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मिट्टी की सेहत: आधुनिक खेती-किसानी के तरीकों से जुड़े ज्ञान की कमी

रमेश ठाकुर Published by: रमेश ठाकुर Updated Fri, 11 Oct 2019 03:47 AM IST
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कृषि आमदनी में घाटे का प्रमुख कारण कृषकों में आधुनिक खेती-किसानी के तरीकों से संबंधित ज्ञान की कमी है। कृषि में मृदा तकनीक कितनी उपयोगी साबित हो सकती है, इस सच्चाई से अन्नदाता फिलहाल वाकिफ होने लगे हैं। ग्लोबल वार्मिंग का असर कहें या नित बदलते मौसम की विषमताएं, इससे कृषि पद्धतिसंकट में पड़ गई है। कृषि और किसानों की इस पीड़ादायक समस्या को देखते हुए केंद्र सरकार ने पूरे देश में किसानों की सुविधाओं के लिए मृदा विज्ञान का प्रचार-प्रसार तेजी से शुरू किया है।



इसके तहत किसानों को कौन-सी फसल कब और किस तरह की मिट्टी में बोनी है, इसकी उपयुक्त जानकारी सुलभ कराई जा रही है। मृदा जांच तकनीक से खेत की मिट्टी को कैसे उपजाऊ बनाया जाए, फसलों को कीटनाशकों से किस तरह से बचाया जाए और कौन-सी खाद कब देनी है, इसकी जानकारियां मुहैया कराई जा रही हैं।


खेती-किसानी का स्वरूप बदल चुका है। ऐसे में, किसानों को बदलते समय के साथ ही चलना होगा। कायदा तो यही बनता है कि फसल लगाने से पहले किसान खेत की मिट्टी की स्थानीय कृषि प्रयोगशाला में जांच कराए। उसकी रिपोर्ट आने के बाद ही उचित फसल की बुआई की जानी चाहिए। बिना जांच के खेतों में अत्यधिक रासायनिक प्रदार्थों के प्रयोग से हवा, पानी, व मृदा प्रदूषण में लगातार वृद्धि हो रही है। मानव स्वास्थ्य पर भी इसका प्रतिकूल असर पड़ रहा है।


देश के दर्जनों राज्य ऐसे हैं, जहां के किसान पूर्णतः विज्ञान आधारित कृषि पर निर्भर हो गए हैं। वैज्ञानिक तकनीक अपनाने के बाद उनकी फसलों की उत्पादन क्षमता में बढ़ोतरी हुई है। साथ ही, उनको फसलों से रोगरोधी, कीटाणुरोधी, अनुवांशिक रोगों से मुक्ति का रास्ता भी मिला है। दरअसल जब फसल पककर तैयार होती है, तब आनुवांशिक कीट लग जाते हैं, जिससे खड़ी फसल चौपट हो जाती है। सरकार ने पूरे देश में ‘किसान मेले‘ का आयोजन शुरू किया है, जिसमें किसानों को कृषि से संबंधित तमाम नवीनतम दवाओं की जानकारी दी जाती है। मेले के जरिये किसानों को उन्नत खेती के तरीके भी सिखाए जाते हैं।


मृदा परीक्षण के बाद किसानों को फसलों की बुआई से दवा छिड़कने तक आसानी हो जाती है, और उत्पादन बढ़ने की भी गारंटी रहती है। दरअसल मौजूदा जमीनें पहले जैसी उपजाऊ नहीं रहीं। रासायनिक उर्वरकों के असंतुलित प्रयोग का मृदा उर्वरता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है और फसलों की गुणवत्ता और पैदावार में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है।


अन्नदाताओं को मृदा जांच कराने के बाद विशेषज्ञों द्वारा दी जाने वाली सलाह के उपरांत ही खाद और अन्य रसायनों-कीटनाशकों का इस्तेमाल अपने खेतों में करना चाहिए। फसल लगाने से पहले मिट्टी की जांच से खेत में उपलब्ध पोषक तत्वों की मात्रा, अम्लीयता, क्षारीयता, कार्बनिक पदार्थ मृदा की भौतिक संरचना और किसी फसल विशेष के लिए भूमि की उपयुक्त जानकारी मिल जाती है।


मृदा जांच से अधिकांश मिट्टी में कैल्शियम, मैग्नेशियम, लोहा, जस्ता, मैग्नीज, नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश, गंधक, बोरोन, मोलीब्डेन, तांबा, क्लोरीन आदि पाए जाते हैं। वैज्ञानिकों की मानें, तो हर किसान को अपनी सघन खेती वाले क्षेत्र में प्रत्येक वर्ष और एकल फसल वाले क्षेत्र में तीन साल के अंतराल पर मिट्टी की जांच करवानी चाहिए।

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