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गरीबों से दूर न हों स्वास्थ्य सेवाएं

चंद्रकांत लहारिया
Updated Tue, 10 Dec 2019 05:30 AM IST
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- फोटो : सोशल मीडिया

उपयोगकर्ता-शुल्क, स्वास्थ्य क्षेत्र के संदर्भ में, सरकारी सेवाओं का उपयोग करते समय लोगों द्वारा किया गया एक आंशिक भुगतान है। यद्यपि भारत में केंद्र और राज्य सरकारें मुफ्त स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करने का इरादा रखती हैं, साथ ही सरकारों द्वारा संचालित कई स्वास्थ्य सुविधाएं लोगों से अलग-अलग स्तर, जैसे कि पंजीकरण या जांच की लागत जैसी कई सेवाओं के लिए आंशिक शुल्क लेती हैं। भारत से इस तरह के शुल्क का पहला उदाहरण 1967 का है, जब केंद्रीय स्वास्थ्य परिषद ने मरीजों पर स्वास्थ्य उपकर लगाया। प्रति मरीज 10 पैसे और भर्ती के लिए 25 पैसे प्रति दिन का न्यूनतम शुल्क निर्धारित किया गया था।



उपयोगकर्ता शुल्क के इस विचार को 1993 में जारी की गई 'स्वास्थ्य के लिए निवेश' नामक एक वैश्विक रिपोर्ट से और भी बढ़ावा मिला। इस रिपोर्ट ने सरकारों से उपयोगकर्ता शुल्क वसूलने की वकालत की। तर्क था कि यह स्वास्थ्य सुविधाओं के अनावश्यक उपयोग को कम करेगा और सीमित उपलब्ध संसाधनों का समुचित उपयोग सुनिश्चित करेगा। इसके तत्काल बाद, कई निम्न और मध्यम आय वाले देशों तथा भारत सरकार और भारतीय राज्यों ने सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं पर ‘उपयोगकर्ता-शुल्क’ लगाना शुरू कर दिया। विडंबना यह थी कि उपयोगकर्ता शुल्क का उपयोग सरकारों द्वारा स्वास्थ्य सुविधाओं में आवंटन को कम करने के लिए भी किया गया था। लेकिन बहुत जल्दी ही यह समझ में आने लगा कि इस तरह का उपयोगकर्ता शुल्क, चाहे कितना भी छोटा हो, न केवल गरीब लोगों को स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंचने से रोकता है या स्वस्थ्य देखभाल के लिए जाने में देरी करता है। बल्कि इस तरफ से इकट्ठा किया गया धन इन स्वास्थ्य सुविधाओं के समग्र बजट की तुलना में बहुत ही कम था। निम्न-मध्यम और मध्यम आय वाले देशों में यह बात बहुत जल्द ही समझी गई एवं वर्ष 2000 की शुरुआत से उपयोगकर्ता शुल्क वापस लिए जाने लगे।


उपयोगकर्ता शुल्क को पूरी तरह से हटाने के लिए कई तर्क दिए जा सकते हैं। पहला और सबसे महत्वपूर्ण यह है कि उपयोगकर्ता शुल्क को पूरी दुनिया में नकारा जा चुका है। दूसरा, विश्व स्तर पर विशेषज्ञ अब उपयोगकर्ता सहायता शुल्क नहीं देते हैं। तीसरा, भारत की स्थिति तीन दशक पहले जैसी नहीं है, जब स्वास्थ्य क्षेत्र में आवंटन के लिए संसाधन की कमी थी। चौथा, भारत में लगभग 60 फीसदी स्वास्थ्य व्यय पहले से ही लोगों की जेब से जाता है। सरकार जो खर्च करती है, उसका लगभग दोगुना। पांचवां, गरीबों के लिए उपयोगकर्ता शुल्क में छूट को लागू करने में काफी मुश्किलें आती हैं, जहां अति उत्साही कर्मचारी लगभग सभी से पैसा लेना चाहता है। यह लोगों को स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंचने से रोकता है।


छठा, राशि चाहे कितनी भी छोटी क्यों न हो, गरीबों को उस पैसे पर एक विकल्प चुनना पड़ता है। आश्चर्य नहीं कि केवल 11 फीसदी ग्रामीण और 3.5 फीसदी शहरी आबादी ने अपनी स्वास्थ्य आवश्यकताओं के लिए सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं का उपयोग किया। सातवां, उपयोगकर्ता शुल्क से उत्पन्न राशि हमेशा बहुत छोटी होती है, कुल आवश्यक संसाधनों के एक फीसदी से कम। आठवां, हालांकि सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं में स्वास्थ्य सेवाएं मुफ्त हैं, लेकिन लोगों को यात्रा की लागत, दवाओं की खरीद और मजदूरी की हानि के रूप में कई अप्रत्यक्ष व्यय होते हैं। नौवां, बहुत सारा सरकारी आवंटन खर्च हुए बिना लौट जाता है। दसवां, सरकारी स्वास्थ्य सेवा प्रणाली को आम जनता के कर (प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष) द्वारा वित्त पोषित किया जाता है, इसलिए सभी ने उन सेवाओं के लिए भुगतान किया है, जो वे इस्तेमाल करना चाहते हैं।


-जन स्वास्थ्य सेवाओं एवं नीतियों के विशेषज्ञ।

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