संप्रग सरकार ने सूचना का अधिकार और मनरेगा जैसे कानून लागू किए, तो इसके पीछे राष्ट्रीय सलाहकार परिषद का बड़ा योगदान है। लेकिन उसमें शामिल लोग ही अब सरकार की रीति-नीतियों से परेशान होकर परिषद से बाहर निकल रहे हैं। अरुणा राय ने पिछले दिनों परिषद से इस्तीफा दे दिया। उनके मोहभंग का कारण यह था कि मनरेगा में सरकार न्यूनतम मजदूरी देने को तैयार नहीं है। इस विषय में कर्नाटक उच्च न्यायालय के फैसले और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा उस पर रोक लगाने से इनकार करने की भी सरकार ने अनदेखी कर दी। सूचना के अधिकार को भी हल्का करने की कोशिश की जा रही है। जब प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा कानून में भी सरकार ढुलमुलपन दिखाने लगी, तो अरुणा राय के सब्र का बांध टूट गया।
सोनिया-मनमोहन सरकार ने जनता के हित में कई कानून और कार्यक्रम बनाए हैं। जब सरकार अपनी उपलब्धियों का बखान करती है, तो इन्हीं का जिक्र करती है, जैसे कि अभी ‘भारत निर्माण’ विज्ञापनों की शृंखला में कर रही है। इनमें प्रमुख हैं-मनरेगा, सूचना का अधिकार कानून, वनाधिकार कानून, शिक्षा अधिकार कानून, घरेलू हिंसा कानून, राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य बीमा योजना, जननी सुरक्षा योजना आदि। खाद्य सुरक्षा कानून, सांप्रदायिक दंगा कानून, लोकपाल कानून आदि भी उसके एजेंडे पर हैं। इस सूची को देखकर लगता है कि सरकार ने दबे-कुचले तबकों के लिए बहुत कुछ किया है। कम से कम इसकी ऐसी इच्छा तो है। इसीलिए देश के बहुत से नामी और भले लोगों ने सरकार को सहयोग किया। कानून या योजना अच्छी बने और उसका अमल ठीक से हो, इसमें वे शिद्दत से जुटे थे। लेकिन अब उनका मोहभंग हो रहा है।
मनरेगा को ही लें। बात सिर्फ भ्रष्टाचार की नहीं है। वह तो है ही। गांवों में रोजगार सुनिश्चित करने के अपने लक्ष्य में भी वह विफल रहा है। मनरेगा में मांगने पर 15 दिन में काम देने, न देने पर भत्ता देने और मजदूरी भुगतान में देरी पर हर्जाना देने का प्रावधान है। लेकिन साधारण ग्रामीणों के लिए इन प्रावधानों का इस्तेमाल कर पाना असंभव है। मजदूरी की दरें कम हैं, तिस पर टास्क रेट (काम की मात्रा के अनुपात में मजदूरी) के कारण कई बार 40-50 रुपये रोज ही मिल पाते हैं। कुछ समय पहले झारखंड में कुछ भले अफसरों के कारण पहली बार मजदूरों को भत्ता और हर्जाना मिला। यह इतनी अनूठी घटना थी कि ज्यां द्रेज ने उल्लसित होकर इस पर एक लंबा लेख लिखा।
मनरेगा ने देश में कई जगह ग्रामीण गरीबों को संगठित करने के लिए एक मुद्दा जरूर दिया। देश के कम से कम तीन जगहों में मैंने खुद जाकर देखा है कि मनरेगा को लेकर वहां के गरीबों ने संघर्ष छेड़े हैं और उनमें जोरदार चेतना आई है। ये जगहे हैं, मध्य प्रदेश में बड़वानी, बिहार में अररिया और उत्तर प्रदेश में सीतापुर। संयोग है कि तीनों की नेता सुशिक्षित-समर्पित महिला कार्यकर्ता हैं। अपने-अपने प्रदेश में ये तीनों अकेली ऐसी जगहें हैं, जहां काफी संघर्ष के बाद मजदूरों ने भत्ता या हर्जाना लिया है। लेकिन ये अपवाद भी संगठित संघर्ष, सुशिक्षित नेतृत्व और किसी भले अफसर के संयोग से ही बन पाए। नहीं तो नियम वही है, जो चारों तरफ दिखाई देता है।
मनरेगा लागू होने से पहले ज्यां द्रेज कहते थे कि रोजगार गारंटी का कानून बन गया, तो काफी बड़ा काम हो जाएगा। अर्थशास्त्री अमित भादुड़ी ने इसके समर्थन में एक निबंध लिखा, जो डेवलपमेंट विद डिग्निटी शीर्षक से किताब के रूप में प्रकाशित हुआ था। उनका तर्क था कि इस कानून से बड़े पैमाने पर गरीबों के हाथ में पैसा आएगा, जिससे अर्थव्यवस्था में मांग बढ़ेगी और तेजी आएगी। बाद में अमित भादुड़ी ने माना कि उनकी उम्मीद गलत थी और किताब का शीर्षक भी भ्रामक था।
निष्कर्ष यही निकलता है कि जब सरकार की नीतियां और ढांचा पूरी तरह जन-विरोधी हो, तो किसी इक्का-दुक्का कार्यक्रम से लोगों के कष्ट दूर नहीं हो सकते। रोजगार की ही बात लें, तो भूमंडलीकरण के इस दौर में बड़ी संख्या में छोटे-बड़े उद्योग और सरकारी उपक्रम बंद हुए हैं, मशीनीकरण हुआ है, खेती में संकट आया है। रोजगार भी कम हुआ है और वास्तविक मजदूरी भी घटी है। एक तरह से इस बुनियादी संकट से ध्यान बंटाने का काम मनरेगा ने किया है।
सरकार के बाकी जनहितैषी कदमों के बारे में भी यही बात है। अपने-आप में वे काफी अच्छे और प्रगतिशील मालूम होते हैं, लेकिन व्यापक संदर्भ में उनकी भूमिका संदेहास्पद हो जाती है। सूचना का अधिकार एक बड़ी उपलब्धि है, लेकिन प्रशासन का केंद्रीकृत, औपनिवेशिक, जन-विरोधी ढांचा कायम है। वनाधिकार कानून वनवासियों को खेती के पट्टे देता है, लेकिन जंगलों पर सरकार का निरंकुश अधिकार कायम है। शिक्षा अधिकार कानून ऐसे समय में लाया गया है, जब शिक्षा का तेजी से और अनियंत्रित निजीकरण-बाजारीकरण हो रहा है। उस पर यह कानून कोई अंकुश नहीं लगाता, बल्कि साधारण बच्चों की पहुंच से शिक्षा दूर होती जा रही है।
इन्हीं कानूनों के साथ देश में अलग-अलग कई ‘अधिकार’ अभियान चल पड़े हैं। एनजीओ और एडवोकेसी समूहों को तो काम मिल गया है, लेकिन बुनियादी बदलाव चाहने वाली धारा के सामने भ्रम और रुकावट पैदा हो रही है। भारत का और दुनिया का अनुभव बताता है कि भूमंडलीकरण का मानवीय चेहरा संभव नहीं है। मुनाफे की भूख, प्राकृतिक संसाधनों की लूट, श्रम का शोषण और बाजारों पर कब्जे की जरूरत इतनी बढ़ गई है कि पूरी दुनिया में लोगों की जिंदगी पर हमले हो रहे हैं। ऐसे में जरूरत यह है कि पूंजीवादी भूमंडलीकरण के राक्षस के असली चेहरे को पहचान कर उसके खिलाफ संघर्ष को आगे बढ़ाया जाए।