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सफर कराती हुई कथा

Sat, 15 Jun 2013 10:03 PM IST
हिमानी दीवान
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अपने बारे में लिखने का जोखिम लेना किसी भी लेखक के लिए आसान नहीं होता। जब बात आत्मकथा लिखने की हो, तो ईमानदार रहने की मजबूरी और सच-झूठ के बीच संतुलन बनाए रखने की कोशिश अक्सर कथ्य को बोझिल बना देती है।
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साहित्य का इतिहास देखें तो कई लेखकों ने अपनी आत्मकथाएं लिखी हैं और उन पर खूब चर्चा भी हुई है। फिर चाहे वह हरिवंश राय बच्चन की आत्मकथा-‘दशद्वार से सोपान तक’ हो या अमृता प्रीतम की ‘रसीदी टिकट’।

आत्मकथ्य की इस दुनिया में ‘माटी, पंख और आकाश’ के जरिये कदम रखने वाले ज्ञानेश्वर मूले ने अपनी किताब में एक नया प्रयोग किया है। पेशे से राजनयिक और भारतीय विदेश सेवा का लंबा अनुभव होने के कारण की गई यात्राओं को जिस तरह ज्ञानेश्वर ने अपनी आत्मकथा में जगह दी है, वह बेहद दिलचस्प है।
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देश और दुनिया के अलग-अलग स्थानों से लगाव, वहां की संस्कृति और सोच का प्रभाव किस तरह एक व्यक्ति की जिंदगी पर असर करता है, यह इस किताब में बखूबी लिखा गया है।
 
जीवन के तीन महत्वपूर्ण पड़ावों को लेखक ने किताब के तीन खंडों माटी, पंख और आकाश के जरिये पाठक तक पहुंचाने की कोशिश की है।

इस किताब में भारत से बाहर जाकर बसने वाले लोगों के भीतर की उलझन, सोच और मानसिकता को भी बेहद सरल और सटीक लहजे में प्रस्तुत किया गया है।

आत्मकथा होने के बावजूद लेखक ने खुद को अपने लेखन पर हावी न करते हुए पाठकों को देश-दुनिया से जुड़े कई तरह के  नए अनुभव और जानकारी लेने का भी मौका दिया है।
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