यह सुखद संयोग था कि इस वर्ष की शुरुआत में पेरिस स्थित पंपेडू सेंटर में हमारे विश्व प्रसिद्ध चित्रकार सैयद हैदर रजा की एक पूर्वव्यापी प्रदर्शनी का आयोजन हुआ। यह प्रदर्शनी सिर्फ इसलिए महत्वपूर्ण नहीं थी कि विदेश के एक सर्वोच्च संग्रहालय में यह किसी भारतीय चित्रकार की प्रदर्शनी थी, बल्कि, इसका अभूतपूर्व महत्व यह है कि इस प्रदर्शनी के कारण वैश्विक कलाओं की दुनिया के विशेष पारिस्थितिकी तंत्र का भारतीय चित्रकारों पर अंततः ध्यानाकर्षण हुआ है। इस प्रदर्शनी का तात्कालिक परिणाम यह हुआ कि रातों-रात रजा भारतीय समकालीन कला के सबसे महंगे कलाकार बन गए। इस प्रदर्शनी के बाद एक नीलामी में रजा का एक चित्र रिकॉर्ड 55 करोड़ रुपये में बिका।
अब इस साल से विदेशी बाजार का यह सिलसिला अन्य भारतीय कलाकारों के साथ भी चल पड़ा है। यह इस बात का संकेत है कि भारतीय कला, जो अभी तक मूलतः देश और विदेश में बसे भारतीय संग्राहकों के कंधों पर ही खड़ी थी, इस प्रदर्शनी के बाद अचानक नए अंतरराष्ट्रीय बाजार की हद में आकर नया विस्तार पाती दिख रही है। हालांकि, भारतीय चित्रकला का बाजार अब भी चीन, अमेरिका या यूरोप की तुलना में बहुत कम है, लेकिन कला बाजार के इस खेल में स्थापित पुराने विदेशी खिलाड़ियों की दिलचस्पी लेना भारतीय चित्रकला के आगामी आगाज का सूचक है। भारतीय कला बाजार ने कला के अंतरराष्ट्रीय सूचकांकों की दुनिया में अपनी दस्तक दे दी है।
अब दूसरे पहलू पर बात करें। पिछले महीने मुंबई में एक नए कला मेले की शुरुआत हुई है। प्रसिद्ध नीलामी घर सैफ्रॉन आर्ट की पहल पर मुंबई के महालक्ष्मी रेसकोर्स में इस मेले की शुरुआत हुई है। अभी तक दिल्ली में ‘इंडिया आर्ट फेयर’ होता था, और इसके कारण पिछले एक दशक से भारत में दिल्ली ही एक प्रकार से समकालीन कला का केंद्र था। यह सभी जानते हैं कि कुछ दशकों पहले तक एकमात्र मुंबई शहर ही कलाकारों के लिए आर्थिक दरवाजों का शहर था, बहुत से बड़े संग्राहक सबसे पहले मुंबई से ही थे। मुंबई में हुए इस बेहद सफल कला मेले ने दिल्ली की केंद्रीयता को भेद दिया है और भारत जैसे बड़े देश के कला जगत के लिए यह विकेंद्रीकरण अच्छा ही है।
तीसरी बड़ी पहल मुंबई में रिलायंस ग्रुप द्वारा प्रदत्त नीता मुकेश अंबानी सांस्कृतिक केंद्र है। अंतरराष्ट्रीय मानदंडों से लैस यह केंद्र अपनी शुरुआत से ही एक अलग पहचान बनाने में सफल हुआ है। इस केंद्र की पहली प्रदर्शनी ने ही जेफ कूंस, एन्सलेम कीफर, अनीश कपूर जैसे दुनिया के अनेक बड़े कलाकारों को भारत की ओर मुड़ने के लिए बाध्य कर दिया है। यह केंद्र एक प्रकार से भारत में ही भारत को दुनिया से जोड़ने की एक कोशिश है, यह महत्वपूर्ण है।
दिल्ली में किरण नादर संग्रहालय का नया परिसर भी भारतीय कला जगत में नया अध्याय जोड़ने वाला है, यह संभवतः किसी कॉरपोरेट द्वारा संचालित आधुनिक कला का सबसे बड़ा संग्रहालय होगा। वहीं, कोच्चि बिनाले ने अगर दक्षिण और दिल्ली आर्ट फेयर ने उत्तर भारत को ठिकाना बनाया है, तो ऐसे में इन दोनों उपक्रमों से मुंबई को भी अपनी खोई उपस्थिति वापस मिली है। हालांकि भारत जैसे विशाल देश के लिए यह भी कम है, लेकिन उम्मीद है कि आने वाले कुछ वर्षों में बंगाल और गुजरात में भी कॉरपोरेट जगत की कला-केंद्रित कुछ बड़ी पहल हो सकती है।
चौथा, भारत के संस्कृति मंत्रालय की पहल से इस साल से दिल्ली के लाल किले में वास्तु शास्त्र बिनाले की शुरुआत हुई है। वेनिस, शिकागो, इस्तांबुल, हांगकांग और लिस्बन जैसे आर्किटेक्चर बिनाले की तर्ज पर अब सरकारी स्तर पर भारत में भी एक बिनाले की कल्पना की गई है। हालांकि आनन-फानन में किया गया यह बिनाले अपनी परिकल्पना और कार्यान्वयन के स्तर पर अपने पहले संस्करण में कमजोर था, फिर भी इस बिनाले का स्वागत होना चाहिए। संभवतः, आने वाले समय में भारत, जो दुनिया भर में अपने वास्तु-वैविध्य के कारण भी जाना जाता है, इस बिनाले के निमित्त और उसकी परिकल्पना के सही संचालन से एक नई पहचान पा सके।
(लेखक- समकालीन भारतीय कला क्षेत्र के सर्वाधिक सम्मानित चित्रकारों में से एक। मूलतः जियोलॉजिस्ट के तौर पर शिक्षित, एब्स्ट्रैक्ट पेंटर, रजा फाउंडेशन से संबद्ध।)