हाल ही में ब्रिटेन के एक लोकप्रिय अखबार ईस्टर्न आइ ने एक जनमत सर्वेक्षण कराया था, जिसमें पाठकों से एक सवाल पूछा गया कि उनकी नजर में भारतीय सिनेमा का शताब्दी का महानतम अभिनेता कौन है। दरअसल यह सर्वेक्षण भारतीय सिनेमा की 100वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में इंग्लैंड में चल रहे समारोहों का हिस्सा था। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या इस सर्वेक्षण का नतीजा भरोसा करने लायक है।
हम उस दुनिया में रह रहे हैं, जहां व्यक्तिगत या अवसरवादी हितों को साधने के लिए मीडिया का बेजा इस्तेमाल होता है। अगर मीडिया संगठनों को प्रायोजक, बेनामी चंदा या दर्शकों को लुभाने वाले विज्ञापन न मिलें, तो उनका अस्तित्व ही संकट में पड़ जाएगा। दुखद यह है कि इस सर्वेक्षण से भी कुछ ऐसे ही संकेत मिलते हैं।
दरअसल, जब आप महानतम कलाकार के लिए वोट करते हैं, तो आपके पास तुलना करने के लिए एक कसौटी जरूर होनी चाहिए। इस परिप्रेक्ष्य में इस सर्वेक्षण के आयोजकों और इसमें हिस्सा लेने वालों से कुछ सवाल पूछे जाने की जरूरत है।
भारतीय सिनेमा ने अपने 100 वर्षों के इतिहास में तकरीबन 27,000 फिल्में बनाई हैं। क्या सर्वेक्षण में हिस्सा लेने वालों से यह पूछा जाना नहीं चाहिए कि वोट देने से पहले उन्होंने इनमें से कितनी फिल्में देखी हैं? क्या यह सर्वे दस हजार या पांच हजार या फिर सिर्फ दो-तीन सौ फिल्मों के आधार पर ही कर दिया गया? मैंने खुद 63 बरसों में 8,000 फिल्में देखी है और इनमें से अधिकांश के बारे में मुझे कुछ खास याद नहीं है।
सर्वेक्षण के आयोजकों से भी यह पूछा जाना चाहिए कि क्या उनके पास ऐसे सर्वेक्षण को आयोजित करने के लिए जरूरी सिनेमाई अनुभव है। यह सवाल भी उठता है कि क्या उन्होंने मतदाताओं के सामने अभिनेताओं के विकल्प रखे और क्या उन्होंने गैर-हिंदी फिल्मों के संदर्भ फिल्म विशेषज्ञों से विमर्श करने की जरूरत समझी?
सच तो यह है कि उन्होंने इन बिंदुओं पर विचार तक करने की जहमत नहीं उठाई। यही वजह है कि ऐसे ज्यादातर सर्वेक्षण बकवास होते हैं और इनके नतीजे भी प्रामाणिक नहीं होते।
भारतीय सिनेमा का महानतम कलाकार होना और हिंदी सिनेमा का महानतम कलाकार होना, दो अलग चीजें हैं। अगर भारतीय सिनेमा के मूक फिल्मों के युग की बात करें, तो महानतम कलाकारों की सूची छोटी होगी, लिहाजा इसमें से किसी एक को चुनना आसान होगा। अभिनेताओं में जय बिलीमोरिया, राजा सैंडो और अभिनेत्रियों में रूबी मायर्स, सुलोचना सीनियर या सितारा देवी का नाम लिया जा सकता है।
इस युग में कुल 1,208 फिल्में बनाई गईं, जिनमें से केवल नौ फिल्में ही सुरक्षित हैं। क्या आपने ये नौ फिल्में देखी हैं? शायद आपमें से बहुतों ने इन कलाकारों का नाम तक सुना नहीं होगा। आपको पता होना चाहिए कि सुलोचना सीनियर को बॉम्बे प्रेसीडेंसी के तत्कालीन ब्रिटिश गवर्नर से भी ज्यादा पैसा मिलता था।
इंग्लैंड में हुए सर्वेक्षण में भाग ले रहे एशियन वोटरों के शायद कुछ बुजुर्ग नातेदार पाकिस्तान, बांग्लादेश और भारत में रह रहे होंगे। इसी की बदौलत शायद उन्होंने पहाड़ी सान्याल, उत्तम कुमार, शिवाजी गणेशन, एम.वी.कृष्णन, डॉ. राज कुमार, रजनीकांत, प्रेम नासिर, ए. नागेश्वर राव, एन.टी. रामाराव और कानन देवी, सुप्रिया चौधरी, सुचित्रा सेन, जमुना, शीला, शांता आप्टे जैसी अभिनेत्रियों के नाम सुन रखे होंगे।
रही बात हिंदी सिनेमा के कलाकारों की, तो चंद्र मोहन, सुरेंद्र, जॉन कावस, अशोक कुमार, करन दीवान, दुर्गा खोटे, मीना कुमारी, नसीम, दिलीप कुमार जैसे कलाकारों के नाम तो हममें से ज्यादातर लोगों ने जरूर सुने होंगे। ऐसे कलाकारों की यह सूची बहुत लंबी है, पर इन पर विचार किए बगैर ही अमिताभ बच्चन को शताब्दी का महानतम कलाकार घोषित कर दिया गया!
दरअसल ऐसे सर्वेक्षण भारतीय सिनेमा के देश और बाहरी मुल्कों में रहने वाले दर्शकों की सिनेमाई अज्ञानता की पोल खोल कर रख देते हैं। अफसोस तो इस बात को लेकर है कि भारतीय फिल्म उद्योग ने कलाकारों के काम और निर्माणाधीन फिल्मों से संबंधित खबरें छापने वाले अखबारों या पत्रिकाओं को प्रोत्साहित नहीं किया। यह काम फिल्मी कंपनियों के पीआरओ पर छोड़ दिया गया।
अगर वैश्विक स्तर पर बात करें, तो निर्माणाधीन फिल्मों पर लिखने के काम को एक लंबे समय तक गंभीर पत्रकारिता नहीं समझा जाता था। इसको कुछ इज्जत तब मिली, जब 1937 में ख्वाजा अहमद अब्बास फिल्म पत्रकारिता के मैदान में उतरे। दुःख की बात है कि फिल्म उद्योग ने अपने दर्शकों को सिनेमाई शिक्षा देने की कभी कोशिश नहीं की। यही वजह रही कि दर्शकों के पल्ले सिर्फ थोथा मनोरंजन और बेवकूफाना फिल्मी कॉन्टेस्ट ही आए।
अगर भारतीय फिल्म उद्योग के महानतम कलाकार को जानना हो, तो उद्योग सबसे पहले सिनेमा के नियमित लेखकों को आमंत्रित करे। फिर इन लेखकों को अब तक बनी सभी फिल्मों के आंकड़े एकत्रित करने का कार्य सौंपा जाए। इसके बाद इन आंकड़ों पर गंभीरता से विचार किया जाए, ताकि कुछ नामों को शार्टलिस्ट किया जा सके।
रही बात अमिताभ बच्चन की, तो भारतीय फिल्म जगत के महान कलाकारों की कतार में वह कहां खड़े हैं, इसका ठीक-ठीक आकलन उनके रिटायर होने के भी एक दशक बाद हो सकेगा। उनके बारे में फिलहाल यही कहा जा सकता है कि वह अभिनेता के तौर पर नायक-नायिकाओं की दस लोगों की अंतिम सूची में जरूर शामिल होंगे।