पिछला हफ्ता पाकिस्तान के लिए भयानक रहा है। घरों से बाहर निकलने वाला कोई भी सुरक्षित नहीं था। तहरीक-ए लबैक पाकिस्तान (टीएलपी) के कैडरों ने सड़कों पर पूरी बर्बरता का प्रदर्शन किया। टीएलपी इस्लामी विचारधारा वाली एक इस्लामी राजनीतिक पार्टी है, जो सरकार, न्यायपालिका और सेना के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रही थी। यह प्रदर्शन उस ईसाई महिला आसिया बीबी के मुकदमे की पृष्ठभूमि में हुआ, जिस पर खेतों में काम करते हुए उसी बर्तन से पानी पीने की कोशिश करने के बाद ईशनिंदा का आरोप लगाया था, जिससे मुस्लिम महिलाएं पानी पीती थीं। वह मुकदमा सात वर्षों तक चला और हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने उसे निर्दोष बताते हुए दोषमुक्त कर दिया। लेकिन टीएलपी से उसकी जिंदगी को इतना खतरा है कि सुरक्षा कारणों से उसे हिरासत में रखा गया है।
याद करना चाहिए कि पंजाब के गवर्नर सलमान तासीर को इसी गरीब ईसाई महिला की रक्षा करने के कारण उनके अपने सुरक्षा गार्डों ने हत्या कर दी थी। उनके हत्यारे मुमताज कादरी की फांसी के बाद पाकिस्तान में बरेलवी सुन्नी आतंकवाद का उदय हुआ, जिसका प्रतिनिधित्व टीएलपी करता है। टीएलपी की स्थापना एक मुल्ला खादिम हुसैन रिजवी ने की थी। उनकी पार्टी ने हाल ही में हुए चुनाव में कराची में बेहतर प्रदर्शन किया है और खुद वह सड़कों पर विरोध प्रदर्शन करने के लिए जाने जाते हैं तथा पाकिस्तान के किसी शहर में बंद आयोजित करवा सकते हैं। टीएलपी के ज्यादातर प्रदर्शन ईशनिंदा कानून से संबंधित होते हैं। कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि जब से इसने चुनावी राजनीति में प्रवेश किया है, तब से पीएमएलएन के वोट बैंक की तुलना में इसने जमात-ए इस्लामी और जेयूआई-एफ जैसी मुख्यधारा की धार्मिक-राजनीतिक पार्टी के वोट बैंक में सेंध लगाई है।
इस आंदोलन का गठन पूरी तरह से ईशनिंदा के इर्द-गिर्द किया गया है। इसके अनुयायी न केवल देश भर में फैले बरेलवी मदरसों से आते हैं, बल्कि पंजाब की शहरी एवं ग्रामीण आबादी के कम शिक्षित, गरीब लोग भी इसका समर्थन करते हैं। हालांकि मुल्क में मजहबी आतंकवाद बढ़ा है, लेकिन यह नई घटना ज्यादा खतरनाक है, क्योंकि यह आबादी के बीच व्यापक भावनात्मक अपील का आह्वान करती है। इसके मौलवी बहुत ही गंदी भाषा का प्रयोग करते हैं और हिंसा के लिए खुलेआम उकसाते हैं, जिससे न केवल अल्पसंख्यक धार्मिक समुदाय के लोगों का जीवन, बल्कि उदार मुस्लिम भी भीड़ की हिंसा के सामने कमजोर पड़ गया है। मैंने इन नॉन स्टेट ऐक्टर्स के बारे में बार-बार चेतावनी दी है कि ये तत्व अब हाथ से बाहर हो रहे हैं।
