अप्रत्यक्ष कर पारंपरिक रूप से सरकारों के लिए कर राजस्व का एक महत्वपूर्ण स्रोत रहा है। लंबे समय तक अप्रत्यक्ष कर को राजस्व के साधन के रूप में देखा जाता था, न कि आर्थिक विकास को बढ़ावा देने वाले साधन के रूप में। नतीजतन लंबे समय तक यह पुराने ढंग से चलता रहा, जिसमें कोई सुधार न हुआ। 1970 के दशक के बाद गठित विभिन्न समितियों ने इनमें व्यापक सुधार की सिफारिश की, जिनमें से कुछ को लागू किया गया। बाद में अप्रत्यक्ष कर में कई बदलाव हुए, जो अंततः 2005 में मूल्य वर्द्धित कर (वैट) के रूप में सामने आए। जीएसटी उसी वैट प्रणाली का विस्तार है।
जीएसटी में तकनीक का भी व्यापक उपयोग किया गया है। पूरा जीएसटी नेटवर्क इस पर निर्भर है। ई-वे बिल इस तंत्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, क्योंकि यह वस्तुओं की आवाजाही को कर प्रशासन की नजर में रखता है। इसके अलावा ये बिल आपूर्तिकर्ताओं के जीएसटी रिटर्न में स्वतः शामिल हो जाते हैं, जिन्हें पहले मैनुअली जांचना पड़ता था। चूंकि अब सब कुछ ऑनलाइन है, तथा ई-वे बिल का प्रारूप पूरे देश में एक जैसा है, इसलिए पारगमन दस्तावेजों की जांच में लगने वाला समय घट जाता है तथा विभिन्न राज्यों में अलग-अलग प्रक्रियाओं से पैदा होने वाली उलझन भी खत्म हो जाती है।
जीएसटी का एक लाभ यह भी है कि इससे क्षेत्रीय असमानताएं धीरे-धीरे कम हो रही हैं। चूंकि पहले ज्यादातर कर उत्पादन के आधार पर थे, इसलिए कर राजस्व का ज्यादा हिस्सा उत्पादक राज्यों द्वारा अर्जित किया जाता था। अब चूंकि जीएसटी गंतव्य पर आधारित है, इसलिए कर राजस्व उन राज्यों को मिलता है, जहां उपभोग होता है। इससे उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश जैसे गरीब, उपभोक्ता राज्यों को मदद मिलती है। हालांकि जिन राज्यों को इससे राजस्व में हानि की आशंका थी, उन्हें केंद्र सरकार ने पांच साल तक मुआवजा दिया। मुआवजा बंद करने के बाद भी राज्यों के राजस्व में कोई बड़ी कमी नहीं हुई। मतलब जीएसटी राजस्व राज्यों में सुव्यवस्थित हो गया है।
हालांकि, भारतीय जीएसटी एक ऐसा मॉडल है, जो इतने बड़े कर सुधार की जटिलताओं और उनके बाद के समाधान को दर्शाता है। फिर भी कर ढांचे के कुछ पहलू जीएसटी की सरलता के वादों के विपरीत हैं। इसलिए, कई मामलों में परिणाम अपेक्षा से कम रहे हैं। जीएसटी, कर दरों और विभिन्न छूटों से संबंधित नियम अब भी बदल रहे हैं, जिससे पिछले सात वर्षों में जीएसटी के प्रदर्शन का समग्र आकलन करना कठिन है। फिर भी शुरुआती आंकड़ों से कुछ निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं। हालांकि जीएसटी ज्यादा व्यवसायों को कर के दायरे में लाने में सफल रहा है, लेकिन उन्हें करों का भुगतान करने के लिए बाध्य करने का काम अब भी बाकी है।
