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पकड़नी होगी आतंक की चाबी

Thu, 06 Aug 2015 07:26 PM IST
मारूफ रजा
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आतंकी नावेद उर्फ उस्मान की गिरफ्तारी से एक बार फिर पाकिस्तान का सच उजागर हुआ है। आखिर आतंकवादी हमले क्यों हो रहे हैं? इसे समझने के लिए सबसे पहले पाकिस्तान का पूरा परिदृश्य समझना होगा। सच यह है कि पाकिस्तान ने जो आतंकी गुट पाल रखे हैं, वे अब सरकारी नियंत्रण से बाहर होते जा रहे हैं। इन गुटों का दाना-पानी कश्मीर के मुद्दे को जिंदा रखने से जुड़ा हुआ है। वे कश्मीरियों को यह संदेश देने का प्रयास कर रहे हैं कि भले ही पाकिस्तान की फौज और वहां की हुकूमत कश्मीरियों के लिए नहीं लड़ रही, मगर वे कश्मीर को आजाद कराने में लगातार जुटे हुए हैं। इससे उन्हें ज्यादा फंड या चंदा भी मिलता है। इससे वे जन सरोकार के मुद्दों पर भी काम करते हैं, ताकि उनका आधार मजबूत बन सके, जैसे कि अल-दाबा स्कूल (जमात उद दावा का स्कूल)। इस स्कूल का बड़ा नेटवर्क पाकिस्तान में है। पाकिस्तान की पंजाब सरकार से भी उसे आर्थिक मदद मिलती है। ये आतंकी गुट उन लोगों को जोड़ते हैं, जो बेरोजगार होते हैं। वे उन्हें बताते हैं कि कश्मीर को लेकर लड़ने पर यदि उनकी मौत होती है, तो वे ‘शहीद’ कहलाएंगे। उनके परिवार की रखवाली करने का भी वायदा किया जाता है। इस तरह नए-नए लड़ाकों की भर्ती की जाती है। रही बात भारत आने की, तो झेलम या चेनाब जैसी नदियों के तेज बहाव में जब सेंसर बह जाता है, तो उस पार तैयार बैठे इन लड़ाकों को भारतीय सीमा में दाखिल करवा दिया जाता है। इसमें पाकिस्तान की फौज उनकी मदद करती है।
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अच्छी बात है कि आतंकवाद का राजनीतिक समाधान निकालने की लगातार कोशिश हुई है। मोदी सरकार तो नवाज शरीफ सरकार को मजबूती देने के लिए फिर से वार्तालाप शुरू करना चाहती है। मगर दिक्कत यह है कि हमारी रणनीति काफी अस्थिर है। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ विपक्ष के भारी विरोध के बावजूद मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में शिरकत करने आए थे। मगर बाद में हमारी सरकार ने एक छोटी वजह से (पाकिस्तान के राजदूत के कश्मीरी अलगाववादियों से मिलने पर) बातचीत रोक दी। बाद में इसी सरकार ने कहा कि वार्ता के दौरान अलगाववादियों के साथ बात न हो; चाहे बाद में वे बात कर लें। और रूस में प्रधानमंत्री मोदी नवाज शरीफ से मिले भी। उन्होंने यह जताने का प्रयास किया कि भारत वार्ता करना चाहता है। इससे पाकिस्तान में यह धारणा बनी है कि भारत की रणनीति में निरंतरता नहीं है। लिहाजा यह स्पष्ट होना चाहिए कि या तो बातचीत नहीं होगी या हम बात भी करेंगे और मुंहतोड़ जवाब भी देंगे। चूंकि यह अब तक साफ नहीं है, इसलिए 'वार्ता की कूटनीति' मुझे ढोंग-सी लगती है।

