नीति आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, करीब दो करोड़ कामगार, जिन्हें गिग वर्कर्स कहते हैं, इस तरह के कामों में लगे हुए हैं। इनके बूते चलने वाली अर्थव्यवस्था (गिग इकनॉमी) 17 फीसदी की रफ्तार से बढ़ रही है और 2024 तक इसने 455 अरब डॉलर के कुल कारोबार में हाथ बंटाया। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अपने बजट भाषण में कहा था कि भारत के जीडीपी में तेजी का कारण हमारे यहां घरेलू उपभोग में भारी बढ़ोतरी है। भारत की अर्थव्यवस्था निर्यात आधारित न होकर उपभोग आधारित है और इसलिए इन कामगारों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। भारत के क्रय प्रबंधन सूचकांक (पीएमआई) में 2025 में असाधारण बढ़ोतरी हुई और यह गिग वर्कर्स की कड़ी मेहनत से संभव हुआ है। पहले जहां खरीदार बाहर जाकर खरीदारी करने में झिझकता था, अब उसके पास दर्जनों विकल्प हैं और उसकी पसंद का सामान मिनटों में उपलब्ध हो जाता है। भारत में इंटरनेट के प्रसार-विस्तार ने यह संभव किया है।
एक स्मार्टफोन और इंटरनेट कनेक्शन से दोनों ही काम हो रहे हैं। युवाओं को रोजगार और ग्राहकों को उनकी जरूरत या पसंद का सामान उपलब्ध हो जाता है। गिग वर्कर बनने के लिए बहुत योग्यता की जरूरत नहीं है और इसलिए रोजगार का यह माध्यम तेजी से फल-फूल रहा है। इस बदलाव का असर सामाजिक व्यवस्था पर भी पड़ा है। दिल्ली, मुंबई, जैसे महानगरों में जहां घनी बस्तियों में युवा मटरगश्ती करते दिखते थे, कई जगहों में मारपीट करते रहते थे, कुछ अन्य अपराध करते थे, वहां अब शांति छा गई है। युवा सुबह-सुबह अपने काम पर निकल जाते हैं। इन युवाओं को औसतन 15 से 20 हजार रुपये तक मिल जाते हैं, यानी एक छोटे-से परिवार को चलाने के लिए धन मिल जाता है।
यहां यह जानना जरूरी है कि इन कामगारों को गिग वर्कर्स क्यों कहते हैं? दरअसल, यह शब्द अमेरिका-इंग्लैंड के म्यूजिक इंडस्ट्री से आया, जहां ऐसे कलाकार, जो अस्थायी तरीके से काम करते थे, उन्हें गिग वर्कर्स कहा जाता था। बाद में यह शब्द अस्थायी रूप से काम करने वाले कामगारों के लिए भी इस्तेमाल होने लगा। वैसे कामगार जो फ्रीलांसर होते थे, यानी किसी नौकरी से पक्के तौर पर जुड़े नहीं होते थे, वे ही गिग वर्कर कहलाते थे। ऐसे कामगार अपनी सुविधा के अनुसार अपनी पसंदगी के अनुसार काम करते हैं। इन गिग कामगारों के सामने कई सारी चुनौतियां हैं-जैसे कमाई में अस्थिरता, किसी तरह का बीमा, रिटायरमेंट लाभ, छुट्टियां, पेंशन वगैरह कुछ नहीं होते हैं। इसके अलावा, इन्हें किसी तरह की रोजगार सुरक्षा उपलब्ध नहीं है और उनके काम के घंटे भी तय नहीं हैं। उन्हें श्रम कानूनों का कवच नहीं है, जो स्थायी कर्मियों को मिलते हैं। दुर्घटना हो जाने पर उन्हें किसी तरह की वित्तीय मदद नहीं मिलती है। आर्थिक इमरजेंसी में उन्हें वह कंपनी कुछ भी नहीं देती है। अपने हिसाब से नौकरी से हटा भी देती है।
फिलहाल, यह मामला गरम हो गया है, क्योंकि कई कंपनियों ने 10 मिनट डिलीवरी का ऐलान किया है, जिससे इन गिग वर्कर्स पर भारी दबाव पड़ रहा है। यह उनके जीवन पर खतरा भी है, क्योंकि इस लक्ष्य को पूरा करने में दुर्घटना की पूरी आशंका है। अभी ही हर दिन दर्जनों डिलीवरी बॉय दुर्घटना का शिकार हो रहे हैं। कई बार कंपनियां उन पर पेनाल्टी भी लगाती हैं। सच तो यह है कि उनके काम करने की दशा बेहद खराब है। डिलीवरी के रेट कई बार इतने कम होते हैं कि उन्हें बेगार कराए जाने का एहसास होता है। अगर कोई कामगार 15 घंटे लगातार काम करके 700-800 रुपये कमाता है, तो फिर फायदा ही क्या है? ये सभी सवाल पिछले दिनों उनकी हड़ताल के दौरान उठे। उम्मीद है कि इसका समाधान निकलेगा।
भारत सरकार ने 2025-26 के बजट में गिग वर्कर्स के लिए कई कल्याणकारी कदमों की घोषणा की है। उनका पंजीकरण ई-श्रम पोर्टल पर करने की व्यवस्था की गई है। उन्हें आईडी कार्ड देने की भी व्यवस्था की जा रही है। आयुष्मान भारत स्वास्थ्य स्कीम में उन्हें पांच लाख रुपये तक का सुरक्षा कवच दिया जा रहा है। श्रम मंत्रालय ऐसे कामगारों को ई-श्रम पोर्टल पर पंजीकरण के लिए जोर दे रहा है। सरकार का मानना है कि ये कामगार डिजिटल अर्थव्यवस्था में जबर्दस्त योगदान दे रहे हैं। ये कम पारिश्रमिक वाले कामगार हैं और उद्योगों तथा कंपनियों की लागत कम रखने में मदद करते हैं। आज के आर्थिक माहौल में ये बिजनेस का जरूरी हिस्सा बन गए हैं और इसलिए इन्हें सहारा देना तथा इनके साथ अन्याय न होने देना सरकार तथा कंपनियों का फर्ज है।