हाल ही में गोवा में हुई ब्रिक्स एवं बिम्सटेक की बैठकों ने भारत की विदेश नीति को एक परिवर्तित विश्व के पैमाने में ढाल दिया। पुरानी शीतयुद्धकालीन विश्व व्यवस्था में देश अमेरिका और तत्कालीन सोवियत संघ के दो खेमों में बंटे हुए थे, वहीं तीसरी दुनिया यानी उत्तर-औपनिवेशिक देशों (एशिया, अफ्रीका, तथा लैटिन अमेरिका, जहां मुख्य रूप से पहले यूरोप का शासन था) ने गुटनिरपेक्ष आंदोलन यानी 'नाम' की पहल की। यह संगठन तीसरी दुनिया के देशों को एक मंच पर ले तो आता था, पर शीतयुद्ध के संतुलन को यह टस से मस नहीं कर पाता था। वहीं अब नई एकध्रुवीय विश्व व्यवस्था में अमेरिका को रूस और चीन से कड़ी चुनौती मिल रही है। चीन से जहां उसे आर्थिक चुनौतियां मिल रही हैं, वहीं रूस से राजनीतिक और अस्त्र-शस्त्र पर वर्चस्व की चुनौती मिल रही है। इसके अलावा, आतंकवाद, सीरिया, अस्थिर पश्चिम एशिया और अफगानिस्तान की राजनीति में अमेरिका रूस को नजर अंदाज नहीं कर पाता। यानी विश्व के सबसे ज्वलंत इलाके अब भारत के नजदीक हैं और अमेरिका को अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए भी अपनी साख बचाए रखनी होगी। चूंकि 'नाम' की प्रासंगिकता लगभग खत्म हो गई है, ऐसे में एक नया ध्रुवीकरण पैदा हुआ है, जिसे ब्रिक्स कहा जाता है।
वर्ष 2001 में गोल्डमैन सैक्स के अंतरराष्ट्रीय अर्थशास्त्री जिम ओ नील ने इस आशा के साथ ब्रिक्स का नाम ईजाद किया कि इसमें शामिल राष्ट्र अपने अंतर्संबंधों की बदौलत विश्व-अर्थव्यवस्था में नई स्फूर्ति जगाएंगे। यानी कि आर्थिक विकास दर के लिए इन राष्ट्रों पर अंतरराष्ट्रीय आंख बनी रहेगी। उसी रिपोर्ट में ब्रिक्स को को उभरती अर्थव्यवस्था बताया गया। ब्रिक्स कई महाद्वीपों के कुछ चयनित देशों का संगठन है, जो कुछ महत्वपूर्ण हितों के आधार पर साझेदारी करते हैं। हालांकि शुरू में ब्रिक्स को मुख्यतः एक आर्थिक उद्देश्यों वाला संगठन माना गया और इसके सदस्य देशों में मतभेद भी हैं, पर अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अब रणनीति को महत्वपूर्ण माना जाता है। यानी दो राष्ट्रों में आपसी मेलभाव नहीं भी हो, तब भी वे संबंध बना सकते हैं और अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा में अपनी दावेदारी जता सकते हैं। ब्राजील, भारत तथा दक्षिण अफ्रीका इससे पहले भी 'इब्सा' नामक प्लेटफार्म पर मिलते-जुलते रहे थे, लेकिन रूस और चीन के इसके साथ जुड़ने पर अब ब्रिक्स देशों पर दुनिया भर की नजर रहती है। ऐसे में, गोवा में नरेंद्र मोदी का ब्रिक्स की बैठक की अध्यक्षता करना महत्व रखता है।
