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अंतरराष्ट्रीय सियासत: चीन पर काबू रखना जरूरी है... तभी सुनिश्चित होगा स्वतंत्र और मुक्त हिंद-प्रशांत क्षेत्र

केएस तोमर
Updated Sat, 10 Aug 2024 04:41 AM IST

सार

ढाका में शेख हसीना के पतन से चीन को खुला मैदान मिल गया है। ऐसे में, भारत को सुनिश्चित करना होगा कि 'पड़ोसी पहले' की उसकी नीति नए भू-राजनीतिक बदलावों के साथ तालमेल में हो। साथ ही चीन को काबू में रखने के लिए भारत और अमेरिका को भी संयुक्त रणनीति के साथ आगे बढ़ना होगा।
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चीन और भारत - फोटो : सोशल मीडिया


विदेश नीति के विशेषज्ञों का मानना है कि पारस्परिक हित और बाध्यता के सिद्धांत के कारण भारत और अमेरिका को बांग्लादेश के प्रति अपनी मौजूदा नीति में बदलाव लाना होगा, जो चीन और पाकिस्तान की राह पर चल रहा है और जिससे दक्षिण एशिया में सुरक्षा के लिए खतरा पैदा हो रहा है। पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना आरोप लगा रही हैं कि उनकी सरकार को अस्थिर करने में अमेरिका का हाथ रहा है। लेकिन भारत बांग्लादेश की नई सरकार से अलग-थलग नहीं रह सकता है, जिसका नेतृत्व वही खालिदा जिया कर सकती हैं, जो खुद को भारत-विरोधी खेमे का मानती हैं।


ढाका की नई सरकार पर खालिदा जिया और कट्टरपंथी हावी हो सकते हैं, जिससे भारत के लिए सिरदर्द पैदा हो सकता है। अमेरिका को हसीना शासन के निष्कासन से खुश नहीं होना चाहिए, क्योंकि इससे चीन मजबूत होगा, जो महाशक्ति देश के रूप में अमेरिका की जगह लेना चाहता है। इसलिए अमेरिका को भारत की मदद से चीन का मुकाबला करने की जरूरत है, क्योंकि भारत विश्व मंच पर आर्थिक ताकत के रूप में उभर रहा है। साथ ही भारत को चीन के बढ़ते प्रभाव पर नजर रखनी होगी, जिसने पहले ही मालदीव, नेपाल, म्यांमार, पाकिस्तान और श्रीलंका तक को अपने पाले में मिला लिया है। बांग्लादेश भी उसके पिछलग्गू बन सकते हैं।


विशेषज्ञों का मानना है कि चीन का मुकाबला करने के लिए भारत को अपने 'पड़ोसी पहले' की नीति में भू-राजनीतिक बदलाव की जरूरत है। चीन ने वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलओसी) पर तनाव पैदा किया है और भारत को कमजोर करने के लिए भारत विरोधी ताकतों को बढ़ावा दिया है। भारत अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखते हुए स्वतंत्र विदेश नीति का पालन करता है। लेकिन कई क्षेत्रों में अमेरिका की करीबी देखते हुए उस पर भरोसा किया जा सकता है, जो पारस्परिक विश्वास और लाभ के सिद्धांत पर आधारित होगा। आलोचकों का मानना है कि भारत को अपनी विदेश नीति में भारी बदलाव लाने की जरूरत है, अन्यथा चीन हावी हो सकता है, जो बीआरआई के जरिये हरेक देश में भारत विरोधी ताकतों की मदद करता है, जैसा कि बांग्लादेश में दिखाई दे रहा है। बांग्लादेश के संदर्भ में भारत हसीना की सत्तारूढ़ अवामी लीग के साथ ही काम करने में विश्वास करता रहा और संभावित विपक्ष खालिदा की बीएनपी को नजर अंदाज करता रहा। अब हसीना विरोधी ताकतें ढाका में सत्ता में आई हैं, जो भारत को दुश्मन समझती हैं। अगर भारत ने बीएनपी के साथ अच्छे संबंध बनाए होते, तो पाकिस्तान की आईएसआई और चीन पर अंकुश लगाया जा सकता था।


