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सरकार चाहे तो अच्छे दिन ला सकती है

Thu, 26 Jun 2014 07:26 PM IST
सुभाषिनी अली
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महंगाई और भूख ने पिछले चुनाव में बड़ा काम किया। गैस सिलिंडर की लाइन में खड़े आक्रोशित लोग सिलिंडर का दाम बढ़ाने और सब्सिडी वाले सिलिंडरों की संख्या घटाने वाली सरकार को पानी पी-पीकर गाली देते। जैसे-जैसे उनके इलाके में मतदान नजदीक आता, अपना मत सरकार को पलटने और अच्छे दिन लाने के लिए इस्तेमाल करने का अपना फैसला सबको दोहरा-दोहरा कर सुनाते थे। उनका गुस्सा जायज भी था।
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ऐन चुनाव से पहले, लोकसभा के आखिरी सत्र में, कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार ने अपनी समझ से तुरुप का पत्ता चला। बढ़ती महंगाई और भूख से जूझने वाली जनता और उसके लिए संघर्ष करने वाले वामपंथी दलों और तमाम जन संगठनों ने वर्षों इस मांग को लेकर आंदोलन किया कि राशन की व्यवस्था को सार्वभौमिक (यानी सबके लिए) बनाया जाए और हर परिवार को 35 किलो चावल या गेहूं हर महीने दो रुपये किलो के भाव पर उपलब्ध कराया जाए। बाल की खाल उधेड़ने में कांग्रेस सरकार ने पांच साल लगा दिए। कितनों को मिले? कितने मिले? कैसे मिले? अंततः लोकसभा के आखिरी सत्र के अंतिम दिनों में उसने अपने चिरपरिचित भौंडे अंदाज में खाद्यान्न सुरक्षा अधिनियम को पारित करने के लिए पेश कर दिया। इस त्रुटिपूर्ण विधेयक के खिलाफ वाम दलों ने अपनी आवाज तो उठाई, लेकिन भाजपा ने भी इसका कोई कम विरोध नहीं किया।

बहरहाल कांग्रेस ने उसे पारित करवा लिया। चुनाव अभियान में उसने इसका पूरा लाभ उठाने की कोशिश की। भाजपा ने भी अपने घोषणा पत्र में सार्वभौमिक अन्न सुरक्षा को राष्ट्रीय सुरक्षा का अभिन्न हिस्सा मानते हुए कहा कि वह इसका लाभ आम आदमी को पहुंचाने के लिए कारगर कदम उठाएगी। अब समय आ गया है कि भाजपा अपनी घोषित निष्ठा का पालन करे। इसकी जरूरत तो पहले से भी अधिक हो गई है। आम लोगों की जरूरत के सामान के दाम लगातार बढ़ते ही जा रहे हैं। नई सरकार ने आते ही डीजल के दाम बढ़ा दिए, अब रेल भाड़े में जबर्दस्त बढ़ोतरी कर केवल आम लोगों पर महंगे सफर का बोझ ही नहीं डाला गया है, बल्कि हर सामान के दाम को भी बढ़ाने का काम किया गया है। ऊपर से बादल भी बिना बरसे इधर-उधर छंट रहे हैं। इतना ही नहीं, चीनी मिल मालिकों के प्रति अपनी उदारता का सुबूत सरकार ने इस हद तक दिया है कि चीनी के दाम भी उछलने लगे हैं। ऐसे में अन्न सुरक्षा की आवश्यकता कहीं ज्यादा बढ़ गई है, लेकिन उसका समय अंधकारमय होता दिखाई दे रहा है।
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किसी भी नई सरकार की दिशा का पता राष्ट्रपति के भाषण के जरिये लगता है। हाल में दिए गए इस भाषण से अन्न सुरक्षा का जिक्र ही गायब था। 10 जुलाई को अरुण जेटली अपना पहला बजट पेश करेंगे। पता नहीं, उस वक्त उन्हें राज्यसभा में विपक्ष के नेता की हैसियत से खाद्यान्न सुरक्षा पर कही गई बातें याद रहेंगी या नहीं। सरकार चाहे, तो अच्छे दिन आ सकते हैं। त्रिपुरा का उदाहरण सामने है, जहां वामपंथी सरकार ने हर राशन कार्ड धारक को दो किलो दाल और एक लीटर सरसों तेल सस्ते दरों पर उपलब्ध कराने का फैसला लिया है।
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