जुलाई के पहले हफ्ते में हुई बारिश से दिल्ली का तापमान कुछ गिरा है। वहीं जेनेवा (स्विट्जरलैंड) में रहने वाले मेरे बेटे ने बताया कि वहां इतनी तेज गर्मी पड़ रही है कि आदमियों की तो छोड़िए, सड़कों और पार्कों में कोई चिड़िया तक नजर नहीं आती। पेड़-पौधे मुरझा गए हैं। घर के लॉन में घास को हरा-भरा रखने के लिए इतना पानी देना पड़ रहा है, जितना पहले कभी नहीं देना पड़ा। डॉक्टर सलाह दे रहे हैं कि लोग धूप में घर से बाहर न निकलें, और पानी लगातार पीते रहें। इन बातों को सुनकर ऐसा लग रहा है कि जैसे ये सब बातें यहां भारत में कही जा रही हों। हम पहले से ही गर्मी और लू से निपटने और इसे झेलने के इन तरीकों को जानते हैं। मगर ठंडे देशों के लिए तो यह एक ऐसी आफत है, जिसके बारे में उन्हें पता ही नहीं है।
वहां पंखे, कूलर या एसी के बारे में लोग नहीं जानते हैं। उन्हें इनकी जरूरत ही नहीं पड़ती। आखिर स्विट्जरलैंड ठंडा देश माना जाता है। धरती के स्वर्ग कहे जाने वाले इस देश को लोग एक बार जरूर देखना चाहते हैं। कैसी विडंबना है कि सदियों से पूरी दुनिया के लोग गर्मी से घबराकर स्विट्जरलैंड या अन्य ठंडे देशों की तरफ रुख करते रहे हैं, मगर अब भला स्विट्जरलैंड के लोग गर्मी से बचने के लिए कहां जाएं! सर्दी के दिनों में पड़ने वाली बर्फ के कारण वहां के घर भी ऐसे बनाए जाते हैं, जो तेज बर्फीली हवाओं से बचा सके। उनमें चारों तरफ बस शीशे ही शीशे लगे होते हैं। घर को गर्म रखने की पूरी व्यवस्था होती है वहां। मौसम का यह कैसा मजाक है कि जो घर सर्दी से बचने के लिए बनाए, अब उनमें तेज गर्मी झेलनी पड़ रही है।
स्विट्जरलैंड की सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था अन्य देशों से अलग है। वहां लोग शाम पांच बजे के बाद दफ्तरों में काम नहीं करते। दुकानें भी बंद हो जाती हैं। रविवार को भी वहां बाजार, दुकान, मॉल आदि संस्थान बंद रहते हैं। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि वहां की सरकार का मानना है कि आदमी काम के वक्त काम करे और आराम के वक्त आराम। वह परिवार के साथ भी समय बिताए। नौकरीपेशा, व्यापारी, दुकानदार सब पर यह नियम लागू है। मगर आजकल पांच बजे तो छोड़िए सात-आठ बजे तक लोग दफ्तर से बाहर नहीं निकलना चाहते। क्योंकि वहां देर शाम तक भी तेज धूप निकली रहती है। ऐसे में लोग बचने का यही रास्ता निकाल रहे हैं कि जब तपिश कुछ कम हो जाए, तभी घर जाएं।
यूरोप की सबसे ऊंची चोटी युंग फ्रो स्विट्जरलैंड में ही है। सैलानियों को इस चोटी तक रेलगाड़ी ले जाती है। यहां खड़े होकर लगता है कि जैसे आप बर्फ के समुद्र में खड़े हों, या बर्फ का कोई रेगिस्तान देख रहे हों। इसी चोटी पर बर्फ के पुतलों का एक अनोखा म्यूजियम भी है। ग्लोबल वार्मिंग की चेतावनी देने वाले वैज्ञानिक बार-बार यही कह रहे हैं कि एक ऐसा समय आएगा, जब पहाड़ों की बर्फ पिघल जाएगी और नदियों और समुद्र तक में बाढ़ आ जाएगी। समुद्र के किनारे बसे कई शहर डूब जाएंगे। इन दिनों मैं युंग फ्रो, आल्पस की चोटी मैटरहोर्न और फ्रांस के माउंट ब्लांक पहाड़ के बारे में सोच रही हूं। अगर इन पहाड़ों की बर्फ भीषण पड़ती इस गर्मी को न झेल सकी, तो वहां का क्या होगा? युंग फ्रो ही क्यों, अगर ग्लोबल वार्मिंग के चलते हमारे हिमालय की सारी बर्फ पिघल गईं, तो हम कैसे झेलेंगे? भगवान खैर करे!