भारत इस समय आर्थिक और राजनीतिक, दोनों स्तरों पर संकट से गुजर रहा है। लेकिन स्वास्थ्य, शिक्षा, पोषण, लैंगिक समानता जैसे सामाजिक संकेतकों के बारे में क्या कहा जाए, जो किसी भी देश की नींव बनाते हैं और दीर्घकालिक सफलता के लिए प्रमुख हैं? अब जबकि यह साल खत्म होने को है, इन सब मामलों में भारत का रिपोर्ट कार्ड मिला-जुला है। भारत जहां कई मोर्चों पर अपनी स्थिति में सुधार कर रहा है, वहीं दूसरे देश, जिसमें हमारे पड़ोसी राष्ट्र भी शामिल हैं, तेजी से लाभ कमा रहे हैं। दूसरा महत्वपूर्ण मुद्दा निष्पक्षता या समानता है। जहां सुधार होता भी है, वहां भी उसका लाभ लोगों को समान रूप से नहीं मिलता है। राज्यों, जिलों, शहरों व गांवों तथा पुरुषों व स्त्रियों के बीच भारी असमानता है। एक ही परिवार में हर सदस्य को शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण की बराबर सुविधा उपलब्ध नहीं है। बिजली के उपयोग में भी भारत में लैंगिक अंतर है। छह राज्यों (बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, ओडिशा, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल) में किए गए घरेलू सर्वेक्षण के आधार पर नेचर सस्टेनिबिलिटी में प्रकाशित एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, सबसे गरीब घरों में कई बल्ब और पंखे थे, लेकिन खाना बनाने वाले स्थानों में इनका शायद ही उपयोग होता था।
महिलाओं के स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था में भागीदारी के मामले में बढ़ती असमानता के कारण भारत विश्व आर्थिक मंच के ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स में चार स्थान नीचे खिसक कर 112 वें स्थान पर पहुंच गया है और चीन, श्रीलंका, नेपाल व बांग्लादेश जैसे पड़ोसियों से भी पिछड़ गया है।
वर्ष 2015-16 की अवधि के आंकड़े माध्यमिक शिक्षा तक लड़कियों की बढ़ती भागीदारी को दर्शाते हैं, लेकिन जब उच्च शिक्षा की बात आती है, तो लड़कियों का नामांकन लड़कों की तुलना में कम होता है। उच्च शिक्षा पर नवीनतम अखिल भारतीय सर्वेक्षण के मुताबिक, उच्च शिक्षा में कुल नामांकन अनुमानित रूप से 3.66 करोड़ है, जिसमें लड़कों की संख्या 1.92 करोड़ और लड़कियों की संख्या 1.74 करोड़ है। भारत, जहां बॉलीवुड और समाज मातृत्व के प्रति श्रद्धा रखते प्रतीत होते हैं, ऐसा देश है, जहां अस्वीकार्य रूप से बच्चों के जन्म के समय बड़ी संख्या में महिलाएं मरती हैं। नवीनतम सैंपल रजिस्ट्रेशन बुलेटिन के मुताबिक, अच्छी खबर यह है कि भारत में मातृत्व मृत्युदर (प्रति लाख जन्म पर महिलाओं की मौत) में कमी आई है, वर्ष 2011-13 में जहां मातृत्व मृत्युदर 167 थी, वह 2015-17 में घटकर 122 पर आ गई। लेकिन अब भी प्रसव के दौरान काफी महिलाओं की मौत होती है। भारत संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्य (वर्ष 2030 तक प्रति लाख जन्म पर 70 मातृत्व मृत्युदर) से काफी दूर है। केवल केरल, महाराष्ट्र और तमिलनाडु ने 2030 से काफी पहले इस लक्ष्य को हासिल किया है। नवजातों को बचाने के मामले में भी भारत ने अपने रिकॉर्ड में सुधार किया है। भारत