प्रसिद्ध उपन्यासकार गोविन्द मिश्र का लेखकीय और सृजनात्मक पक्ष इतना प्रबल है कि उनके कम पाठकों को ही पता होगा कि वह आयकर विभाग के सर्वोच्च अधिकारी (चेयरमैन, इन्कम टैक्स बोर्ड) भी रह चुके हैं।
उनकी नई किताब ''अरण्य-तंत्र" में कई विशेषताएं हैं। पूरा उपन्यास एक सरकारी क्लब के इर्द-गिर्द घूमता है-''भारत का वह एक प्रांत था, प्रांत की वह राजधानी थी, राजधानी का वह क्लब था। देखें तो पूरा देश ही था, क्योंकि अफसर जो यहां आते थे, वे देश के कोने-कोने से थे।"
क्लब का अध्यक्ष सूबे का मुख्य सचिव है और उसका नामित अधिकारी क्लब का सचिव। चापलूसी की संस्कृति जो अपने विभागों तक सीमित रहती है, वह यहां यत्र तत्र सर्वत्र फैल जाती है। सचिव क्लब का सर्वेसर्वा है, कतई ''फील्ड" में नियुक्त अधिकारी की तरह। जैसा वहां की विकास योजनाओं का हाल है, यहां भी।
मेरी स्मृति में यह पहला उपन्यास है जिसके मानवीय पात्र अपनी पशुवत प्रवृत्तियों से रेखांकित किए गए हैं। सामान्य गधे के अलावा इस जंगल में दुर्लभ बारहसिंगा, हाथी, एक चिंघाडू, एक शांत चिंपाजी, लंबे छरहरे कुलांचे भरते युवा हिरन और एक सेवानिवृति्त के करीब उनका बुजुर्ग भी, काले भैंसे, गाय की प्रजाति का एक गौर वगैरह हैं। एक ऊंट भी है। वह चरता भी है और अपने कारनामे का बखान भी करता है -''छिपाना क्या! सारा देश इसी काम में लगा हुआ है, कहा भी है -''चरैवेति"। पेशे से वह इंजीनियर है।
जानवर भले रेगिस्तान का हो, पर हिंदुस्तान की हर बस्ती में दिख जाता है। एक पुलिस का परिंदा भी है। वह ''फाकी" मारता है। लंबी चौड़ी उड़ानें भरता है, कभी यूएन में जाने की, कभी केंद्र की किसी निगरानी संस्था, तो कभी अपने गृह राज्य पंजाब में प्रतिनियुक्ति की। लेखक के अनुसार, ''हर जंगल के आसपास खंडहर होते हैं, तो यहां पीली कोठी है, जो अंग्रेजों के जमाने में बस्ती के किनारे हुआ करती थी।"
लेखक ने विधिवत हर प्रमुख पात्र का चरित्र विस्तार से जीवंत किया है। उपन्यास का अंत इस प्रकार के शासकीय जीवन की निरर्थकता और खालीपन को रेखांकित करता है। कैसे बड़े पदों के हाकिम, सत्ता और सुविधा गंवाने पर, जंगल के शेर से, उसी की खाल के भूसा भरे दिखावे मात्र रह जाते हैं। गोविंद कहानी कहने की कला में प्रवीण हैं और इसीलिए बिना किसी प्रमुख नारी पात्र और रोमांस आदि के, वास्तविकता की खुरदुरी जमीन पर यह उपन्यास चरित्रों के विकास और घटनाक्रमों के माध्यम से अपनी रोचकता बनाए रखता है।
बाह्य स्तर पर यह क्लब के सरकारी सदस्यों की जीवन-गाथा है। पर विचार और आंतरिक बुनावट के स्तर पर क्लब का प्रतीक अपने आप में अनूठा है। हर अफसर औपचारिक व्यवहार में प्रचलित मानकों का मुखौटा लगाए रहता है। उस की आंतरिक असलियत, दबी-छुपी हिंसा, वहशीपन, खेल के मैदान के प्रतियोगी समय में ही उजागर होता है। यही इन इंसानी छायाओं की पशुवत प्रवृत्तियों की जनक है। तभी टेनिस कोर्ट पूरे देश का विस्तार है, द्योतक है, प्रतीक है।
सियार पांडे सरकार में व्यस्त भयंकर और भौंडी किस्म की चाटुकारिता के जीते-जागते नमूने हैं। वह वन विभाग के हैं और मानते हैं कि सियार सिर्फ शेरों की जी-हुजूरी करने और उन का जूठा खाने को ही पैदा होते हैं। क्लब के पास लगे दो पेड़ों में से एक की नृशंस हत्या सियार साहब की खुशामद में कैसे करवाता है, इसका उपन्यास में विस्तृत वर्णन है। निर्णय कैसे सनक और व्यक्तिगत कुंठा से लिए जाते हैं, पेड़ कटने का हादसा इसका सार्थक उदाहरण है।
'अरण्य-तंत्र' नाम ही प्रशासन की पूरी अराजकता का प्रतीक है। जंगल में सिर्फ जंगल है, तो प्रशासन के अरण्य में भी खुशामद और खौफ का माहौल है। किसिम किसिम के जानवरों के सरकारी जंगल का लेखक ने बड़ी निपुणता से चित्रण किया है।
पद-लिप्सा, लालच, सुविधाओं की होड़, महत्वाकांक्षी व्यभिचारी और भ्रष्ट, हर तरह के स्वभाव, शौक और प्रवृत्तियों के निरंकुश जानवर इस जंगल में चरते, विचरते और वास करते हैं।
इनके चुटीले चित्रण में लेखक ने व्यंग्य का सहारा लिया है। व्यंग्य का इतना सबल, सार्थक, सफल और सतत तथा प्रभावी प्रयोग लेखक की गहरी संवेदना और व्यंग्य के व्याकरण की समझ के कारण ही संभव हुआ है।