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उदन्त मार्त्तण्ड: हिंदी पत्रकारिता का पहला कांपता कदम, जिसके बाद भारत ने इतिहास के बड़े भारी उतार-चढ़ाव देखे

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हिंदी पत्रकारिता का पहला कांपता हुआ कदम - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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उदन्त मार्त्तण्ड भारतीय पत्रकारिता की महायात्रा का पहला कदम है, जो कलकत्ता की भूमि पर कांपते हुए उठा। वह बीज एक उर्वर भूमि में रोपा गया था, जिसके वंशवृक्ष केवल भारत ही नहीं पूरी दुनिया में विस्तृत हुए। इस प्रकाशन परंपरा के पितृपुरुष हैं उदन्त मार्त्तण्ड के संस्थापक संपादक जुगल किशोर शुक्ल!
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युवा कवि रामायणधर द्विवेदी की एक अत्यंत मार्मिक कविता है-जुगनू जैसी जलती-बुझती, छोटी-छोटी आशाएं। इस कविता की एक और पंक्ति है-बिटिया के हाथों से बेली पहली रोटी आशाएं।  ब्रिटिश कारोबारी जर्जर मुगलिया भारत में अपना मकड़जाल फैलाने आए। कलकत्ता में बैठकर वे भारत का भविष्य दमन की स्याही से लिख रहे थे, तब भारत के हित की आशा का एक जुगनू जैसा दीया भी जला था। वह बिल्कुल बेटी के हाथों से बेली पहली रोटी जैसा ही था। वह हिंदी का पहला समाचार पत्र था-उदन्त मार्त्तण्ड, जो 30 मई, 1826 को छपा। बंगाल पर कब्जा जमाने के बाद कलकत्ता उनका पहला अड्डा बना और उत्तर भारत के लोग व्यापार-रोजगार की तलाश में कलकत्ता पहुंचने लगे थे। उत्तर प्रदेश के जुगल किशोर शुक्ल भी अपने आरंभिक समय में कलकत्ता की सदर अदालत में क्लर्क थे। बाद में वे वकील बने। मगर नियति को उनके कर-कमलों से कुछ और ही कराना था।

हम नहीं जानते कि श्रद्धेय जुगल किशोर शुक्ल ने क्या सोचकर अखबार का नामकरण किया। एक प्रकार से एक ‘जुगनू’ को ही ‘मार्त्तण्ड’ के नाम से प्रकाशित होता कलकत्ता वालों ने देखा, जिसकी चमक दो साल के भीतर ही खो जाने वाली थी। पहले ही अंक में पहले ही वाक्य में पांच शब्द लिखे-‘हिंदुस्तानियों के हित के हेत।’ आज की भाषा में जिसे नैरेटिव सेट करना कहते हैं, इन शब्दों में जैसे उस पत्रकार पूर्वज ने भविष्य के भारत की पत्रकारिता का नैरेटिव सेट कर दिया था। 19 दिसंबर, 1827 को 79वें अंक में शुक्ल की विवशता इन शब्दों में प्रकाशित हुई-‘आज दिवस लौं उग चुक्यौ यह मार्त्तण्ड उदन्त, अस्ताचल को जात है दिनकर दिन अब अंत।’
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उदन्त मार्त्तण्ड के बाद भारत ने इतिहास के बड़े भारी और रक्तरंजित उतार-चढ़ाव देखे। 1857 का पड़ाव भी आया और 1905 में बंगाल के विभाजन का भी, 1911 में अंग्रेजों की राजधानी कोलकाता से दिल्ली लाने का, 1947 में भारत के विनाशकारी विभाजन के पहले बंगाल में मजहबी डायरेक्ट एक्शन, लाखों लोगों के अमानवीय नरसंहार और विस्थापन का भी। कालापानी, गोली, फांसी, आंदोलन, सत्याग्रह और जेल के अनेक अध्याय इस अंतहीन संघर्ष में जुड़ते गए।

पत्रकारिता की संघर्ष भरी यात्रा में कभी ‘तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालने’ की हुंकारें सुनी गईं, तो कोई एक हाथ में बंदूक और दूसरे में कलम का घोष करते हुए एक अखबार सहित ही प्रकट हो गया। शब्दों की इस प्रेरक यात्रा से गुजरते हुए यह साफ नजर आता है कि भारत की स्वाधीनता का संघर्ष सेनानियों के महान सपनों से आरंभ हुआ, विकट सामूहिक संघर्षों और बलिदानों से आगे बढ़ा और अंत में सत्ता के घृणित सौदों-समझौतों पर जाकर समाप्त हो गया। मगर पत्रकारिता सिस्टम से निराश आम जनता की अंतिम उम्मीद बनी, तो यह विश्वसनीयता ही उसकी सबसे बड़ी पूंजी है। तकनीक के विकास के साथ मीडिया एक ऐसे वाहन की तरह भी नजर आया, जिसके ब्रेक फेल हों। इंटरनेट आते-आते सूचनाओं के अंधड़ से चलते दिखाई देने लगे।

आधुनिक तकनीक से लैस मीडिया की आकर्षक दुनिया पत्रकारों के लिए आज भी उतनी ही अनिश्चितताओं से भरी है, जितनी दो सौ साल पहले कलकत्ता में कोल्हू टोला की अमड़ा तला की गली में थी। इसी गली में 37 नंबर हवेली की पहली सीढ़ी पर उदन्त मार्त्तण्ड ने अपना पहला कांपता हुआ-सा कदम रखा था। सत्य के लिए संघर्ष ही इसके संक्षिप्त जीवन का सार है। जुगनू जैसी जलती-बुझती आशाओं के अनंत आकाश जैसा! - edit@amarujala.com
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 (विजय मनोहर तिवारी, कुलगुरु, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल)
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