आसिया बीबी को रिहा करने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद पहली बार रिजवी ने इमरान खान, जनरल बाजवा और प्रधान न्यायाधीश निसार के बारे में गलतबयानी की है। असल में उन्होंने और टीएलपी के अन्य लोगों ने इमरान खान की पत्नी से अपील की कि वह उन्हें मार दें और घरेलू कर्मचारी व अन्य लोगों से अपील की कि वे बाजवा और निसार की हत्या कर दें। यही नहीं, रिजवी ने बाजवा को कादियानी तक बता दिया, जो पाकिस्तान में गैर-मुस्लिम धार्मिक संप्रदाय है। रिजवी की गलतबयानी से पाकिस्तान के लोग हैरान रह गए और इमरान खान ने टीवी पर टीएलपी को चेतावनी दी कि वह सरकार से न टकराए, नहीं तो उसे सबक सिखाया जाएगा। प्रधानमंत्री की चेतावनी पर ध्यान दिए बिना टीएलपी ने नाराजगी जताते हुए सार्वजनिक संपत्ति पर हमला किया और उसके हजारों समर्थकों ने सड़कों पर उतरकर पूरे मुल्क को बंद करवा दिया। आश्चर्यजनक रूप से सरकार चुप थी और सेना भी इस आंदोलन को खत्म करने के लिए सामने नहीं आई। मानवाधिकार मंत्री डॉ शिरीन मजारी ने एक ट्वीट में कहा, 'रक्तपात से बचने की अपील नॉन-स्टेट ऐक्टरों को एक खतरनाक संदेश देती है और लोकतांत्रिक शांतिपूर्ण प्रदर्शन की अवधारणा को कमजोर करती है। जब मुल्क को निशाना बनाया जाता है, तो उसे अपने संस्थानों के जरिये कानून के राज और संविधान को लागू करना होता है।'
पूरी सरकारी मशीनरी इतनी भयभीत और असहाय थी कि तीन दिन बाद उसने टीएलपी के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किया, जिसमें कई शर्तों में एक शर्त यह सुनिश्चित करना भी है कि आसिया बीबी को ईसीएल यानी एक्जिट कंट्रोल लिस्ट में रखा जाएगा। यानी आसिया बीबी पाकिस्तान से भाग न जाए, इस पर नजर रखी जाए। राजनीतिक विश्लेषक जाहिद हुसैन का कहना है कि सरकार ने हथियार डाल दिए हैं। यह कोई पहली बार नहीं है कि सरकार ने कट्टरपंथियों के आगे घुटने टेके हैं, पर समर्पण की शर्तें कभी इतनी अपमानजनक नहीं थीं। और सुप्रीम कोर्ट से निर्दोष साबित होने के बावजूद आसिया बीबी की परीक्षा अभी खत्म नहीं हुई है। वह कहते हैं कि नागरिक व सैन्य नेतृत्व को उखाड़ फेंकने के टीएलपी के आह्वान को राजद्रोह के रूप में देखा जा सकता है।
हालांकि सरकार का दावा है कि समझौते ने शांति बहाल करने में मदद की है, लेकिन उसकी मनुहार की राजनीति ने शासन के अधिकार को खत्म कर दिया है और मजहबी हकों को और मजबूत किया है। इससे भी ज्यादा खतरनाक बात है कि यह मुद्दा मुख्यधारा की इस्लामी पार्टियों समेत सभी धार्मिक समूहों के लिए जंग की ललकार जैसा बन गया है, जो सड़क पर उतरने की धमकी देते हैं। ईशनिंदा कानून सभी तरह की इस्लामी पार्टियों के लिए, जिन्हें चुनाव में लोगों ने नकार दिया था, सार्वजनिक भावनाओं के दोहन का औजार बन गया है। अब यह मुद्दा टीएलपी जैसे कट्टरपंथी समूहों तक सीमित नहीं रह गया है। ऐसा लगता है कि आसिया बीबी से संबंधित फैसले ने सभी सांप्रदायिक समूहों को एकजुट कर दिया है, जिससे सरकार को आगामी चुनौतियों से निपटने में ज्यादा मुश्किल हो रही है।
अब पूरे पाकिस्तान में यह मांग उठ रही है कि टीएलपी नेताओं को गिरफ्तार किया जाए और उनके खिलाफ राजद्रोह का मुकदमा चलाया जाए। सार्वजनिक एवं निजी संपत्तियों को नष्ट करने वाले कार्यकर्ताओं की भी गिरफ्तारी होनी चाहिए। अगर सरकार अब कार्रवाई नहीं करती, तो इन खलनायकों को प्रोत्साहन मिलेगा और अगली बार बहुत देर हो जाएगी।