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नए साल के जलसे में देवगण

Tue, 25 Dec 2012 01:03 AM IST
अशोक गौतम
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नए साल के स्वागत के नए-नए तरीके सोचने के लिए दिमाग पर जोर दे ही रहा था कि दरवाजे पर ठकठक हुई। अनमने मन से दरवाजा खोला, तो सामने देवताओं की वेशभूषा में तीन-चारे जने आ धमके। मैंने हथेली खुजाते हुए एक से पूछा, कहिए, किससे मिलना है आपको? उनमें से एक ने आगे बढ़कर कहा, मित्र! हम देवलोक से आए हैं।
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तो मैं क्या करूं? मोहल्ले के मंदिर में जाइए। मैं नास्तिक बंदा हूं, मेरा जवाब था।

मंदिर से ही आ रहे हैं। वहां तो पुजारी ने हमारी मूर्तियां बाहर रख मंदिर को गेस्ट हाउस बना रखा है।
तो किसी सराय या धर्मशाला में जाइए। इतना कह मैं दरवाजा बंद करने को हुआ ही कि पहले ने हाथ जोड़ते कहा, भाई! अब इस रात को कहां जाएं? जब देश में धर्म ही नहीं, तो धर्मशाला कहां मिलेगी? वे भी अब महंगे होटलों में बदल चुकी हैं। तो देवलोक छोड़कर मंदी के मारे इस देश में आए क्यों?

बस, नए साल का जश्न तुम लोगों के साथ मनाने की इच्छा हुई, सो चले आए। सुना है, तुम्हारे शहर में इस बार शीला, मुन्नी, जलेबी बाई के जलवे न्यू ईयर वेलकम प्रोग्राम में देखने को मिलेंगे, तीसरे ने सकुचाते हुए कहा।
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पर तुम्हारे पास तो उर्वशी, मेनका सरीखी अप्सराएं हैं। उनके आगे हमारी जलेबी बाई तो पानी भी नहीं भरती।
युगों से एक ही नृत्य! सोचा, अबके कुछ मीठा हो जाए, सो... पर एक बात बताओगे?
पूछो? मैंने सगर्व कहा, तो उनमें से पहला बोला, यार! धरती के विनाश की बार-बार घोषणाएं होने के बाद भी तुम लोग मस्ती के लिए इतना साहस कहां से लाते हो?’

यही तो हम हिंदुस्तानियों के सदाबहार होने का राज है। तुम्हें बता दिया, तो हमारे पास बचेगा क्या? तुम्हारे पास अमरत्व है, तो हमारे पास मस्ती।
तो हमारा एक काम कर दो? नए साल के स्वागत कार्यक्रम के हमें तीन टिकट जैसे भी हो दिलवा दो, तो हमारा आना सार्थक हो जाए। एक ने जरा जोर देकर कहा।
अब तो रत्नाबाई के टिकट तक ब्लैक में भी नहीं मिलेंगे, पर कोशिश करूंगा, पक्का नहीं कहता! असल में इस देश में सांस से लेकर आस तक सभी ब्लैक में ही मिलता है।
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तो कोई सरकार से शिकायत क्यों नहीं करता?
मैने दबी जुबान कहा, वह भी ब्लैक में ही चल रही है।  

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