अटल बिहारी वाजपेयी ने जब भारत में संचार क्रांति यानी सेलुलर फोन क्रांति के एक बड़े वाहक भारत संचार निगम लिमिटेड के मोबाइल फोन का 2003 में लखनऊ में उद्घाटन किया था, तो उसे पंडोरा बॉक्स यानी जादुई बक्सा कहा था। इस जादुई बक्से, लैपटॉप और कंप्यूटरों के जरिये हमारे देश में इंटरनेट का बोलबाला बढ़ा है। पिछले महीने आई एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में 14 करोड़ 32 लाख इंटरनेट कनेक्शन हो गए हैं। यह संख्या बहुत बड़ी है। इंटरनेट का बढ़ता चलन ही है कि हमारे यहां यह मानने वाले भी बहुत ज्यादा हो गए हैं कि इंटरनेट के जरिये हिंदी का विस्तार हो रहा है। अव्वल तो होना यह चाहिए था कि इंटरनेटी विस्तार के दौर में हिंदी का भी विस्तार होता, क्योंकि चीन के बाद अगर सबसे ज्यादा इंटरनेट उपभोक्ता कहीं हैं, तो वे हमारे देश में ही हैं। इस हिसाब से तो हिंदी और मंदारिन का इंटरनेट पर विस्तार होना चाहिए था, लेकिन हकीकत इससे कोसों दूर है। कुछ दिनों पहले 'डब्ल्यू थ्री टेक्स' नामक अनुसंधान एजेंसी ने इंटरनेट पर हिंदी को लेकर जो आंकड़े दिए थे, वे कुछ और ही कहानी कह रहे हैं।
डब्ल्यू थ्री टेक्स की रिपोर्ट के मुताबिक, इंटरनेट में अंग्रेजी का सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है। इस रिपोर्ट के अनुसार, इंटरनेट पर लिखी जाने वाली कुल इबारतों की 54.7 प्रतिशत अंग्रेजी में ही लिखी जाती हैं। दूसरे नंबर पर रूसी का स्थान आता है, जबकि तीसरे नंबर पर जर्मन भाषा है। इसी रिपोर्ट के मुताबिक, इंटरनेट पर उपयोग की जाने वाली शीर्ष 10 भाषाओं में हिंदी या कोई भी भारतीय भाषा नहीं है।
सवा अरब से अधिक लोगों के बीच लोकप्रिय चीनी भाषा इंटरनेट पर उपयोग में लाई जाने वाली चौथी सबसे बड़ी भाषा है। दुनिया की तीसरी बड़ी भाषा होने के बावजूद हिंदी का स्थान अगर इस सूची में नहीं है, तो इसका मतलब साफ है कि इंटरनेट पर हमारी हिंदी के लोग भी अंग्रेजी का ही इस्तेमाल करते हैं। इस सूची में अरबी, कोरियाई और जापानी जैसी भाषाओं का स्थान बना लेना मामूली बात नहीं है। आखिर रूसी दूसरे नंबर पर क्यों है? इसका जवाब विश्लेषकों ने दिया है। उनका कहना है कि सोवियत संघ के विघटन के बाद भी सोवियत संघ से अलग हुए कुछ देशों में रूसी भाषा प्रमुख भाषा बनी हुई है। उक्रेन, बेलारूस, कजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान और किर्गिस्तान के डोमेन क्षेत्रों में भी रूसी भाषा ही प्रमुख है। जानकारों का कहना है कि अभी कई बरस तक इंटरनेट में रूसी भाषा दूसरे नंबर पर बनी रहेगी।
चाइनीज एकेडमी ऑफ सोशल साइंसेज के इंस्टीट्यूट ऑफ मीडिया रिसर्च के शोधार्थी लियू रुईशेंग ने बताया कि वर्ष 2000 में चीन में करीब 2.25 करोड़ लोग इंटरनेट का उपयोग किया करते थे। उस समय इंटरनेट का उपयोग करने वाले प्रति 100 लोगों में चीनी लोगों की संख्या विकासशील देशों के औसत से भी कम थी। साल 2010 में चीन में इंटरनेट का उपयोग करने वाले लोगों की संख्या 34 फीसदी तक पहुंच गई। ये संख्या विकासशील देशों में इंटरनेट का उपयोग करने वाले लोगों के औसत से डेढ़ गुना ज्यादा है।
जिस तरह चीन में मोबाइल फोन का उपयोग करने वाले लोगों की संख्या दूसरे विकासशील देशों की तुलना में तेजी से बढ़ रही है, उसी तरह यहां इंटरनेट का उपयोग करने वाले लोगों की संख्या में भी इजाफा हो रहा है। चीन में अभी 90 करोड़ लोग मोबाइल फोन का उपयोग करते हैं। इसकी तुलना में अपनी हिंदी वालों को देखिए। यहां हिंदी का इस्तेमाल करने के बजाय लोगों को अंग्रेजी में ही काम करने और इंटरनेट पर इस्तेमाल करने की ललक ज्यादा है। तथ्य यह भी है कि हमारे यहां अब भी औपनिवेशिक मानसिकता हावी है। 1953 से राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा ने 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाना शुरू किया था। तब से लेकर हर साल हिंदी को आगे लाने को लेकर सरकारी और गैरसरकारी स्तर पर हिंदी को स्थापित करने के लिए संकल्प किए जाते रहे। पर हिंदी की हालत देखिए कि मोबाइल और कंप्यूटर के बादशाह देश भारत में हिंदी अब भी कोने में पड़ी है। हम हिंदीभाषियों को अगर अपनी हिंदी पर गर्व है, तो हमें चाहिए कि इंटरनेट-फेसबुक पर हिंदी में लिखें और पढ़ें, तभी अपनी भाषा को बचा पाएंगे।