भारत और बांग्लादेश के बीच मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) पर बातचीत चल रही थी, क्योंकि यह दोनों देशों के व्यापार के लिए जरूरी है। दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार वर्ष 2023-24 के दौरान 13 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है। लेकिन अब बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के शासन में एफटीए का भविष्य अनिश्चित बना हुआ है। हालांकि ढाका की नई सरकार एफटीए चर्चा को बीच में ही छोड़ने का जोखिम नहीं उठा सकती, क्योंकि इससे दोनों देशों के लोगों के हितों को नुकसान होगा। ऐसे में उम्मीद की जा सकती है कि यह समझौता जरूर होगा। राजनीतिक संकट के कारण लगभग 30 करोड़ डॉलर का निर्यात व्यापार प्रभावित हुआ है, खासकर तब, जब भारत हर दिन बांग्लादेश को तीन करोड़ डॉलर का सामान निर्यात करता है। भारत का आयात जारी है, लेकिन निर्यात रुका हुआ है, जिसका समाधान अंतरिम सरकार को करना होगा, ताकि हर दिन बढ़ने वाले घाटे को रोका जा सके। बांग्लादेश हर दिन करीब 15 ट्रक मछली निर्यात करता था, जो अब घटकर एक ट्रक रह गया है। बांग्लादेश के कस्टम विभाग ने सैकड़ों भारतीय ट्रकों को बांग्लादेश में घुसने की मंजूरी नहीं दी है, जो पार्किंग में खड़े हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अंतरिम सरकार के नए मुख्य सलाहकार मोहम्मद यूनुस और अंतरिम सरकार को प्राथमिकता के आधार पर इन मुद्दों पर ध्यान देना चाहिए।


भारत विरोधी अभियान के जरिये सत्ता में आए मालदीव के नए राष्ट्रपति मोइज्जू के शासन में मालदीव का झुकाव चीन की तरफ हो गया है। मोइज्जू ने खुलेआम चीन की प्रशंसा की, जिसने उन्हें चुनाव में मदद की थी। लगभग यही स्थिति नेपाल की है, क्योंकि भारत ने नेपाली कांग्रेस का समर्थन किया और कम्युनिस्ट सरकारों की उपेक्षा की, जिससे वे भारत विरोधी बन गए। 1990 के दशक में छह वर्ष तक नेपाल में रहने के दौरान मैंने देखा है कि चीनी दूतावास ने निर्वाचित प्रतिनिधियों को गुप्त रूप से भौतिक प्रलोभन के जरिये खुश रखा, जो सत्ता में आने पर उनके लिए फलदायी साबित हुए। चीन समर्थक और भारत विरोधी केपीएस ओली नेपाली कांग्रेस के साथ गठबंधन सरकार के प्रमुख हैं। उम्मीद करनी चाहिए कि नेपाली कांग्रेस ओली को भारत विरोधी रुख त्यागने के लिए मजबूर कर सकती है।


इसी प्रकार की नीति भारत ने श्रीलंका में भी अपनाई थी। लेकिन जब श्रीलंका का आर्थिक रूप से पतन हो गया, तो भारत ने श्रीलंका की मदद की। नतीजतन भारत वहां के आम लोगों का चहेता बन गया है, जो नई दिल्ली द्वारा मुश्किल वक्त में दी गई वित्तीय सहायता की सराहना करते हैं, जबकि चीन ने खुद को इससे दूर रखा। हालांकि म्यांमार में भारत ने सैन्य शासन के साथ संतुलन बनाए रखने की कोशिश की है। इसलिए भारत और अमेरिका को संयुक्त रूप सेएक कार्ययोजना बनानी होगी, जिसमें रणनीतिक साझेदारी मजबूत करना, क्वाड सहयोग बढ़ाना, व्यापार एवं बुनियादी ढांचे के विकल्प को बढ़ावा देना, संयुक्त सैन्य अभ्यास को विस्तार देना, प्रौद्योगिकी पर सहयोग देना, कूटनीतिक रूप से सहयोग करना, विकास कार्यों के लिए सहायता देना, गलत सूचनाओं के प्रसार को रोकना और एशिया में संप्रभुता का समर्थन करना शामिल है, जिसका उद्देश्य सार्क देशों में चीन के प्रभाव को कम करना और एक स्वतंत्र, मुक्त हिंद-प्रशांत क्षेत्र सुनिश्चित करना है।

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