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भारतीय जन-जीवन के सच्चे चितेरे गुरदयाल

Wed, 17 Aug 2016 07:04 PM IST
देश निर्मोही
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गुरदयाल सिंह
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पंजाब के मालवा क्षेत्र में आर्थिक व सामाजिक आधार पर अत्यंत पिछड़ा फरीदकोट जिले का छोटा-सा कस्बा – जैतो। कस्बे के बस अड्डे के सामने मुख्य बाजार से होते हुए एक कच्ची मिट्टी की सड़क बहुत भीड़ भरी जगहों को छोड़ते हुए एक चौराहे पर धक से रुक जाती है। इस चौराहे पर दाईं ओर है पंजाब नेशनल बैंक और उसके पीछे गली में दाईं ओर है मकान नंबर 4/54।  लगभग बाईस साल पहले अपने मित्र देवेन्द्र पाल के साथ गुरदयाल सिंह के घर तक पहुंचते हुए इसी कच्ची मिट्टी की महक दूर तक चली आई थी और साथ चले आए थे मढ़ी का दीवा, अध चांदनी रात और परसा जैसे उपन्यासों के ढेर सारे पात्र–बिशना, जगसीर, मोदन, परसा, दयाकौर, जो इसी मिट्टी की कोख से उपजे थे। गुरदयाल सिंह स्वतंत्र भारत के एक प्रतिनिधि उपन्यासकार थे। उनसे मिलना और उनके रचना संसार से होकर गुजरना, दोनों ही अपने आप में अनूठे अनुभव थे।
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यह संयोग विरले ही देखने को मिलता है कि एक ही व्यक्ति में एक अच्छा इंसान और अच्छा लेखक एक साथ हों। पंजाबी साहित्य में यह संयोग गुरदयाल सिंह के रूप में देखने को मिला। परसा का हिंदी अनुवाद आधार से प्रकाशित हो, इस आशय का एक पत्र मैंने उन्हें लिखा, तो उन्होंने बिना किसी पूर्व शर्त के सहमति दे दी। 1994 में पहली बार उनसे मिलना हुआ और उन्होंने अपना सर्वश्रेष्ठ आधार जैसे एक नए प्रकाशन के खाते में डाल दिया। उनसे जो रिश्ता बना, वह दिनोंदिन प्रगाढ़ होता गया। बाद में उन्होंने अपने सभी उपन्यासों व अन्य रचनाओं के हिंदी अनुवादों के अधिकार आधार प्रकाशन को दे दिए। गुरदयाल सिंह के पंजाबी में दस उपन्यास और 11 कहानी संग्रह प्रकाशित हुए हैं। तीन नाटक, तीन गद्य पुस्तकें, लगभग दस बाल साहित्य की पुस्तकें, आत्मकथा और ढेरों अनूदित पुस्तकें।  उनकी पहली कहानी 1957 में पंजाबी की चर्चित पत्रिका पंज दरिया में छपी और पहला उपन्यास मढ़ी का दीवा 1964 में।

प्रख्यात आलोचक नामवर सिंह ने इस उपन्यास की तुलना तोल्स्तोय के उपन्यास युद्ध और शांति से करते हुए लिखा कि उन्नीसवीं शताब्दी में जब यूरोप में उपन्यास पतन  की ओर जाने लगा, तभी एक पिछड़े देश तथा पिछड़ी कही जाती भाषा के एक उपन्यास ने इसे चढ़त की ओर मोड़ दिया। यह उपन्यास था तोल्स्तोय की रचना युद्ध और शांति और भाषा थी रूसी। ऐसा ही कुछ भारतीय साहित्य के गद्य क्षेत्र में घटा, जब भारतीय उपन्यास अपने शिखर से पतन की ओर जाने लगा, तो बीसवीं सदी के छठे दशक में एक पिछड़ी कही जाने वाली भाषा ने इसे चढ़त की ओर मोड़ दिया। वह उपन्यास था मढ़ी का दीवा और उसकी भाषा थी पंजाबी। रूसी में भी इसका अनुवाद हुआ और लगभग 10 लाख प्रतियां छपीं। राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम द्वारा निर्मित इसी उपन्यास पर आधारित फिल्म को राष्ट्रीय अवार्ड मिला।
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गुरदयाल सिंह के उपन्यास भारतीय जन-जीवन की सच्ची तस्वीर हैं। उनके उपन्यासों में हरे-भरे खेत-खलिहानों, कुओं-तलाबों, ऊबड़-खाबड़ गलियों, कच्चे मकानों, पक्के चौबारों और घर-आंगनों का यथार्थपरक चित्रण हुआ है। उनके लेखन की ताकत इसमें थी कि उन्होंने उन लोगों का पक्ष लिया है, जिन्हें सदियों से ‘नीच' कहकर तिरस्कृत किया जाता रहा है। यही किसी साहित्यकार की मानवता की कसौटी है। आज वह हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनका साहित्य हमेशा ‘अनहोनो’ को सही राह दिखाता रहेगा।
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