एक ऐसे देश में जहां बड़ी आबादी को अपने इलाज का खर्च खुद ही वहन करना होता है, जिसके चलते कई बार लोग अपना सब कुछ लुटा डालते हैं, आखिर जन स्वास्थ्य की प्राथमिकताएं किस तरह तय होनी चाहिए? यह बिल्कुल अलग तरह का प्रश्न है। संसाधन सीमित हैं और प्राथमिकताओं का अंबार है, लिहाजा नीति नियंताओं का इस ओर ध्यान जाना आसान नहीं है। जनस्वास्थ्य की प्राथमिकताएं तय करते हुए एक अहम कारक जिस पर विचार किया जाना चाहिए वह यह है कि आखिर जो निवेश किया जा रहा है, उससे कितना लाभ होगा। दूसरे शब्दों में सार्वजनिक खजाने से इस मद में होने वाले खर्च और दीर्घकालीन लाभ में कितना संतुलन है?
एक अंतरराष्ट्रीय जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन इस महत्वपूर्ण विमर्श को आगे बढ़ाने में कीमती योगदान कर सकता है। यह अध्ययन हेपेटाइटिस सी से संबंधित है। यह बीमारी हेपेटाइटिस सी वायरस (एचसीवी) से होती है और लीवर को नुक्सान पहुंचाती है। यह धीमी मौत लाने वाली बीमारी है। अंतरराष्ट्रीय जर्नल पीएलओएस (पब्लिक लाइब्रेरी ऑफ साइंस) का अध्ययन दिखाता है कि हमारे देश में इसका इलाज सस्ता है। हेपेटाइटिस सी के इलाज के लिए भारत में निर्मित होने वाली जेनेरिक दवाओं के तीन महीने के कोर्स का खर्च तीन सौ डॉलर या करीब 19,000 रुपये है। अमेरिका में इसके इलाज की कीमत पैंसठ हजार डॉलर है। भारत में इसकी कीमत और कम हो सकती है, बशर्ते की सरकारी संस्थाएं ये दवाएं थोक में खरीदें। अध्ययन दिखाता है कि जल्द इलाज मुहैया कराया जाए, तो न केवल जिंदगी बचाई जा सकती है, बल्कि इससे जीवन प्रत्याशा आठ वर्ष तक बढ़ सकती है और जीवनपर्यंत स्वास्थ्य खर्च में प्रति व्यक्ति 1,309 डॉलर तक बचाए जा सकते हैं।
यह अंतरराष्ट्रीय अध्ययन काफी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसके मुख्य लेखकों में लखनऊ स्थित संजय गांधी पोस्ट ग्रेज्युएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज के गैस्ट्रोएंटरोलॉजी (जठरांत्र विज्ञान) से संबद्ध डॉ संजय अग्रवाल शामिल हैं। उल्लेखनीय है कि लखनऊ का यह संस्थान विश्व स्वास्थ्य संगठन का वायरल हेपेटाइटिस के मामले में सहयोगी केंद्र है।
विश्व भर में 7.1 करोड़ लोग लंबे समय से हेपेटाइटिस सी संक्रमण से प्रभावित हैं। जिन लोगों में यह संक्रमण काफी समय से है, उनमें सिरोसिस या लीवन कैंसर होने का खतरा होता है। दुनियाभर में तीन लाख निन्यानबे हजार लोगों की हर साल हेपेटाइटिस सी के काऱण मौत हो जाती है। भारत में ही 90 लाख लोग हेपेटाइटिस सी वायरस से संक्रमित हैं। इससे प्रभावित होने वाला सबसे आम कारक प्रदूषित खून है। इंजेक्शन के द्वारा लिए जाने वाले नशीले पदार्थों, या असुरक्षित इंजेक्शन, स्वास्थ्य सुरक्षा में लापरवाही, असुरक्षित रक्त संचार आदि के कारण इसका संक्रमण हो सकता है।
