रिपोर्ट में बताया गया है कि 2024 की पहली छमाही के दौरान भारत ने चीन को 8.5 अरब डॉलर का निर्यात किया, जबकि 50.4 अरब डॉलर का सामान आयात किया, जिसके परिणामस्वरूप 41.9 अरब डॉलर का व्यापार घाटा हुआ। भारत के सबसे बड़े व्यापार घाटे वाले साझेदार के रूप में चीन के उदय ने यह सोचने के लिए मजबूर कर दिया है कि चीन के साथ व्यापार में असंतुलन अब सिर्फ आर्थिक मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह देश की सुरक्षा और भावी पीढ़ियों की समृद्धि के लिए एक गंभीर खतरा बन गया है।
चीन से होने वाले लागत-प्रतिस्पर्धी आयात भारतीय एमएसएमई को नुकसान पहुंचा रहे हैं, क्योंकि आयातित उत्पादों में से कई इन स्थानीय व्यवसायों द्वारा बनाए जाते हैं। भारतीय एमएसएमई सस्ते चीनी उत्पादों से प्रतिस्पर्धा करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। यह प्रतिस्पर्धा न केवल उनकी लाभप्रदता को कम कर रही है, बल्कि उनके अस्तित्व को भी खतरे में डाल रही है, जिससे नौकरियां खत्म हो रही हैं और आर्थिक विकास अवरुद्ध हो रहा है। महत्वपूर्ण औद्योगिक वस्तुओं और प्राकृतिक संसाधनों के लिए आयात पर भारी निर्भरता रणनीतिक दखल की जरूरत को उजागर करती है। घरेलू निर्माताओं के लिए समान अवसर उपलब्ध कराने और व्यापार असंतुलन को कुछ हद तक कम करने के लिए भारत ने 2016 से 500 से अधिक वस्तुओं पर आयात शुल्क बढ़ा दिया है। हालांकि, ये उपाय चीनी वस्तुओं पर निर्भरता कम करने में अप्रभावी रहे हैं, क्योंकि ऐसे कई कदमों का उद्योग और अन्य सरकारी मंत्रालयों और विभागों ने विरोध भी किया है। हाल ही में, कई सरकारी मंत्रालयों/विभागों ने चीन से आयात पर लक्षित सीमा शुल्क में वृद्धि पर आपत्ति जताई है। उनका तर्क है कि चूंकि चीन से आयात घरेलू उद्योग में उपयोग किया जाता है, इसलिए टैरिफ बढ़ाकर आयात में बाधा डालने से भारतीय विनिर्माण की प्रतिस्पर्धा क्षमता में कमी आएगी। यहां तक कि उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन (पीएलआई) योजना, जिसका उद्देश्य आयात निर्भरता को कम करना है, में भी चीन की महत्वपूर्ण उपस्थिति होगी, क्योंकि इस योजना के 12 विजेताओं में से 11 के आपूर्ति शृंखला साझेदार और सेवा प्रदाता चीनी हैं। सरकार और उद्योग के बीच वैचारिक मतभेद समस्या का केवल एक पहलू है।
कई भारतीय निर्माता, जो लंबे समय से चीन से सस्ते सामान का आयात करते हैं, उच्च टैरिफ का विरोध करते हैं। एक ताकतवर आयात लॉबी है, जो चीनी वस्तुओं पर किसी भी प्रतिबंध का विरोध करती है। जबकि भारतीय उद्योग का एक दूसरा वर्ग टैरिफ बढ़ाने की बात करके संरक्षणवाद की वकालत करता है। इसलिए भारत को बड़े पैमाने पर चीन की तरह विनिर्माण को समन्वित और व्यवस्थित करने की जरूरत है। भारत इस मुद्दे को केवल उद्योग जगत पर छोड़ने का जोखिम नहीं उठा सकता।
आर्थिक संप्रभुता की रक्षा और सतत विकास को बढ़ावा देने के लिए घरेलू उत्पादन को मजबूत करना महत्वपूर्ण है। भारत ने अन्य देशों की तरह एक ही देश पर निर्भरता के जोखिम को महसूस किया और ज्यादा से ज्यादा मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए) पर हस्ताक्षर करके चीन से अलग हो रहा है। भारत सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रिक वाहनों जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में घरेलू विनिर्माण क्षमताओं को भी प्रोत्साहित कर रहा है। हालांकि इसका नतीजा मिलने में अभी कुछ वक्त लगेगा। व्यापार घाटा पैदा होने के कई कारण होते हैं, इसलिए अर्थशास्त्रियों में अक्सर इस बात पर मतभेद होता है कि निरंतर व्यापार घाटा अच्छा है, बुरा है, या किसी देश और उसकी अर्थव्यवस्था के लिए बहुत मायने नहीं रखता। लेकिन व्यापार घाटा किसी देश की बचत और निवेश दरों के बीच असंतुलन है। आर्थिक सिद्धांतों के अनुसार, देश को उसकी भरपाई करनी चाहिए। लेकिन हमेशा यह जरूरी नहीं है कि व्यापार घाटा बढ़ने से देश की आर्थिक सेहत पर बहुत नकारात्मक असर पड़ता है।
अमेरिका में कई बार बढ़ते व्यापार घाटे के दौरान मजबूत आर्थिक विकास देखा गया है, क्योंकि उपभोक्ता और व्यवसायी विदेशों से अधिक उत्पाद और सेवाएं खरीदते हैं, और विदेशी निवेशक अपना पैसा अमेरिका में निवेश करना चाहते हैं। एक दूसरा उदाहरण पूर्वी एशिया से, जहां कई देशों ने 1990 के दशक में बड़े व्यापार घाटे का सामना किया और विदेशी पूंजी का आगमन हुआ। इनमें से कुछ देशों में थाईलैंड, इंडोनेशिया और मलयेशिया शामिल थे। उस निवेश का पूरा हिस्सा कुशलता या बुद्धिमत्तापूर्वक आवंटित नहीं किया गया था, और जब 1997 और 1998 में एशियाई वित्तीय संकट पैदा हुआ, तो विदेशी निवेशक तुरंत भाग निकले। इससे ये पूर्वी एशियाई देश वैश्विक वित्तीय बाजारों की दया पर निर्भर हो गए। इसके परिणाम दर्दनाक थे।
चीन के साथ व्यापार घाटे के बढ़ते खतरे से निपटने के लिए भारत को अमेरिका और पूर्वी एशियाई प्रयोगों में से किसी एक को चुनना होगा। अर्थशास्त्री इस बात से भी इन्कार करते
हैं कि व्यापार घाटे का रोजगार पर कोई असर पड़ेगा। कुछ लोग तर्क देते हैं कि आयात अनिवार्य रूप से घरेलू रोजगार को कम करता है, जबकि अन्य समान व्यापार संबंधों के माध्यम से अन्य क्षेत्रों में रोजगार वृद्धि की भरपाई का संकेत करते हैं। प्रायः रोजगार का नुकसान कुछ खास क्षेत्रों तक सीमित रहता है। बड़े घाटे के प्रबंधन में अमेरिकी अनुभवों से सीखते हुए भारत को न केवल चीन के साथ व्यापार घाटे के नकारात्मक पक्ष पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, बल्कि उत्पादकता बढ़ाने की रणनीति बनाने पर भी ध्यान केंद्रित करना चाहिए। उपमहाद्वीप जितना बड़ा देश विश्व व्यापार से खुद को अलग नहीं रख सकता, इसलिए निस्संदेह भारत को चीन के व्यापार के गुण-दोषों की जांच करनी चाहिए और उसके अनुसार कार्य करना चाहिए।