इस बीच, ऑस्ट्रेलिया की न्यू साउथ वेल्स यूनिवर्सिटी के ताजा अध्ययन ने चेतावनी दी है कि अगर धरती का औसत तापमान चार डिग्री सेल्सियस बढ़ जाता है, तो 40 फीसदी वैश्विक संपत्ति के नष्ट होने का खतरा है, जबकि अब तक के शोध 11 फीसदी नुकसान की ही बात कहते आए हैं। तापमान का बढ़ना केवल गर्मी झेलने तक सीमित हो, तो एक बात है, लेकिन ये स्थितियां प्रकृति में असंतुलन का संकेत देती हैं, लिहाजा बड़ी प्राकृतिक आपदाओं का डर भी पैदा होता है। पिछले वर्ष जुलाई में केरल के वायनाड में बड़े पैमाने पर हुए भूस्खलन को याद करें, जिसमें सैकड़ों लोग हताहत हुए थे।
पिछले साल ही राजस्थान के जैसलमेर में एक ही दिन में मौसम की 55 फीसदी बारिश हो गई थी। इसी तरह, लेह के ठंडे रेगिस्तानी इलाके में जुलाई में गर्मी की लहर चली थी। यह स्थिति इसलिए भी डराती है, क्योंकि 2024 में ऐसी आपदाओं में 3,238 लोगों की जानें गई थीं, जो 2022 की तुलना में 18 फीसदी अधिक है। दरअसल, जिस तरह से चरम मौसमी घटनाओं की आवृत्ति, तीव्रता और अवधि बढ़ी है, उससे सवाल उठता है कि क्या यह ‘न्यू नॉर्मल’ वाली स्थिति तो नहीं बनने जा रही, जिसका सामना पूरी दुनिया को करना होगा।
2022 में गर्म हवाओं की वजह से पैदावार में करीब 20 फीसदी कमी की आई थी, जो इस वर्ष की कहानी भी हो सकती है। खेती का गहरा संबंध जल की उपलब्धता से भी होता है। ऐसे में, उत्तर भारत में जलाशयों की क्षमता में गिरावट भी चिंता का विषय है। अब समय आ गया है कि इस संकट को गंभीरता से लिया जाए। पौधारोपण और जल संरक्षण के लिए नीतियां होना काफी नहीं, उनके समुचित कार्यान्वयन पर ध्यान देना होगा।
बिजली और पानी का किफायत से उपयोग और प्रदूषण कम करने के छोटे-छोटे कदम बड़े बदलाव ला सकते हैं। हर किसी को खुद से पूछना चाहिए कि वह पर्यावरण की इस व्यापक हो चली समस्या का अंग है या फिर समाधान का। इस संबंध में कोई तीसरा विकल्प शेष नहीं है।