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आसियान के मेहमान

शशांक Updated Wed, 24 Jan 2018 07:16 PM IST
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भारत-आसियान

पिछले वर्ष आईसीसीआर ने रामायण के प्रदर्शन के लिए उन देशों से सांस्कृतिक कलाकारों को बुलाया था, जहां काफी संख्या में भारतीय मूल के लोग रहते हैं। उनके साथ आसियान देशों के कलाकारों को भी बुलाया गया। तो मालूम चला कि वहां पर भी रामायण का काफी प्रचलन है और कई बार अपनी घरेलू राजनीति और अन्य वजहों से यह पता ही नहीं चलता कि ब्रिटिश उपनिवेशवाद से पहले से दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों के साथ हमारे सांस्कृतिक संबंध काफी गहरे तौर पर जुड़े हुए हैं। संस्कृति के क्षेत्र में भारत की देन को वे देश अब भी काफी महत्व देते हैं।



लेकिन आधुनिक समय में आसियान देशों के साथ संबंध बढ़ाने के लिए पीवी नरसिंह राव की तारीफ करनी होगी। जिस समय वह देश के प्रधानमंत्री बने, शीतयुद्ध खत्म हो चुका था, और भारत आर्थिक संकट से गुजर रहा था। सीमापार और अन्य देशों से लगातार आतंकवाद  भारत के दरवाजे पर दस्तक दे रहा था, चीन अपना दबदबा बढ़ाए जा रहा था। ऐसे दौर में नरसिंह राव ने भारत की विदेश नीति में लुक ईस्ट पॉलिसी की घोषणा की। उन्होंने कई देशों की यात्राएं की, और उन्होंने कहा कि हमें दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के साथ आर्थिक और सामरिक रूप से संबंध बढ़ाने चाहिए। भारत नरसिंह राव के कार्यकाल में ही आसियान देशों का क्षेत्रीय संवाद साझीदार बना, फिर पूर्ण संवाद साझीदार बना।


इसके बाद 2001 में भारत आसियान के साथ समिट लेवल पार्टनर बन गया, जब अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे। अटल जी ने लुक ईस्ट पॉलिसी को खूब तेजी से आगे बढ़ाया। उस समय मैं स्वयं विदेश मंत्रालय में आर्थिक मामलों का सचिव था, जसवंत सिंह तब हमारे विदेश मंत्री थे। मुझे विदेश मंत्रालय के आर्थिक मसलों में काफी छूट दे दी गई थी कि किसी तरह से आसियान देशों के साथ रिश्ते को आगे बढ़ाया जाए। यही मेरी प्राथमिकता थी। मैंने जब इन देशों से संपर्क करने की कोशिश की, तो सबसे पहले सिंगापुर ने इसमें काफी दिलचस्पी दिखाई। फिर इंडोनेशिया, मलयेशिया और थाईलैंड जैसे अन्य आसियान देशों ने भी रुचि जताई। आर्थिक मामले में तो वे भारत के साथ संबंध बढ़ाना ही चाहते थे, लेकिन उन्हें एक डर था कि आतंकवाद जो भारत के दरवाजे पर दस्तक दे रहा है, कहीं दक्षिण-पूर्व एशिया में भी न फैल जाए। उन्होंने देखा कि जिस तरह से आतंकवाद फैल रहा है और भारत आतंकवाद से काफी पीड़ित रहा है, तो अगर इस मामले में भारत से सूचनाओं का आदान-प्रदान किया जाए, तो उन्हें आतंकवाद से लड़ने और अपने देश में सुरक्षा और स्थिरता बनाए रखने में मदद मिल सकती है।