जीएसटी से कर प्रशासन पर दबाव बढ़ा है, क्योंकि छोटे व्यवसायी कुल पंजीकृत लोगों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, फिर भी उनका वास्तविक कर योगदान अपेक्षाकृत नगण्य है। तर्क दिया जाता है कि इन करदाताओं को छोड़ दिया जाए, प्रशासन को उच्च बोझ से राहत दिलाई जाए और बड़े करदाताओं को बेहतर सुविधा देने पर ध्यान केंद्रित किया जाए। इसके लिए पंजीकरण सीमा को सावधानीपूर्वक निर्धारित करने की जरूरत है, ताकि अधिक लोग इसमें शामिल न हों। अन्य विशेषता यह है कि छोटे व्यवसायों का कर अनुपालन बढ़ा है। लेकिन शोध से पता चला है कि छोटी कंपनियों को अपने परिचालन में ज्यादा अनुपालन लागतों का सामना करना पड़ता है। हालांकि छोटी कंपनियों के लिए कंपोजिशन स्कीम (जिसमें छोटे व्यवसायी नियमित जीएसटी दरों के बजाय निश्चित कर दरों का विकल्प चुन सकते हैं।) लाया गया है, लेकिन सीमा से नीचे के डीलरों के एक बड़े वर्ग ने इसका विकल्प नहीं चुना है, जबकि जीएसटी पंजीकरण कराया है।
यह सच है कि जीएसटी में किसी राज्य के हित से ज्यादा राष्ट्रीय हितों को तवज्जो दी गई है। एकीकृत वस्तु एवं सेवा कर (आईजीएसटी) से प्राप्त आय का प्रबंधन भी एक बड़ा विषय है। पचास प्रतिशत आईजीएसटी मूलतः वितरण के लिए केंद्र द्वारा संग्रहीत राज्य राजस्व है। यह कर वस्तु एवं सेवाओं के अंतरराज्यीय आवाजाही के बदले वसूला जाता है, इसलिए इसे आपूर्ति की जगह/राज्य के अनुसार वितरित किया जाना चाहिए। लेकिन आईजीएसटी राजस्व के आवंटन पर अब भी काम जारी है।
भविष्य में जीएसटी के समक्ष अवसर और चुनौतियां, दोनों होंगी। यह जीएसटी परिषद पर निर्भर है कि वह इन चुनौतियों को देखे और बेहतर कर प्रशासन के अवसरों को पहचाने। जीएसटी को तर्कसंगत बनाने की काफी गुंजाइश है। इनमें जीएसटी का अधूरा क्रियान्वयन एवं कर की बहुत ज्यादा दर सबसे शीर्ष पर है। हालांकि राज्यों की आशंकाओं को दूर करने के लिए कई दरों में संशोधन एवं छूट के प्रयास केंद्र ने किए हैं, लेकिन व्यापक संदर्भ में वे जीएसटी की दक्षता को कम करते हैं। इसलिए लगातार आधार बढ़ाने की जरूरत है, ताकि देश में जीएसटी राजस्व बढ़े। अर्थव्यवस्था के ज्यादा से ज्यादा क्षेत्रों को इसमें कवर किया जाना चाहिए। पेट्रोल और पेट्रोलियम पदार्थ अब भी जीएसटी के दायरे से बाहर हैं।
जीएसटी से सबसे बड़ी अपेक्षा सही मायनों में एक राष्ट्र की भावना पैदा करना था यानी देश भर में वस्तुओं एवं सेवाओं की निर्बाध आवाजाही। हालांकि जीएसटी ने ज्यादातर मामलों में व्यावसायिक पक्ष के लिए इसे सुनिश्चित किया है, पर वाहनों के विनियमन और कराधान से संबंधित कुछ और सूक्ष्म अंतर अब भी मौजूद हैं, जिन्हें दूर किया जाना बाकी है। वाहनों की आवाजाही के संबंध में हर राज्य का अपना अलग-अलग रोड टैक्स होता है, जो अब भी उनकी मुक्त आवाजाही में बाधा डालते हैं। ऐसे करों एवं शुल्कों को एक समान बनाने की गुंजाइश है। जीएसटी लागू होना अपने आप में बड़ी सफलता है, क्योंकि आम सहमति बनाना कठिन था। ध्यान रखें कि जीएसटी की संरचना अब भी विकसित हो रही है और खत्म नहीं हुई है। दरों को तर्कसंगत बनाने का काम अभी जारी है।