चना दुनिया की अधिसंख्य आबादी का एक प्रमुख खाद्य स्रोत है। यह छोटे किसानों की आमदनी का एक बड़ा जरिया भी है। कृषि वैज्ञानिक काफी समय से यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि इसकी गुणवत्ता कैसे सुधारी जाए, उसे कैसे पौष्टिक बनाया जाए और उसकी पैदावार कैसे बढ़ाई जाए। उनकी यह मेहनत अब रंग लाती दिख रही है।
भारतीय कृषि वैज्ञानिकों सहित वैज्ञानिकों की अंतरराष्ट्रीय टीम को चने के जीन नक्शे (जीनोम) को पढ़ने में सफलता मिल गई है। उन्होंने चने की सर्वाधिक लोकप्रिय काबुली (सीडीसी फ्रंटियर) सहित 90 विविध किस्मों के जीनों का विश्लेषण किया है। इस उपलब्धि से चने की किस्मों में सुधार करके उन्हें ज्यादा गुण संपन्न करने, उनमें ज्यादा आनुवंशिक विविधता लाने तथा उन्हें रोग और सूखा प्रतिरोधी बनाने में मदद मिलेगी।
नेचर बायोटेक्नोलॉजी में प्रकाशित रिसर्च पेपर के मुताबिक, वैज्ञानिकों ने जीन विश्लेषण के लिए 10 विभिन्न देशों में पाई जाने वाली चने की 90 प्रजातियों को चुना था। इनमें कुछ जंगली किस्में भी शामिल हैं। इस पेपर में जीन नक्शे के अलावा चने के समस्त जीनों के विशिष्ट कार्यों का उल्लेख किया गया है और यह भी बताया गया है कि जीनों के विश्लेषण से फसल में सुधार कर उसका सतत उत्पादन कैसे सुनिश्चित किया जा सकता है।
अंतरराष्ट्रीय टीम का नेतृत्व हैदराबाद स्थित अंतरराष्ट्रीय फसल अनुसंधान संस्थान ने किया है। यह संस्थान अर्द्ध शुष्क ऊष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में उगाई जाने वाली फसलों पर अनुसंधान करता है।
वैज्ञानिकों की टीम ने काबुली चने में करीब 28,286 जीनों की पहचान की है। जीन नक्शे से चने की आनुवंशिक विविधता का लाभ उठा कर उगाई जाने वाली किस्मों का आनुवंशिक आधार मजबूत किया जा सकता है। इससे चने की खेती करने वाले किसान तापमान वृद्धि से होने वाले जलवायु परिवर्तनों की चुनौतियों से बेहतर ढंग से निपट सकेंगे। चना सोयाबीन के बाद दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी दाल की फसल है।
दुनिया के करीब 1.15 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र में इसकी खेती होती है। ज्यादातर खेती अर्द्ध शुष्क ऊष्णकटिबंधीय क्षेत्रों के उन छोटे और गरीब किसानों द्वारा की जाती है, जो संसाधनों से वंचित रहते हैं। इस प्रोजेक्ट से जुड़े भारतीय वैज्ञानिक डॉ. राजीव वार्ष्णेय के अनुसार, जीन अध्ययन से चने के अच्छे जीन छांटकर प्रजनन तकनीकों में सुधार किया जा सकता है। अभी चने की नई किस्म विकसित करने के लिए पारंपरिक प्रजनन में चार से आठ साल लगते हैं। जीनोम विश्लेषण पर आधारित तकनीक अपनाने पर आधे समय में ही नई किस्म तैयार हो जाएगी।
भारत दुनिया का सबसे बड़ा चना उत्पादक होने के साथ-साथ इस फसल का सबसे बड़ा उपभोक्ता भी है। देश के करीब 66.70 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में 53 लाख टन चने का उत्पादन होता है। देश में चने का उत्पादन बढ़ने के बावजूद इसकी खेती के क्षेत्रों में कमी आ रही है। पहले करीब 75.70 लाख हेक्टेयर में चना बोया जाता था।
अब 66.70 लाख हेक्टेयर में ही इसकी खेती होती है। देश के छह राज्यों मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में चने की खेती बड़े पैमाने पर होती है। देश के कुल चना उत्पादन का 91 प्रतिशत इन्हीं राज्यों से आता है। उत्तरी राज्यों में सिंचाई सुविधाओं के विस्तार की वजह से बहुत बड़े क्षेत्र में चने के स्थान पर गेहूं और सरसों की खेती हो रही है।
इन आंकड़ों से जाहिर है कि देश में चने का उत्पादन बढ़ाने की भरपूर गुंजाइश है। लेकिन इसके लिए उपयुक्त रणनीति अपनानी पड़ेगी। इस संदर्भ में चने का जीनोम विश्लेषण भारत के लिए खास महत्व रखता है। जीन विश्लेषण के बाद विकसित की जाने वाली उन्नत किस्मों से भारतीय किसान न सिर्फ चने का उत्पादन बढ़ा सकेंगे, बल्कि इससे उनकी आमदनी भी बढ़ेगी।
प्रोटीन का सस्ता स्रोत होने के कारण भुखमरी और कुपोषण से निपटने में चना एक बड़ी भूमिका निभा सकता है। दुनिया में तापमान वृद्धि से उत्पन्न होने वाले झटकों को सहन करने में भी चने जैसी फसलें महत्वपूर्ण हैं। अतः हमें भविष्य में खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए चने की खेती पर ज्यादा ध्यान देना होगा।