इसके अलावा, चीन अपना दबदबा बढ़ाए जा रहा था, और अब पड़ोसी देशों पर काफी दबाव बना रहा था। आसियान देशों में चीनी मूल के नागरिक काफी संख्या में रहते हैं, और आर्थिक नियंत्रण की शक्ति ज्यादातर चीनी लोगों के हाथों में है। बाकी समुदाय नौकरी, श्रम और अन्य रोजगार में थे। इसलिए उन देशों को लगा कि अगर भारत के साथ रिश्तों को आगे बढ़ाया जाता है, तो एक तरह का संतुलन पैदा होगा और न सिर्फ एशिया में शक्ति संतुलन स्थापित होगा, बल्कि उनके अपने आंतरिक हित के लिए भी काफी अच्छा रहेगा। राजग-1  सरकार में आसियान देशों के साथ रिश्ते को काफी आगे बढ़ाया गया। मुझे याद है, तत्कालीन राष्ट्रपति के आर नारायणन ने थाईलैंड के शीर्ष नेताओं से पूछा था कि हम समिट लेवल पार्टनरशिप चाहते हैं, आपकी क्या राय है। तो उन्होंने कहा था कि हम पूरी कोशिश करेंगे कि आपको समिट लेवल पार्टनरशिप मिलनी चाहिए और वह मिल गई। 2001 से शिखर स्तर पर बातचीत जारी रही है।


आसियान में दो तरह के देश हैं, एक तो पुराने आसियान मुल्क हैं और दूसरे चार नए मुल्क हैं-कंबोडिया, म्यांमार, लाओस और वियतनाम। इन नए देशों में आर्थिक प्रगति बहुत ज्यादा नहीं हुई थी और प्रौद्योगिकी के मामले ये देश पिछड़े हुए थे, तो उन्होंने कहा कि भारत खासकर इन देशों को और ज्यादा मदद कर सकता है, क्योंकि ये भारत के बहुत नजदीक हैं और चीन के भी समीपवर्ती देश हैं। तो उनकी रणनीति यह रही है कि भारत और चीन से संबंध रखते हुए ऐसा संतुलित रवैया अपनाया जाए कि उनकी अपनी स्वायत्तता बरकरार रहे। भारत ने इन देशों की प्राथमिकताओं के ध्यान में रखते हुए अपना सहयोग बढ़ाया है।


जबसे मोदी सरकार आई है, तबसे इन्होंने ऐक्ट ईस्ट पालिसी शुरू की है, क्योंकि भारत के मित्र देशों में इस पॉलिसी को लेकर यह गलतफहमी रही कि भारतीय विदेश नीति को और सक्रियता दिखानी चाहिए और अगर भारत को एशिया का नेतृत्व करना है, तो उसे ऐक्शन-ओरियेंटेड विदेश नीति अपनानी होगी। पिछले नवंबर में चीन ने यह घोषणा की कि 2050 तक वह आर्थिक, सामरिक और साइबर स्पेस में दुनिया का नंबर एक देश बन जाएगा। इसलिए अब भारत के लिए यह जरूरी हो गया है कि अपनी ऐक्ट ईस्ट पॉलिसी को पूरे जोर-शोर से बढ़ाए, अन्यथा चीन के आसपास के जो देश हैं, उनमें हीनता की भावना बढ़ती चली जाएगी। फिर भारत को अपने हितों को आगे बढ़ाने में भी मुश्किल होगी।


गणतंत्र दिवस के मौके पर आसियान देशों के नेताओं को आमंत्रित करने का मतलब है कि विदेश नीति में अब आसियान देश भारत की प्राथमिकता में हैं, और चीन के वर्चस्व पर अंकुश लगाने की दृष्टि से यह महत्वपूर्ण है। कहने का मतलब है कि भारत अब अपने सांस्कृतिक मूल्यों के साथ-साथ प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अपनी विशेषज्ञता के साथ ऐसी विदेश नीति पर आगे बढ़ेगा, जो चीन से थोड़ा भिन्न होगा। हमारी नीति सहयोगी देशों के प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करने की नहीं है। दावोस में प्रधानमंत्री ने घोषणा की कि भारत बड़े देशों के साथ सहयोग करने के लिए तैयार है। उन्होंने वर्चस्ववाद, आतंकवाद, संरक्षणवाद को छोड़कर परस्पर विकास के लिए वसुधैव कुटुंबकम का संदेश दिया। आसियान देश सामरिक दृष्टि से भी भारत के लिए महत्वपूर्ण हैं।

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