भारत के दौरे पर आईं बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना के स्वागत समारोह में विभिन्न देशों के दिल्ली स्थित करीब 80 राजदूतों ने शिरकत की। यह न केवल मेजबान बांग्लादेश उच्चायोग के लिए एक सही जनसंपर्क अभियान बन गया, बल्कि इसने भारत-बांग्लादेश के बेहतर रिश्तों को भी प्रदर्शित किया। शेख हसीना के लिए इससे बेहतर जन संपर्क क्या हो सकता था कि जिस चीज ने उनके लोगों के अलावा व्यक्तिगत रूप से उन्हें चोट पहुंचाई है, यह जनसंपर्क अभियान उनकी उस शिकायत का मंच बन गया। भारत द्वारा प्याज निर्यात पर प्रतिबंध लगाने के बाद से उन्होंने अपने घर पर प्याज का इस्तेमाल करना छोड़ दिया है।
भारत की तरह बांग्लादेश में भी प्याज की कीमत दोगुनी से ज्यादा हो गई है। जो प्याज पहले वहां 25.16 रुपये प्रति किलो था, वह अब 83.86 रुपये हो गया है। हसीना ने अपनी तरफ से हिलसा मछली के निर्यात पर प्रतिबंध हटाने के लिए तैयार होने की बात कहकर बदले में प्याज निर्यात की मांग कर एक समझदारी भरा कदम उठाया है। दो निकट पड़ोसी देशों के बीच मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन अच्छी बात यह है कि दोनों देश सौहार्दपूर्ण ढंग से उसका निपटारा कर सकते हैं।
इसमें कोई संदेह नहीं कि भारत-बांग्लादेश के द्विपक्षीय संबंध खासकर पिछले दस साल से अच्छे रहे हैं। लेकिन यह भी सच है कि उन्हें किसी भी दो पड़ोसियों द्वारा सामना किए जाने वाले असंख्य मुद्दों को हल कर आपसी रिश्तों को मजबूत करने की आवश्यकता है। बांग्लादेश बेहतर और जटिल संबंधों वाला ऐसा पड़ोसी देश है, जो भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र और दक्षिण-पूर्वी एशिया के लिए प्रवेश द्वार की सुविधा प्रदान करता है। आश्चर्य नहीं कि प्रधानमंत्री मोदी ने कहा है कि दोनों पड़ोसियों के पारस्परिक रिश्ते दुनिया के लिए एक शानदार उदाहरण है।
हालांकि बांग्लादेश भारत के राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) को लेकर काफी चिंतित है। मोदी ने संयुक्त राष्ट्र में बैठक के दौरान शेख हसीना को आश्वस्त करने की कोशिश की थी और वह आश्वस्त हो गईं। पर यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगा कि मोदी के सुविचारित, मैत्रीपूर्ण आश्वासन से शेख हसीना का वह भय दूर हो जाएगा, जो भारत के भीतर भी गहरे और व्यापक रूप से मौजूद हैं। न केवल लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान, बल्कि गृह मंत्री बनने के बाद भी अमित शाह ने बांग्लादेशियों को निकालने के बारे में बात की। दूसरी तरफ विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने दिल्ली शिखर सम्मेलन की तैयारी के लिए अपने ढाका दौरे के दौरान कहा था कि यह भारत का आंतरिक मामला है। लेकिन बांग्लादेश से सटे पूर्वोत्तर के क्षेत्र में एनआरसी से बाहर करीब बीस लाख लोगों के साथ क्या किया जाएगा, इस बारे में कोई स्पष्टता नहीं है। अगर उन्हें भारत के भीतर अवांछित महसूस कराया जाता है, भले उन्हें सीमा पार नहीं भेजा जाए, तो वे वहां से निकलकर, फिर से अवैध रूप से कहीं और बसने की इच्छा रख सकते हैं, जो कि मानवीय प्रवृत्ति है। ऐसे में, मौखिक आश्वासन पर्याप्त नहीं है। अपना घर ठीक करने के लिए हमारे नेतृत्व को मौन कूटनीति की जरूरत है।
