समझौते के क्रियान्वयन के लिए चार यूरोपीय देशों से मंजूरी मिलनी जरूरी थी, इसी वजह से इसमें कुछ देरी हुई। यह ऐतिहासिक इसलिए भी है, क्योंकि टीईपीए भारत का किसी यूरोपीय समूह के साथ पहला व्यापक समझौता है और इसके साथ ही, यह पहली बार है जब भारत ने किसी आर्थिक समझौते में बाजार-पहुंच को निवेश की दृढ़ प्रतिबद्धताओं से जोड़ा है।
समझौते के तहत ईएफटीए की चार अर्थव्यवस्थाओं ने अगले 15 वर्षों में भारत में 100 अरब डॉलर के निवेश की प्रतिबद्धता जताई है, जिसमें पहले दशक में 50 और अगले पांच वर्षों में 50 अरब डॉलर का निवेश होगा। यही नहीं, इस समझौते से ईएफटीए ब्लॉक से आयातित करीब 80-85 फीसदी वस्तुओं पर शुल्क में कमी आएगी, जबकि लगभग 99 फीसदी भारतीय निर्यातकों को उनके बाजारों में शुल्क-मुक्त पहुंच प्राप्त होगी। हालांकि, सरकार ने डेयरी और कुछ कृषि उत्पादों जैसे संवेदनशील क्षेत्रों के लिए संरक्षणवादी रुख अपनाया है और घरेलू हितों की रक्षा के लिए उन्हें इससे बाहर रखा गया है।
इस समझौते से आगामी डेढ़ दशक में करोड़ों नए रोजगार पैदा होने की संभावना है। वैश्विक युद्धों और अमेरिकी टैरिफ के वर्तमान अनिश्चित दौर ने दुनिया को यह सिखाया है कि एक ही क्षेत्र या देश पर अत्यधिक निर्भरता खतरनाक हो सकती है। इस समझौते से भारत वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं का अधिक विश्वसनीय हिस्सा बन सकेगा।
दूसरी तरफ, अमेरिका, ओमान, पेरू, चिली और न्यूजीलैंड जैसे देशों के साथ भारत की बातचीत चल रही है, तो कतर व बहरीन भी भारत के साथ ऐसे समझौतों की इच्छा जता चुके हैं। जाहिर है कि भारत अपने विशाल श्रमबल, बाजार और सुधारोन्मुख नीतियों के कारण देशों के लिए आकर्षक गंतव्य बन रहा है। ईएफटीए देश यूरोपीय संघ के सदस्य नहीं हैं, लेकिन इनके साथ हुआ समझौता यकीनन भारत-यूरोपीय संघ के बीच चल रही व्यापार वार्ता को गति देगा, जिसके इस वर्ष के अंत तक पूरा होने की उम्मीद जताई जा रही है।