में प्रति लाख जन्म पर नवजात मृत्युदर वर्ष 2012 के 42 के आंकड़े से घटकर वर्ष 2017 में 33 पर आ गई है। हालांकि पड़ोसी बांग्लादेश में इससे संबंधित आंकड़ा 27 और श्रीलंका में 8 है। लेकिन राष्ट्रीय आंकड़े अंतर्राज्यीय असमानताओं को छिपाते हैं। इंडिया स्पैंड पोर्टल की एक रिपोर्ट बताती है कि भारत के 21 बड़े राज्यों में से नौ में स्वास्थ्य क्षेत्र के प्रदर्शन में गिरावट देखी गई है। उनमें से पांच राज्य (बिहार, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश और ओडिशा) सरकार के थिंक टैंक नीति आयोग द्वारा इस जून में जारी हेल्दी स्टेट्स प्रोग्रेसिव इंडिया रिपोर्ट के दूसरे संस्करण के मुताबिक, भारत के सबसे गरीब राज्यों में भी शामिल हैं।
बिहार में आधार वर्ष (2015-16) और संदर्भ वर्ष (2017-18 ) के बीच गिरावट मुख्य रूप से कम वजन वाले शिशुओं के जन्म, जन्म के समय लैंगिक अनुपात में असंतुलन, टीबी के उपचार की सफलता दर, सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं आदि की गुणवत्ता मान्यता के कारण है। उत्तर प्रदेश के मामले में भी कम वजन वाले शिशुओं का जन्म, टीबी उपचार की सफलता दर, जन्म पंजीकरण स्तर के साथ निपटने में राज्य का प्रदर्शन- कुछ ऐसे कारक थे, जो स्वास्थ्य क्षेत्र के प्रदर्शन में गिरावट का कारण बने। मोदी सरकार का दावा है कि स्वच्छ भारत अभियान के तहत उसने 9.5 करोड़ शौचालयों का निर्माण करवाया, लेकिन जमीनी स्तर पर चुनौतियां अब भी हैं, खासकर रखरखाव और पानी की उपलब्धता से संबंधित। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम द्वारा जारी वार्षिक मानव विकास सूचकांक-2019 की रिपोर्ट में भारत कुल 189 देशों की सूची में 129वें स्थान पर है, जो पिछले वर्ष के रैंक से एक पायदान ऊपर है। हालांकि भारत अब भी 36.4 करोड़ गरीब लोगों का घर है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में पाया गया कि प्रगति के बावजूद समूह आधारित असमानताएं भारत में बनी हुई हैं, जो खासकर महिलाओं और लड़कियों को प्रभावित कर रही हैं। भारतीय लड़कियां क्षेत्रीय औसत की तुलना में कम अवधि के लिए स्कूल जाती हैं।
मोदी सरकार ने वित्तीय समावेशन के लिए प्रधानमंत्री जन धन योजना, सार्वभौमिक स्वास्थ्य देखभाल के लिए आयुष्मान भारत, कुपोषण से निपटने के लिए पोषण अभियान जैसे विकास पहलों की शुरुआत की है, लेकिन 'सबके विकास' के लिए नीति निर्माताओं को अति निर्धनों व हाशिये के लोगों के सेवा से बाहर होने के मुद्दे को सर्वोच्च प्राथमिकता में रखने की जरूरत है। एक अन्य अध्ययन (जिसमें अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान के शोधकर्ता शामिल थे) के अनुसार, वर्ष 2006 से 2016 के बीच एकीकृत बाल विकास योजना के तहत पूरक आहार पाने वाली लड़कियों और महिलाओं की संख्या में चार गुना वृद्धि होने के बावजूद गरीबों का एक बड़ा हिस्सा इससे लाभान्वित होने से वंचित है।
कुल मिलाकर कहने का तात्पर्य यह है कि भारत को अपनी नींव मजबूत करने पर अधिक ध्यान देना चाहिए। अगर नींव मजबूत नहीं है, तो उस पर बनी संरचना मजबूत नहीं हो सकती।