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सिविल सेवा में हिंदी का रोड़ा

Tue, 24 Sep 2013 08:15 PM IST
श्याम रुद्र पाठक
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बीते कुछ वर्षों के नतीजों को देखें, तो संदेह होने लगता है कि भारतीय प्रशासनिक सेवा में जाने की राह में हिंदी कहीं रोड़ा तो नहीं बन रही। अगर ऐसा नहीं है, तो सिविल सेवा परीक्षा की पहली सीढ़ी यानी प्रारंभिक परीक्षा में हिंदी माध्यम से उत्तीर्ण होने वाले परीक्षार्थियों की संख्या लगातार घट क्यों रही है? यह सवाल आम विश्लेषकों को ही नहीं, हमारे जनप्रतिनिधियों को भी मथ रहा है। यही वजह है कि पिछले दिनों खत्म हुए संसद के शीतकालीन सत्र में कई सांसदों ने सरकार का ध्यान इस ओर दिलाया। दरअसल, वर्ष 2011 से आईएएस की परीक्षा में सीसैट प्रणाली लागू किए जाने के बाद से ही हिंदी माध्यम के परीक्षार्थियों के लिए दिक्कतों का दौर शुरू हो गया है। संघ लोक सेवा आयोग ने 2011 में प्रारंभिक परीक्षा के पैटर्न में बदलाव लाते हुए कुल 400 में से 22.5 अंक अंग्रेजी भाषा कांप्रिहेंशन के रख दिए हैं। पहले जहां तकरीबन 50 प्रतिशत गैर अंग्रेजी भाषियों का चयन होता था, वहीं इस बदलाव के बाद 2012 में यह घटकर 20 प्रतिशत रह गया है।
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इस मामले में केंद्र सरकार की दलीलें थोथी नजर आ रही हैं। उसका कहना है कि अंग्रेजी को महत्व देने की वजह यह है कि अब यह एक वैश्विक भाषा बन गई है, जिसे नजरंदाज नहीं किया जा सकता। सच तो यह है कि इससे बड़ा झूठ कोई हो ही नहीं सकता। चीन, फ्रांस, जर्मनी, स्पेन, इटली, स्वीडन इत्यादि देशों में प्रशासकों को चुनते समय क्या उनकी अंग्रेजी योग्यता का ध्यान रखा जाता है? हमारा उद्देश्य तो यह होना चाहिए कि अच्छे प्रतिभाशाली लोग प्रशासनिक सेवाओं में आएं। जहां तक अंग्रेजी ज्ञान की बात है, तो उसे प्रशिक्षण के दौरान भी सीखा जा सकता है।