दोनों देशों ने बंदरगाहों (चटगांव और मोंगला), नदी जल बंटवारे, शिक्षा, संस्कृति और तटीय निगरानी, जो बंगाल की खाड़ी में समुद्री सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है, से सबंधित सात समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। खुशनुमा माहौल में वीडियो लिंक के जरिये तीन परियोजनाओं- पूर्वोत्तर भारत की ईंधन जरूरत पूरी करने के लिए बांग्लादेश से थोक में एलपीजी आयात, खुलना में एक कौशल विकास संस्थान और ढाका के रामकृष्ण मिशन में विवेकानंद भवन की परियोजना, जहां सौ छात्रों के ठहरने की व्यवस्था होगी-का उद्घाटन किया गया। बांग्लादेश महात्मा गांधी की 150वीं जयंती के उपलक्ष्य में एक डाक टिकट जारी करेगा।
बांग्लादेश भारत के लिए सबसे पसंदीदा राष्ट्र है। द्विपक्षीय व्यापार में 52 फीसदी का उछाल आया है और यह सालाना एक अरब डॉलर को पार करने की ओर अग्रसर है। बांग्लादेश भारत से ऊर्जा, माल और सेवाएं तथा जो भी उस तक पहुंच सकता है, आयात करने के लिए तैयार है। उसकी आठ फीसदी सालाना आर्थिक विकास दर को देखते हुए, जो इस क्षेत्र में सर्वोच्च और भारत से भी अधिक है, बांग्लादेश के ऊपर से कम विकसित देश (एलडीसी) का ठप्पा कभी भी हट सकता है। दिल्ली, कोलकाता और पूर्वोत्तर के बाद अब चेन्नई में उसका नया उप-उच्चायोग खुल रहा है, जो भारत के साथ उसकी बढ़ती पहुंच का ही संकेत है।
वर्ष 2009 के बाद से बांग्लादेश और भारत ने कई ऐसे विवादित मुद्दे सुलझाए हैं, जो 1947 से अनसुलझे थे। उन्होंने 1974 की भू-सीमा संधि को स्वीकार किया, जो गलियारों की अदला-बदली को अंजाम देता है। इसके साथ ही शेख हसीना ने भारत, चीन व अन्य देशों के साथ बेहतर संतुलन बिठाकर अपनी सुरक्षा और कूटनीतिक कार्ड भी अच्छी तरह से खेला है। हसीना अपने घरेलू कारणों से भारत पर निर्भर नहीं दिख सकतीं और भारत ने इसके लिए उसकी सराहना की है, क्योंकि वह चीन की तरह उतनी आर्थिक मदद नहीं कर सकता और न ही तेजी से अपने वादे पूरे कर सकता है।
ढाका उन सभी नदियों के बेहतर प्रबंधन के लिए सहयोग चाहता है, जो बांग्लादेश और भारत साझा करते हैं, ताकि पानी के समान वितरण को सुनिश्चित करने के लिए एक बेहतर ढांचा तैयार किया जा सके। तीस्ता नदी पर लंबित विवाद से पता चलता है कि ऐसे मुद्दों पर सौहार्दपूर्ण समाधान तक पहुंचना कितना मुश्किल है। एक प्रभावी और पारस्परिक रूप से स्वीकार्य नदी प्रबंधन ढांचे को अंतिम रूप देना दोनों सरकारों की कल्पनाशीलता और क्षमताओं की परीक्षा है। उम्मीद है कि निकट भविष्य में इसकी कोशिश की जाएगी और अंतिम फैसले पर पहुंचा जा सकेगा।
राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के बयान को उद्धृत करते हुए कहें, तो भारत और बांग्लादेश ने अपने रिश्ते का स्वर्णिम अध्याय लिखा है, यह कहा जा सकता है कि हसीना की यात्रा ने अपनी खास दोस्ती में फिर से निवेश किया है, जो उनके प्रधानमंत्रित्व काल में विकसित हुआ है, और जिसे उम्मीद के मुताबिक वह अभी तथा भविष्य के लिए अटल बना रही हैं।