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विश्व बंधुत्व ही जिनका उद्देश्य रहा

Fri, 15 Nov 2013 08:44 PM IST
शंकर शरण
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आदि-ग्रंथ का अध्ययन करने वाला पाएगा कि उसकी आत्मा, भावना और विचार सब कुछ वही है, जो संपूर्ण भारत के दार्शनिक-आध्यात्मिक तथा लोक साहित्य में सदैव बना रहा है। समय-समय पर विभिन्न गुरुओं और संतों ने देश-काल की आवश्यकतानुरूप किसी शिक्षा पर अधिक बल दिया, अथवा किसी को नए रूप में व्याख्यायित करके दोहराया।
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अगर गहराई से देखें, तो स्पष्ट हो जाएगा कि नानक का धर्म उससे कुछ अलग नहीं था। सिख गुरुओं के विचारों, कथाओं और नामकरण में सर्वत्र हरि, गोविंद, राम आदि भरे हुए हैं। उदाहरण के लिए आदि-ग्रंथ में ‘हरि’ शब्द  8,300 बार आया है और ‘राम’ शब्द 2,500 बार। स्वयं गुरु नानक ने 630 बार ‘हरि’ शब्द का उपयोग किया है। इन शब्दों को दार्शनिक अर्थ में लें या आध्यात्मिक अर्थ में या लोक-पौराणिक संदर्भ में-किसी भी स्थिति में उन्हें पारंपरिक भारतीय चेतना से अलग करके नहीं देखा जा सकता।

इसका प्रमाण यह भी है कि आदि-ग्रंथ में सैकड़ों विवरण ठीक वही हैं, जो भारत के अन्य संत साहित्य में हैं। उसकी ईश्वर-दृष्टि एवं विश्व-दृष्टि में भी ब्रह्म, अद्वैत, शिव और शक्ति, माया, कर्मफल, पुनर्जन्म, मुक्ति, निर्वाण आदि संकल्पनाएं उन्हीं अर्थों में मिलती हैं। गुरु नानक ने ही जन्म-मरण के चक्र का विविध रूपों में उल्लेख पांच सौ बार से अधिक किया है। उनके शिष्यों और परवर्ती सिख-गुरुओं ने भी उक्त सभी संकल्पनाओं को रेखांकित किया है। पांचवें गुरु ने नाम स्मरण की महिमा उसी रूप में रखी है कि इसके निरंतर स्मरण से भय और मृत्यु पर विजय मिलती है।
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ईश्वर स्वयं हमारे अंतर में है, वह किसी अदृश्य आसमान में रहने वाली अलग सत्ता नहीं है-यह बात आदि-ग्रंथ में सैकड़ों बार कही गई गई है। स्वयं गुरु नानक ने इसे दो सौ से भी अधिक बार दोहराया है। स्पष्ट है कि यह गुरु नानक के धर्म को पश्चिमी अर्थों वाले रिलीजन से ठीक विपरीत भारत के सनातन विचार जैसा दिखाता है। भारतीय आध्यात्मिक चेतना में एक ही वृक्ष पर दो पक्षी की उपमा दी गई है; एक जो फल खाता है, दूसरा जो उसे खाते हुए देखता है। आदि-ग्रंथ में भी इसका जिक्र है। मनुष्य, विश्व और ईश्वर के बारे में उसकी अवधारणाएं तथा व्यावहारिक आचरण की सीख भारतीय मनीषा से भिन्न नहीं है।

गुरु नानक ने कहा था, वेद पढ़ने से पाप वृत्ति नष्ट हो जाती है। आदि ग्रंथ में राम, द्वापर में कृष्ण अवतारों का उल्लेख करते हुए कलि-युग में नानक, अंगद, अमर (सिख गुरुओं) के अवतार की बात कही गई है। उसमें कृष्ण की कथाएं तो इतनी मधुरता और विस्तार से वर्णित हैं कि लगभग एक तिहाई गुरु-ग्रंथ में वही है। मनुष्य का ईश्वरत्व प्राप्त कर सकना तथा ईश्वर का मनुष्य रूप में अवतार लेना, ये एक ही विचार के दो पहलू हैं। यह नानक के वचनों और आदि-ग्रंथ में सहजता से मिलता है।

स्वयं गुरु नानक भारत के उन सभी तीर्थों की यात्रा पर गए थे। गुरु तेग बहादुर, गुरु गोविंद सिंह ने त्रिवेणी में स्नान किया था। इन्साइक्लोपीडिया ब्रिटानिका के नवें संस्करण तक तो हर-मंदिर को विष्णु मंदिर ही कहा गया था। उसी हरि-मंदिर को वर्ष 1762 में अहमद शाह अब्दाली ने तोपों से उड़ा दिया तथा पवित्र सरोवर को अपवित्र किया था। बाद में उसे पुनः बनाया गया। हरिमंदिर का पुनर्निर्माण करवाने वाले हिंदू थे या सिख, यह आप उसी तरह तय कर सकते हैं, जैसे वाराणसी के विश्वनाथ मंदिर या मथुरा के कृष्ण मंदिर के पुनर्निर्माण करवाने वाले हिंदू थे या सिख। स्वयं वह पुनर्निर्माण करवाने वालों ने इसमें कोई भेद नहीं माना था। महाराजा रणजीत सिंह के राज्य को ब्रिटिश दस्तावेजों में ‘अंतिम हिंदू राज्य’ ही कहा गया है। भारत की यात्रा पर आए विभिन्न यूरोपीय विद्वानों ने सिख धर्म को भारतीय अध्यात्म की अविच्छिन्न परंपरा में ही स्वीकार किया।

अतः गुरु नानक सबके हैं, विशेषकर संपूर्ण भारतवासियों के। उनकी इसी विशेषता के कारण वह वृहत भारतीय समाज से अलग कोई रिलीजियस मतवाद नहीं माने जाते। गुरु नानक की सीख भी यही है। उन्हें हम संकीर्ण, पश्चिमी अर्थ वाला मजहबी ‘वाद’ न मानें। स्वयं आदि-ग्रंथ यही दिखाता है।
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