सर्वोच्च न्यायालय ने पंजाब राज्य बनाम पंजाब के राज्यपाल के प्रधान सचिव, 2023 मामले में निर्णय दिया कि विधेयकों को 'यथाशीघ्र' विधानमंडल को वापस भेजा जाना चाहिए। यदि राज्य विधानसभा विधेयक को 'संशोधनों के साथ या बिना संशोधनों के' पुनः प्रस्तुत करती है, तो राज्यपाल के पास कोई विकल्प या विवेकाधिकार नहीं होता है, और उन्हें अपनी सहमति देनी होती है। न्यायालय ने माना कि यदि राज्यपाल किसी विधेयक को बिना कुछ किए रोक लेता है, तो वह संविधान का उल्लंघन होगा।
राज्यपाल राष्ट्रपति का प्रतिनिधि होता है और इसलिए निर्वाचित नहीं, बल्कि नियुक्त होता है। जब वह राज्य के अनिर्वाचित सांविधानिक प्रमुख के रूप में, बिना किसी और विकल्प के अनुमति रोके रखने की घोषणा करके, निर्वाचित विधायिका द्वारा विधायी क्षेत्र के कामकाज को वीटो करता है, तो यह सांविधानिक लोकतंत्र और संसदीय शासन प्रणाली के भी विपरीत होगा। हालांकि अनुच्छेद 163 के तहत उसके पास विवेकाधीन शक्तियां हैं, फिर भी वह संविधान के मूल दर्शन को दरकिनार नहीं कर सकता। इस बहस ने राष्ट्रपति को संविधान के अनुच्छेद 143 के तहत सर्वोच्च न्यायालय से सलाह लेने के लिए प्रेरित किया है। अनुच्छेद 143 स्पष्ट करता है कि न्यायालय के लिए अपनी राय देना बाध्यकारी नहीं है। हालांकि, अनुच्छेद 143 के खंड (2) के तहत, यदि राष्ट्रपति किसी ऐसे मुद्दे पर सर्वोच्च न्यायालय की राय चाहता है, जो संविधान के लागू होने से पहले किसी संधि, करार, प्रसंविदा, अनुबंध, नामित या अन्य समान दस्तावेज से उत्पन्न हुआ है, तो न्यायालय के लिए राष्ट्रपति को अपनी राय देना अनिवार्य है। इसके लिए वह अनुच्छेद 145 के खंड (3) के तहत पांच न्यायाधीशों की पीठ का गठन करेगा। इसे ही हम सांविधानिक पीठ कहते हैं। हालांकि, यह राय किसी फैसले के विपरीत, बाध्यकारी नहीं होती।
राष्ट्रपति ने न्यायालय के आठ अप्रैल के फैसले के पांच सप्ताह बाद एक संदर्भ भेजा, जिसमें न्यायालय ने राज्यपाल द्वारा विचारार्थ विधेयकों को मंजूरी देने के लिए राष्ट्रपति के लिए तीन महीने की समय-सीमा निर्धारित की थी। उस फैसले ने तमिलनाडु के राज्यपाल के 10 लंबित विधेयकों पर अपनी सहमति न देने के फैसले को रद्द कर दिया था। हालांकि राष्ट्रपति ने 14 बिंदुओं वाला संदर्भ भेजा है, लेकिन स्पष्ट है कि राज्यपाल के कार्यों का आकलन और समीक्षा करने में न्यायपालिका की भूमिका सवालों के घेरे में है।
हम जानते हैं कि राष्ट्रपति के साथ-साथ राज्यपाल को भी अनुच्छेद 361 के तहत उन्मुक्ति प्राप्त है, लेकिन विवादास्पद मुद्दा यह है कि क्या ये उन्मुक्तियां निरपेक्ष हैं। रामेश्वर प्रसाद बनाम भारत संघ (2006) में सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि संविधान का अनुच्छेद 361 किसी भी तरह से न्यायालयों को राज्यपाल के कार्यों की जांच करने से नहीं रोकता या निषिद्ध नहीं करता है, जिसमें आवश्यक निहितार्थ से अनुच्छेद 200 के तहत उनके कार्य भी शामिल होंगे।
क्या न्यायालय राज्यपाल पर विधेयकों को मंजूरी देने के लिए समय-सीमा थोप सकता है, यह निर्णय का विषय था, जिसके बाद अनुच्छेद 142 के प्रयोग की वैधता पर भी प्रश्नचिह्न लगा दिया गया। यह अनुच्छेद सर्वोच्च न्यायालय की अंतर्निहित शक्ति को सुनिश्चित करता है, जिसके द्वारा वह संविधान के संरक्षक के रूप में अपने कर्तव्य का निर्वहन ऐसी परिस्थिति में करता है, जब न तो संविधान में और न ही किसी कानून में कोई विशिष्ट प्रावधान हो। राष्ट्रपति व राज्यपाल सांविधानिक प्रमुख हैं, इसलिए संविधान के प्रावधानों से बंधे हैं। उनके विवेकाधिकार, यदि कोई हों, का प्रयोग सांविधानिक प्रावधानों के उल्लंघन में नहीं किया जा सकता।
हालांकि अनुच्छेद 143 के खंड (1) के तहत अपनी राय देना न्यायालय के लिए बाध्यकारी नहीं है, लेकिन बेहतर होगा कि वह 'यथाशीघ्र' वाक्यांश की व्याख्या करके अपनी राय दे, ताकि भविष्य में ऐसे किसी मुद्दे पर विवाद नहीं हो और कानून बनाने की प्रक्रिया में बाधाओं का सामना न करना पड़े।