हालांकि इस बात के पुख्ता आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं कि देश में इस बीमारी से हर साल कितने लोगों की मौत हो जाती है, मगर ताजा शोध दिखाता है कि इसका जल्द इलाज किया जा सकता है और किया भी जाना चाहिए। अग्रवाल कहते हैं कि हेपेटाइटिस सी संक्रमण की पहचान करने के लिए व्यापक रूप से लोगों की जांच करने की जरूरत नहीं है। इसके बजाए कुछ वर्ष पहले तक जिन लोगों के शरीर में रक्त चढ़ाया गया है, उन्हें खुद से इसकी जांच करवानी चाहिए। ऐसे लोगों से वह कहते हैं कि यदि आप आज थोड़ा पैसा खर्च करते हैं, तो यह समझ लीजिए कि आप अपने भविष्य का काफी कुछ बचा रहे हैं।
यह दुखद है कि भारत में हेपेटाइटिस सी का नया इलाज पहले से काफी सस्ता हो चुका है, इसके बावजूद बहुत से लोगों का इलाज नहीं हो पाता। उनमें बहुत से ऐसे होते हैं, जिनकी जांच ही नहीं हो पाती और बहुत से ऐसे लोग होते हैं, जिनके हेपेटाइटिस सी से संक्रमित होने का पता तो चल जाता है, मगर वह इलाज के लिए जरूरी 19 हजार रुपये का खर्च वहन नहीं कर सकते। इलाज नहीं मिलने के कारण उनके लीवर पर असर पड़ता है और वे और अधिक गंभीर रूप से बीमार पड़ जाते हैं। यहां तक कि कुछ लोगों में लीवर कैंसर तक हो जाता है, जिसका खर्च लाखों रुपयों में होता है।
जाहिर है, भारत और दूसरे ऐसे देशों में जहां जेनेरिक एंटीवायरल दवाएं उपलब्ध हैं, हेपेटाइटिस सी का इलाज जनस्वास्थ्य एजेंसियों की प्राथमिकता में होना चाहिए। भारत में पंजाब अकेला ऐसा राज्य है, जहां सभी जिला अस्पतालों और तीन मेडिकल कॉलेजों में हेपेटाइटिस सी से पीड़ित व्यक्तियों का मुफ्त इलाज उपलब्ध है। पंजाब सरकार हेपेटाइटिस सी के तीन महीने के इलाज के कोर्स की दवाएं एक तिहाई दाम 110 डॉलर में खरीदती है। हरियाणा में रोहतक स्थित पोस्ट ग्रेज्युएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज में गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले संक्रमित लोगों के मुफ्त इलाज की सुविधा उपलब्ध है। पूर्वोत्तर के कुछ राज्यों में भी जनस्वास्थ्य प्रणाली में इस बीमारी के इलाज के कुछ सीमित प्रावधान किए गए हैं।
अपने देश में जनस्वास्थ्य व्यवस्था के अंतर्गत एचआईवी/एड्स से पीड़ित लोगों को मुफ्त में एंटी-रेट्रोवॉयरल देने की सुविधा है, मगर हेपेटाइटिस सी जैसी कई जानलेवा बीमारियों के इलाज की ऐसी कोई सुविधा उपलब्ध नहीं है। हमारे यहां स्वास्थ्य सेवाओं का यह हाल है कि लोग जब तक इलाज का खर्च वहन करने की स्थिति में नहीं होते इलाज करवाने से बचते हैं।
पीएलओएस का अध्ययन देश में सस्ती जीवनरक्षक दवाओं को जनस्वास्थ्य सेवा का हिस्सा बनाने के लिए विमर्श का अवसर प्रदान करता है। इसकी शुरुआत हेपेटाइटिस सी के जेनेरिक एंटीवॉयरल से की जा सकती है। सरकार पहल कर इसकी कीमत और कम करवा सकती है और जेनेरिक दवा निर्माताओं को और अधिक दवाओं के निर्माण के लिए प्रोत्साहित कर सकती है। राजनीतिक वर्ग क्या यह शुरुआत करने को तैयार है?