इस बात पर सारे देश में सर्वसम्मति-सी है, इसलिए आप भी इससे सहमत अवश्य होंगे कि जमाना खराब है, बल्कि बहुत ही खराब है। दस साल पहले भी आपने और मैंने यही कहा था कि जमाना बहुत खराब है। उससे दस साल पहले भी हमने यही कहा था। तब अगर आपने ऐसा नहीं कहा होगा, तो आपके पिताजी ने ऐसा जरूर कहा होगा।
यानी मेरे जैसे लोग जब से कुछ सीखने-समझने लायक हुए हैं, तब से तो निश्चित रूप से जमाना खराब ही चल रहा है। ससुरा सुधर ही नहीं रहा। पता नहीं, यह किसका षड्यंत्र है। अच्छा जमाना पता नहीं, क्यों नहीं आता। न उसे हमारे दादाजी ला पाए, न पिताजी ला पाए, न हम ला पाए हैं और न हमारे बेटे-बेटी ला रहे हैं। पोते-पोतियों, नातियों-नातिनों से उम्मीद करने में वैसे कोई बुराई नहीं, मगर लक्षण ऐसे ही रहे, तो उनके समय में भी जमाना खराब ही रहनेवाला है।
हां, तो मूल बात यह है कि जमाना बहुत खराब है और पहले से बहुत खराब है। मोदी जी जब प्रधानमंत्री नहीं बने थे, तब कहते थे कि अच्छे दिन आनेवाले हैं। उनके तो अच्छे दिन आ गए हैं, मगर हमारे नहीं आए। सही बात है, वह प्रधानमंत्री हैं, उनके अच्छे दिन और हमारे अच्छे दिन एक साथ कैसे आ सकते हैं? कहां वह राजा भोज और कहां हम गंगू तेली। वैसे भी हमारे अच्छे दिन आने के लिए अभी पूरे साढ़े चार साल बचे हैं। तब भी नहीं आए, तो उसके बाद के अगले पांच वर्षों में आ जाएंगे। और तब भी नहीं आए, तो उसके बाद के चुनाव बाद आ जाएंगे।
मगर खुदा न खास्ता, हमारे अच्छे दिन आ भी गए, तो क्या जमाना खराब नहीं रहेगा? बुरे दिनों को बुरे रहने की लत पड़ चुकी है। वैसे अच्छे दिन अपनी जगह हैं, खराब जमाना अपनी जगह है। वैसे सवाल यह भी है कि किसके आएंगे अच्छे दिन, क्योंकि हमेशा से यही होता आया है कि जिसके पहले से अच्छे दिन चल रहे थे, उसी के अच्छे दिन आ जाते हैं, और वे इतनी जोर से शोर मचाना शुरू कर देते हैं कि लगता है, सबके अच्छे दिन आ गए।