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सुपात्रों को ही दान देना चाहिए

Thu, 26 Sep 2013 08:19 PM IST
शिवकुमार गोयल
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एक बार देवर्षि नारद सौराष्ट्र पहुंचे। वहां के राजा धर्म वर्मा परम प्रतापी थे। वह प्रजा के पालन के साथ-साथ तपस्या और शास्त्रों के अध्ययन में लगे रहते थे। एक बार दान के महत्व संबंधी किसी श्लोक का अर्थ उनकी समझ में नहीं आ रहा था। जब देवर्षि नारद उनसे मिलने पहुंचे, तो राजा ने उन्हें प्रणाम कर पूछा, देवर्षि, शास्त्रों में दान के दो हेतु और छह अधिष्ठान बताए गए हैं। वे दो हेतु कौन से हैं?
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नारद जी ने बताया, राजन, श्रद्धा और शक्ति दान के दो हेतु हैं। श्रद्धा से दिया गया दान ही फलदायी होता है। यदि कोई लालच या दबाव में दान देता है, तो उसका पुण्य नहीं मिलता। इसी तरह शक्ति का अर्थ है-अपनी सामर्थ्य के अनुसार अर्थात् कुटुंब के भरण-पोषण से जो अधिक हो, उसे ही दान में देना चाहिए। अपनी जरूरतों की पूर्ति न होने पाए, फिर भी दान देना-इसे वर्जित बताया गया है।

नारद जी ने आगे कहा, जो धन किसी को सताकर न लाया गया हो, वही दान देने योग्य है। किसी प्रयोजन की इच्छा न रखकर सुपात्र व्यक्तियों को दान देना ही धर्मदान है। जिसे दान दिया जाए, उसका बिना किसी हीन भावना से सत्कार करना चाहिए। यह धारणा रखनी चाहिए कि वह दान स्वीकार कर हम पर कृपा कर रहा है। सर्वोपयोगी कार्यों में धन लगाना ख्याति बढ़ाने वाला दान है। देवर्षि नारद के मुख से दान का महत्व सुनकर राजा की जिज्ञासा का समाधान हो गया।
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