मेरा नैयर साहब से बहुत बहुत पुराना रिश्ता रहा है। वह मुझसे तकरीबन आठ-दस साल बड़े थे। मुझे याद है कि उन्होंने अपने स्कूली दौर में पत्रकार बनने की ख्वाहिश जता दी थी। पार्ट टाइम ट्रेनी के तौर पर जिस साप्ताहिक अंजाम से मैंने अपनी उर्दू पत्रकारिता शुरू की थी, वहां वह पहले से काम कर रहे थे। उनकी अंग्रेजी बहुत अच्छी थी, लिहाजा जल्द ही उन्हें एक अंग्रेजी अखबार में नौकरी मिल गई। वह एक जुनूनी पत्रकार थे। वह हमेशा सच की खातिर जिए। खबरों के पीछे की खबर निकालना उनका शौक था।
विभाजन के वक्त जब उनसे हिंदुस्तान आने के लिए कहा गया, तो उन्होंने साफ मना कर दिया था। पारिवारिक दबाव के बाद बड़ी मुश्किल से उन्होंने सियालकोट की मिट्टी से दूरी बनाई। उनके दिल में बंटवारे की टीस ताउम्र बनी रही। उन्होंने अपनी आखिरी सांस तक हिंदुस्तान और पाकिस्तान के बीच की दूरियां घटाने के लिए काम किया। उन्हें उम्मीद थी कि एक दिन जरूर आएगा, जब एक ही मां की दोनों संतानें आपसी बैर भुला देंगी।
मैं वह लम्हा कभी नहीं भूल सकता, जब एक निजी समारोह में उन्होंने अपनी पत्नी से मेरा परिचय यह कहकर कराया था कि मैं उनका उर्दू का गुरु हूं। वह अपने संघर्ष काल को कभी नहीं भूले। मैंने कुछ अच्छे युवा पत्रकारों की किसी अखबार में नौकरी लगवाने के लिए उनसे पहली और आखिरी सिफारिश की थी। वह खुद संघर्ष के बल पर शिखर पर पहुंचे थे, सो उन्हें दूसरों की तकलीफों का बखूबी अंदाजा था। जब वह यूरोप में राजनयिक थे, तब उनके बारे में कई खबरें सुनने को मिलती थीं। दरअसल वह अपने पास हिंदुस्तान से आने वाले हर आम-ओ-खास का बराबर खयाल रखते थे। नैयर साहब सेक्यूलर किस्म के इंसान थे। फिरकापरस्ती से उन्हें सख्त नफरत थी। कभी हार न मानने वाले योद्धा की तरह उनका कहना था-वतन की रेत, मुझे एड़ियां रगड़ने दे, मुझे यकीन है, पानी यहीं से निकलेगा।
नब्बे के दशक में जब फारूक लेघारी पाकिस्तान के राष्ट्रपति थे, तब एक सरकारी कार्यक्रम में नैयर साहब का वहां जाना हुआ था। मैंने उसी कार्यक्रम के आधार पर दिल्ली में एक लेख लिखा था। संपादक ने उस लेख का शीर्षक अपने हिसाब से लगाया था। नैयर साहब जब वापस हिंदुस्तान लौटे, तो उन्होंने मुझसे कहा कि तलवार, तुम्हारे लेख की चर्चा पाकिस्तान में भी हुई। उस वक्त मुझे लगा कि यह मेरी तारीफ है, जबकि बाद में मुझे पता चला कि पाकिस्तान-विरोधी स्वर वाले शीर्षक की वजह से उस कार्यक्रम से कई हिंदुस्तानी पत्रकारों को समय से पहले भारत वापस भेज दिया गया था।
नैयर साहब अच्छे पत्रकार के साथ एक बेहद सुलझे हुए इंसान थे। दिल्ली के प्रेस क्लब में कई बार वह हमारे साथ बैठते और सबका हालचाल पूछते रहते थे। मैं खुद को खुशनसीब समझता हूं कि मुझे नैयर साहब जैसी शख्सियत को बहुत करीब से जानने का मौका मिला। उनका जाना न सिर्फ हिंदुस्तान के, बल्कि पाकिस्तान के उन लोगों को भी रुलाएगा, जो दोनों मुल्कों की दोस्ती के पक्षधर हैं।