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ईश्वर प्रेम का भूखा होता है

Tue, 26 Feb 2013 09:59 PM IST
शिवकुमार गोयल
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हमारे धर्मग्रंथों और नीतिशास्त्रों में कई ऐसे प्रसंग हैं, जो हमें सीख देते हैं कि ईश्वर, धर्म या जाति के बंधन से नहीं, बल्कि प्रेम के बंधन से बांधा जा सकता है। जो व्यक्ति निश्छल हृदय का है, वह चाहे जिस किसी भी धर्म का है, प्रभु उससे प्रसन्न होते हैं और अपनी कृपा दृष्टि की बरसात उस पर करते हैं।
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इसी से जुड़ा एक प्रसंग महान संत उड़िया बाबा का है। वह रामघाट क्षेत्र में गंगा के किनारे ठहरे हुए थे। एक दिन उनके दर्शन के लिए एक मुसलमान जिज्ञासु पहुंचा। उसने बाबा से पूछा, क्या आपके सनातन धर्म में ऐसा कोई साधन है, जिससे मुझे खुदा मिल जाए?

बाबा बोले, भैया, भगवान को पाने के लिए हिंदू या मुसलमान होना जरूरी नहीं है। निश्छल हृदय से प्रेम करने वाला किसी भी धर्म या जाति का व्यक्ति भगवान को प्राप्त कर सकता है। भगवान केवल प्रेम के वशीभूत होते हैं। जो छली, कपटी, हिंसक तथा दूसरों को कष्ट पहुंचाने वाले हैं, वे भगवान की कृपा कदापि नहीं पा सकते। भगवान या खुदा के आगे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि कोई किस मजहब या जाति का है।
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जिज्ञासु ने बाबा के उपदेश के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए पूछा, मुझे प्रतिदिन क्या करना चाहिए। बाबा ने बताया, प्रतिदिन कम से कम एक अच्छा काम करने का संकल्प लो। किसी के दुख-दर्द में सहभागी बनो, अपने मजहब के अनुसार खुदा को याद करते रहो। तुम्हारा कल्याण हो जाएगा।
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