इस बार आर्थिक मुद्दों के अलावा कई अन्य महत्वपूर्ण विषयों पर भी चर्चा हुई। हालांकि नरेंद्र मोदी गोवा की भूमि से पाकिस्तान का नाम आतंकवादियों को शरण देने वाले देश के रूप में दर्ज नहीं करा सके, क्योंकि रूस और चीन ने इसका समर्थन नहीं किया। ये दोनों देश आर्थिक और सैन्य मामलों में पाकिस्तान की मददद करते हैं। अंदरूनी बात यह भी है कि सीरिया और यमन पर रूस और अमेरिका की एक दूसरे से नहीं बनती। और रूस अब भारत को अमेरिका का ज्यादा सहयोग करता हुआ देखता है। ऐसे में आतंकवाद के मामले पर ब्रिक्स के मंच से एक आवाज में कोई भी नारा दे सकना शायद संभव नहीं था। पर यह तो स्पष्ट है कि पाकिस्तान जहां सार्क की बैठक नहीं करा पाया, वहीं भारत ने एक बड़ा अंतरराष्ट्रीय आयोजन सफलतापूर्वक संपन्न करा लिया।
यह भी देखने लायक है कि ब्राजील और गोवा, दोनों पुर्तगाल के उपनिवेश थे। इसी मंच का उपयोग कर नरेंद्र मोदी ने ब्राजील के साथ सहयोग के कई कार्यक्रमों की शुरुआत की। गोवा की सरकार ने भी चीन के साथ कई सहमति पत्रों पर हस्ताक्षर किए। यानी अंतर्विरोधों के बावजूद कारोबार की दिशा में आगे बढ़ा गया। सहयोग और व्यापार में आगे बढ़त ही हुई। ऐसे ही रूस से भारत ने वायुसेना के लिए एक ऐसी अग्रिम तकनीक वाली मिसाइल हासिल कर ली, जिससे पाकिस्तान और चीन, दोनों ही भारतीय सीमा को लांघने का दुस्साहस नहीं कर सकते। कुल मिलाकर गोवा में भारत ने कई बड़े देशों से सहयोग हासिल किया।
ब्रिक्स के साथ बिम्सटेक की भी बैठक हुई। यह एक तरह से सार्क का एक विस्तृत और एक सीमित रूप है। विस्तृत इस तरह से कि इसमें वे राष्ट्र शामिल हैं, जिनसे समुद्री रास्ते से हमारा रिश्ता है। इसमें पाकिस्तान नहीं है, लेकिन थाईलैंड है। बिम्सटेक की बैठक में म्यांमार की विदेश मंत्री आंग सान सू की, नेपाल के प्रधानमंत्री प्रचंड और बांग्लादेश की प्रधानमंत्री की मौजूदगी एक तरह से भारत के नेतृत्व का भावनात्मक अनुमोदन थी। इन राष्ट्रों में पाकिस्तान द्वारा आतंकवाद को समर्थन देने को लेकर अंदेशा था और इन्होंने भारत के साथ मिलकर अपना विरोध दर्ज किया। यानी बिम्सटेक में उन मुद्दों को उजागर किया गया, जो भारत और पाकिस्तान के बीच आड़े आते हैं। आज के समय में भारत का राष्ट्रीय हित मुख्य रूप से आतंकवाद का विरोध करना है और भारत की आर्थिक स्थिति को बेहतर बनाना है। अगर इन दोनों लक्ष्यों के मद्देनजर देखें, तो ब्रिक्स एवं बिम्सटेक, दोनों बैठकों में भारत के राष्ट्रीय हितों को पुरजोर बढ़ावा दिया गया।
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नरेंद्र मोदी ने नेहरू की राजनीति से यू-टर्न दिखाया है। तिब्बत के लोग विरोध करते रहे, लेकिन नरेंद्र मोदी ने चीन के साथ बैठक की। अब अंतरराष्ट्रीय राजनीति में प्रतिस्पर्धा भी होती है और सहयोग भी होता है। चीन से व्यापार के मुद्दे पर सहयोग भी बनाए रखना है और भू-सीमा के मामले पर उससे प्रतिस्पर्धा भी रखनी है। दरअसल यह मंच अंतर्विरोधों का मंच है, जहां प्रतिस्पर्धा भी रहेगी और सहयोग की पहल भी चलती रहेगी।
उल्लेखनीय है कि कुछ ही महीनों में गोवा में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। बगैर चुनावी बिगुल बजाए ही नरेंद्र मोदी ने गोवा में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहल कर दी, ताकि इसका असर इस चुनाव पर भी पड़े।
-दिल्ली विवि में प्राध्यापक एवं राजनीतिक विश्लेषक