस्तेमाल किए जाते हैं। कहीं बढ़ते रावण पुतला निर्माण में बढ़ते बधाई संदेश ही तो मददगार नहीं हैं? वैसे भी प्रयुक्त किया जाने वाला पीवीसी सामग्री रावण जैसी असुरी प्रवृत्ति से कम भी नहीं है। बधाई संदेश में लगे बांस और खपच्ची रावण का ढांचा बना देते हैं और उपयोग में लाया गया सिंथेटिक पॉलीमर उसकी भराई और ऊपरी सतह की तरह काम में उपयोग किया जाता है। जब यह पुतला जलता है, तो इससे खतरनाक डाइऑक्सिन वातावरण में घुल जाता है। यह तत्व सबसे जहरीले तत्वों में शुमार है, जो पूरे वायुमंडल को प्रदूषित कर देता है।


एक मोटे अनुमान के अनुसार, 80 प्रतिशत डाइऑक्सिन प्रदूषण के लिए पीवीसी ही दोषी है। कार्बन शृंखला का उत्पाद होने के कारण पीवीसी के द्वारा कार्बन उत्सर्जन भी अत्यधिक मात्रा में होता है। मूल सामग्री के अतिरिक्त उक्त प्रदर्शन सामग्री के निर्माण में प्रयुक्त रंगों के अतिरिक्त भी रसायन उपयोग में लिए जाते हैं, जो मानवीय एवं पर्यावरणीय स्वास्थ्य के लिए अत्यंत घातक होते हैं। आजकल स्टार फ्लेक्स प्रिंटिंग का भी चलन है, जो कि आमतौर पर उपयोग में लिए जाने वाले पीवीसी से मोटा होता है, किंतु उसका निष्पादन भी जटिल रहता है।


इनका चलन इसलिए भी बढ़ रहा है, क्योंकि इसकी लागत मात्र दस रुपये प्रति फीट आती है और एक होर्डिंग चार सौ से छह सौ रुपये में तैयार हो जाता है। इनको प्रदर्शित करने का कोई भी शुल्क या कर नगरीय निकाय द्वारा वसूल नहीं किया जाता, जबकि निर्धारित स्थल के विज्ञापन नीलामी के जरिये एक तय मासिक या वार्षिक राशि के आधार पर आवंटित किए जाते हैं। यदि प्रदर्शित सामग्री का उपयोग जलाने या ढकने में नहीं होता, तो वह कचरा डिपो में पहुंच जाती है और प्रदूषण की नई शृंखला प्रारंभ कर देती है।


खुला कचरा अपने आप में वायुमंडल के लिए अभिशाप है, उसके ऊपर यह सामग्री तड़के का काम करती है। यदि यह कचरा घर तक पहुंच जाए, तो मीथेन जैसी विषैली गैस के उत्सर्जन में उत्प्रेरक का कार्य करने लगती है।
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महत्वपूर्ण विषय यह है कि क्या आम जनता की सेहत और पर्यावरण को हानि पहुंचाते हुए बधाई संदेशों को प्रदर्शित करने की आवश्यकता है। क्या यही शक्ति प्रदर्शन का एकमात्र आधार है? यदि इनके प्रदर्शन पर शुल्क लगता या कोई कार्रवाई होती, तो संभवतया इन पर अंकुश लग सकता था। बधाई-आभार संबंधी सार्वजनिक प्रदर्शित विज्ञापन के उत्पात को रोकने के लिए सरकार को शीघ्रातिशीघ्र कदम उठाना चाहिए और उसे लगाने वाले पर दंड भी लागू करना चाहिए, अन्यथा यह चलन बढ़ता ही जाएगा और वातावरण भी जहरीला होता जाएगा।

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