हमारी सोच यह भी है कि पाकिस्तान की नागरिक सरकार को मजबूत बनाया जाए, ताकि सेना रास्ते से हट जाए। और अगर सेना रास्ते से हट जाएगी, तो क्षेत्र में अमन हो जाएगा। मगर सच यही है कि अगले 20-30 वर्षों तक सेना रास्ते से हटने वाली नहीं। दिक्कत सेना के रुतबे को लेकर भी है। पाकिस्तान में यह मानसिकता है कि जब तक फौज साथ नहीं है, सरकार शासन नहीं कर सकती। हालांकि उसमें कुछ उदार अधिकारी भी हैं, पर ज्यादातर कट्टरपंथी हैं। वहां की सेना अभी 'टेस्टिंग द वाटर' के मूड में है। यानी वह देखना चाहती कि पानी कितना गहरा है। इसलिए वह आतंकी हमला करके यह समझने की कोशिश कर रही है कि मोदी सरकार क्या पूर्ववर्ती सरकार की तरह ही प्रतिक्रिया देती है या उससे आगे बढ़ती है। हालांकि वहां एक सोच यह भी है कि चूंकि पाकिस्तान परमाणु राष्ट्र है, इसलिए 'युद्ध' के नीचे जितना हो सके, भारत को परेशान किया जाए, ताकि कश्मीर का मुद्दा जिंदा रहे। वैसे इस मानसिकता के कारण पाकिस्तान की सेना ने कई मुसीबतें भी मोल ले ली हैं। जैसे कि पाकिस्तानी फौज कश्मीर में मोर्चा खोले हुए है, अफगानिस्तान में भी वह लड़ रही है और वजीरिस्तान में भी वह तालिबान के सामने है। यानी उसने चारों तरफ मोर्चा खोल रखा है। जबकि इतिहास गवाह है कि जब भी सेना ने एक से अधिक मोर्चा खोला है, उसे मात मिली है। इसका ज्वलंत उदाहरण हिटलर हैं। जर्मनी ने जब रूस में भी अपना मोर्चा खोला, तो उसे काफी नुकसान पहुंचा। निश्चय ही यही हाल पाकिस्तान का भी होगा।
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फिर बात कैसे बनेगी? असल में, हमें अपनी काबिलियत के हिसाब से रणनीति बनानी होगी। मोदी और नवाज शरीफ सरकारें वार्ता की मेज पर बैठना चाहती हैं, तो उन्हें जरूर बैठना चाहिए। मगर इस बातचीत में सेना जैसे बड़े खिलाड़ी को नजरंदाज नहीं करना चाहिए। भारत-पाकिस्तान संबंध का इतिहास यही बताता है कि जो समझौते सेना के साथ हुए, वे सफल रहे हैं। सीज फायर लाइन, लाइन ऑफ कंट्रोल या सिंधु जल संधि जैसे उदाहरण हमारे सामने हैं, जबकि जो समझौता हमने वहां के नेताओं के साथ किया, सेना ने उसे नजरंदाज कर दिया। मसलन, लाहौर घोषणा। इसलिए जरूरी है कि प्रस्तावित राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार स्तर की वार्ता के बाद भारत और पाकिस्तान की सेना भी वार्ता की मेज पर बैठें। वर्दी वालों को वार्ता की मेज पर बिठाए बिना सफलता मुश्किल है। पाकिस्तान में दरअसल दो 'राजधानियां' हैं- इस्लामाबाद और रावलपिंडी। इस्लामाबाद जरूर राजनीतिक राजधानी है, पर सेना का गढ़ होने के कारण रावलपिंडी का महत्व भी कम नहीं है। यह समझना जरूरी है कि अगर अमेरिका के राष्ट्रपति चार घंटे के लिए भी पाकिस्तान की जमीन पर उतरते हैं, तो एक घंटे का समय प्रधानमंत्री को देने के बाद बाकी का वक्त सेना के अधिकारियों के साथ यों ही नहीं बिताते। जब सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश वहां की सेना को महत्व दे सकता है, तो हम क्यों नहीं? आखिर आतंक की चाबी तो उसी के पास है।
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-लेखक सामरिक मामलों के विशेषज्ञ हैं
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