सुझाव नया नहीं है, पर इस बार सत्ताधारी पार्टी की एक प्रमुख सदस्य की ओर से आया है, इसलिए इसकी अहमियत स्वत: बढ़ जाती है। हाल ही में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने एक कार्यक्रम में सुझाव रखा कि गीता को राष्ट्रीय पुस्तक का दर्जा दे दिया जाना चाहिए। इससे पहले सुषमा स्वराज की राजनीतिक धारा के कई नेता ही नहीं, देश की विभिन्न अदालतों की ओर से भी समय-समय पर इसी से मिलती-जुलती राय व्यक्त की जाती रही है। बेशक गीता एक ऐसी किताब है, जिसने भारतीय समाज को गहराई तक प्रभावित किया है। इसके दर्शन को समाज के बड़े तबके की स्वीकृति प्राप्त है। इसके बावजूद गीता को राष्ट्रीय पुस्तक घोषित किए जाने की मांग व्यावहारिक नहीं कही जा सकती। सरकार की ओर से इस संबंध में अगर कोई पहल की जाती है, तो उससे नाहक ही एक नए विवाद का जन्म होगा।
गीता को राष्ट्रीय पुस्तक का दर्जा दिए जाने की मांग से इसलिए भी सहमत नहीं हुआ जा सकता, क्योंकि इससे कोई मकसद हल नहीं होता। सरकार की ओर से किसी को राष्ट्रीय का दर्जा देना या न देना, महज एक तकनीकी मामला है। अहम बात समाज में व्यापक स्वीकृति की है। अगर किसी मसले पर व्यापक सामाजिक स्वीकृति है, तो फिर सरकार से कोई विशिष्ट दर्जा हासिल करने की जरूरत ही क्या है? और अगर व्यापक स्वीकृति नहीं है, तो फिर महज सरकार से एक तमगा हासिल करने से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला।
मोहनदास करमचंद गांधी नाम के शख्स को बापू या महात्मा अंग्रेजों के गजट में किसी नोटिफिकेशन के आधार पर नहीं कहा गया। लोग खुद ही सम्मान और प्रेम के वशीभूत होकर उन्हें इन नामों से संबोधित करने लगे। इसी तरह, कम ही लोगों को मालूम होगा कि नेहरू को चाचा और सरदार वल्लभ भाई पटेल को लौह पुरुष कहने की शुरुआत कहां से हुई। भगत सिंह को इस समाज ने शहीदे-आजम कहना कब और कैसे शुरू कर दिया, इसकी क्या किसी को खबर है?
बात केवल व्यक्तियों की नहीं है, अन्य तमाम संदर्भों से भी इस मसले को देखा जा सकता है। कहने को हॉकी इस देश का राष्ट्रीय खेल है, लेकिन क्रिकेट के आगे हॉकी की क्या हैसियत है, यह सबको पता है। राष्ट्रीय पक्षी का दर्जा मिलने भर से मोर का क्या कोई कल्याण हो गया? जरा कल्पना करें, प्रेमचंद को राष्ट्रीय लेखक का दर्जा दे दिया जाए, तो क्या इससे गोदान की अहमियत और बढ़ जाएगी? इसलिए बेहतर यही होगा कि सरकार इस तरह के विवादों में न फंसे। जिन्हें गीता से प्रेरणा लेनी है, वह पहले भी लेते रहे हैं और आगे भी लेते रहेंगे।
सरकार की ओर से अगर गीता को लेकर कोई पहल की जाती है, तो बात कई दूसरी दिशाओं में भी आगे जाएगी। राष्ट्रीय ध्वज के रंगों को लेकर कई संगठन सवाल उठाते रहे हैं। इनका भगवा रंग के प्रति विशेष आग्रह किसी से छिपा नहीं है। सुषमा स्वराज को ध्यान रखना होगा कि बतौर विदेश मंत्री धरती के जिस भूभाग का वह प्रतिनिधित्व करती हैं, उसका नाम भारत है और यह जिस संविधान के तहत संचालित होता है, उसमें धर्मनिरपेक्षता को एक अनिवार्य मूल्य माना गया है। ईरान तथा कई दूसरे मुस्लिम देशों में ऐसी व्यवस्था है कि धार्मिक सत्ता, सांविधानिक सत्ता को नियंत्रित करती है। पर भारत में संविधान से ऊपर कोई नहीं है।