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आधी आबादी के वोट की कीमत

सुभाषिनी सहगल अली Published by: Raman Singh Updated Thu, 11 Apr 2019 07:48 PM IST
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सुभाषिनी सहगल अली

महिलाएं आबादी का आधा हिस्सा ही नहीं, मतदाताओं का आधे से अधिक हिस्सा हैं। और तमाम सर्वेक्षण बताते हैं कि वे अपना वोट अपने घर वालों की मर्जी के खिलाफ भी देने लगी हैं। अक्सर वे निवर्तमान सरकार के खिलाफ अपना गुस्सा व्यक्त करते हुए वोट करती हैं। लेकिन, अब भी, उनके मुद्दे, उनकी मांगें और उनके अधिकारों की बात बड़े दलों की घोषणाओं और उनके नेताओं के भाषणों से गायब ही हैं। इस स्थिति के खिलाफ अब महिलाओं का गुस्सा जगह-जगह फूटने लगा है।



पिछले दिनों में ही कुछ उदाहरण सामने आए हैं। बेरोजगारी और कृषि संकट का कितना भयावह असर महिलाओं की जीवन पर पड़ता है, इसका अंदाजा ही लोगों को नहीं है। विलायत के एक अखबार में दस दिन पहले ही एक कहानी छपी थी। पुष्पा की कहानी। वह तमिलनाडु की 30 वर्षीय महिला है, जो आयात के लिए काजू छीलने का काम करती है। उसे 200 रुपये रोज मिलते हैं। काजू छीलने का काम पूरे हाथ को जला देता है और हाथों में फुंसियां निकल आती हैं। काजू को बहुत ही तेज धार की मशीन में काटना पड़ता है और इससे, अक्सर, महिला मजदूरों की उंगलियां कट जाती हैं। पुष्पा की एक उंगली का ऊपर का हिस्सा कट चुका है। हाथों में जलन और फुंसियों के कारण जब पुष्प खाना बनाने के लिए प्याज या मिर्च काटती है, तो दर्द असहनीय हो जाता है। इसी रिपोर्ट में इस बात का जिक्र है कि केरल में सरकार की सख्ती के कारण, काजू छीलने वाली महिलाओं के लिए सुरक्षा-दस्ताने उपलब्ध कराए जाते हैं और उनको न्यूनतम वेतन (रोज के 800 रुपये और उससे अधिक) देना पड़ता है। इसकी वजह से केरल में छिले काजू कुछ महंगे हो जाते हैं, लेकिन वे कंपनियां जो नैतिक मूल्यों पर जोर देने लगी हैं, वे केरल से ही खरीदती हैं।


दूसरी रिपोर्ट जो महाराष्ट्र से आई है, वह तो और भी भयानक है। महाराष्ट्र का बड़ा हिस्सा सूखा-पीड़ित है। इन इलाकों की महिलाओं को अपने परिवारों के साथ गन्ने के खेतों में काम करने के लिए पलायन करना पड़ता है। हाड़-तोड़ मेहनत तो करनी ही पड़ती है। लैंगिक हिंसा का सामना भी करना पड़ता है। और अब यह जानकारी मिली है कि इनमें से अधिकतर महिलाओं, जिनमें बहुत कम उम्र की महिलाएं भी शामिल हैं, का गर्भ उनके शरीर से निकाल दिया गया है। काम कराने वाले ठेकेदार कहते हैं कि वह महिलाओं को गर्भ निकालने के ऑपरेशन के लिए इसलिए मजबूर करते हैं कि माहवारी के दौरान उनकी काम करने की क्षमता कम हो जाती है। ऑपरेशन के लिए वे महिलाओं को एडवांस पैसे देते हैं, जो वे मजदूरी से काट भी लेते हैं। महिलाओं के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले तमाम विपरीत प्रभाव से ठेकेदारों को क्या लेना-देना?


इन्हीं खबरों के बीच, केरल से चौंकाने वाली, खुश करने वाली खबर आई। एक गरीब आदिवासी परिवार की बेटी, श्रीधान्या, ने आईएएस की परीक्षा पास कर ली! उसके मां-बाप मनरेगा मजदूर हैं और बेटी को पढ़ाना उनके बस में नहीं था। श्रीधान्या ने परीक्षा में पास होने के बाद एक समाचार पत्र को बड़े ही सहज भाव में बताया कि चूंकि सरकारी स्कूलों में निःशुल्क और अच्छी शिक्षा मिलती है और सरकार एससी/एसटी छात्र-छात्राओं के लिए कोचिंग का इंतजाम करती है, इसलिए वह परीक्षा की तैयारी करके पास होने के अपने सपने को साकार कर पाई। श्रीधान्या वायनाड की रहने वाली है। उसी वायनाड में चुनाव लड़ने अमेठी के सांसद आ रहे हैं। अमेठी में 50 फीसदी महिलाएं अपना नाम ही लिख सकती हैं और 48 फीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार हैं! जहां सरकार चलाने वाले महिलाओं के प्रति संवेदनशील हैं, वहां महिलाएं क्या नहीं कर सकतीं! लेकिन, देश के अधिकतर हिस्सों में इस तरह की संवेदनशीलता कहां देखने को मिलती है?

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