कुछ दशक पहले वर्ष 1989 में आईआईटी की प्रवेश परीक्षा में हिंदी भाषा के माध्यम में भी पेपर लिए जाने की मांग को लेकर मैंने उपवास किया था। तब भी मैने यही तर्क दिया था कि विकास के अवसरों में किसी तरह का भेदभाव नहीं होना चाहिए। मेरे उस आंदोलन का ही नतीजा था कि आईआईटी की प्रवेश परीक्षा में हिंदी भाषा के माध्यम में भी पेपर होने लगा, जबकि वहां पढ़ाई का माध्यम अंग्रेजी है। तब से 23 वर्ष बीत जाने के बाद भी चुने गए परीक्षार्थियों के लिए अंग्रेजी के विशेष प्रशिक्षण की आवश्यकता ही नहीं पड़ी है। इसका मतलब ही है कि जो प्रतिभावान है, उसके लिए अंग्रेजी भाषा सीखना कोई बड़ी बात नहीं है। जो विद्यार्थी आईएएस और आईआईटी जैसी विश्व की सबसे कठिन मानी जाने वाली परीक्षाओं में कामयाब होता हो, उसके लिए अंग्रेजी भाषा सीखना भला कौन-सा मुश्किल काम है! इसके बावजूद प्रवेश परीक्षा में अंग्रेजी के आधार पर भेदभाव किया जा रहा है। भारतीय प्रशासनिक सेवा में किसी को लेने या छांट देने का यह पैमाना कतई स्वीकार्य नहीं हो सकता।
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सरकार एक और तर्क यह दे रही है कि अंग्रेजी भाषा में पूछे गए सवालों का स्तर मैट्रिक लेवल का होता है। इसलिए इनको हल करना हिंदी या अंग्रेजी, दोनों ही माध्यमों के विद्यार्थियों के लिए समान रूप से आसान है। अगर सरकार का यह दावा मान लिया जाए, तो फिर इन प्रश्नों को पूछे जाने का औचित्य ही क्या है। अगर इन प्रश्नों के अंक जुड़ते हैं, तो फिर इन्हें पूछने का उद्देश्य ही है कि कुछ विद्यार्थी इनमें अच्छा प्रदर्शन करें और कुछ खराब, ताकि योग्यता की परख की जा सके और अंतिम मेरिट लिस्ट बनाई जा सके। दरअसल, यह जो ‘मैट्रिक लेवल’ वाक्यांश है, वह अपने आप में भ्रम पैदा करने वाला है। नीति नियंताओं से यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि भारत जैसे देश में क्या अंग्रेजी माध्यम के विद्यार्थियों और हिंदी या गैर अंग्रेजी भाषी विद्यार्थियों के लिए मैट्रिक का स्तर एक समान है। और अगर नहीं है, तो सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा में अंग्रेजी भाषा के जो सवाल पूछे जाएंगे, वे अंग्रेजी माध्यम के मैट्रिक स्तर के होंगे या गैर अंग्रेजी भाषियों के मैट्रिक स्तर के, यह कौन तय करेगा? सच तो यह है कि भारत अब भी गुलाम है और शासक वर्ग के हाथ में गुलामी का सबसे सशक्त हथियार है अंग्रेजी। गैर अंग्रेजी भाषियों के साथ यह जो अन्याय हो रहा है, वह शासक वर्ग की चाल है, ताकि आईएएस का बेटा ही आईएएस बने।

गैर अंग्रेजी भाषियों खासकर हिंदी माध्यम वालों के लिए एक दिक्कत और भी है। सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा में जो सवाल पूछे जाते हैं, वे अंग्रेजी और हिंदी, दोनों ही भाषाओं में होते हैं। यह व्यवस्था इसलिए होती है, ताकि जिन विद्यार्थियों की अंग्रेजी कमजोर है, वे उन्हीं सवालों को हिंदी में पढ़कर समझ सकें। लेकिन समस्या यह है कि यूपीएससी यानी संघ लोक सेवा आयोग पहले इन सवालों को अंग्रेजी में तैयार कराता है और फिर प्रशासनिक अनुवादकों के जरिये इनका अनुवाद कराया जाता है। नतीजा यह होता है कि जब हिंदी माध्यम के परीक्षार्थी इन सवालों को पढ़ते हैं, तो उन्हें अपनी ही योग्यता पर शक होने लगता है। यह सरकारी अनुवाद इतना जटिल होता है कि हिंदी माध्यम के अच्छे से अच्छे विद्यार्थी भी अचंभे में पड़ जाते हैं; मानो पूछे गए सवाल हिंदी में न होकर लैटिन भाषा में हों। होना तो यह चाहिए कि यूपीएससी सवालों के अनुवाद के कार्य को पूरी गंभीरता से ले। इसके लिए हिंदी के सुयोग्य अध्यापकों का सहारा लिया जा सकता है। यह भी ध्यान रखा जाए कि प्रयुक्त शब्द व्यावहारिक हों, न कि तकनीकी शब्दों का शब्दशः अनुवाद।

कुछ भी हो, इसमें संदेह नहीं है कि आईएएस परीक्षा की वर्तमान प्रणाली हिंदी माध्यम के विद्यार्थियों के लिए अनुकूल कतई नहीं है। इसलिए सरकार को इस दिशा में शीघ्रातिशीघ्र विचार करने की आवश्यकता है।
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