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गांधीवादी एआई मॉडल की जरूरत: तकनीक अपनाओ, साधन शुद्ध रखो; ताकत का विकेंद्रीकरण करो, सबसे कमजोर आदमी हो पैमाना

डॉ. अविनाश कुमार श्रीवास्तव Published by: ज्योति भास्कर Updated Tue, 27 Oct 2026 03:53 AM IST

सार

एआई की दुनिया इस समय अजीब जल्दबाजी में है। कंपनियां एक-दूसरे से आगे निकलने के लिए और शक्तिशाली मॉडल बना रही हैं। इसी बीच बनाने वाले ही कह रहे हैं कि ठहरो और सोच-विचारकर धीमी रफ्तार से आगे बढ़ो। सवाल यह नहीं कि भविष्य में एआई कितना ताकतवर होगा, बल्कि यह है कि उसकी ताकत किसके लिए और किस कीमत पर होगी।
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गांधीवादी एआई मॉडल की कई कसौटियां (सांकेतिक) - फोटो : अमर उजाला प्रिंट-एआई ग्राफिक्स


पहली चिंता यह है कि मशीन के पास मनुष्य जैसी सही-गलत की समझ नहीं होती। वह दिए गए लक्ष्य को हासिल करने के लिए ऐसे रास्ते अपना सकती है, जिन्हें मनुष्य अनैतिक या अस्वीकार्य मानता है। दूसरी चिंता मशीनों के आपसी तालमेल की है। चिंता का अगला स्तर उस संभावना से जुड़ा है, जब एआई प्रणालियां अपने अगले संस्करणों को विकसित करने में खुद बड़ी भूमिका निभाने लगें। उस स्थिति में नियंत्रण, जवाबदेही और सुरक्षा के सवाल कहीं अधिक गंभीर हो सकते हैं। इसलिए, एआई के विकास की रफ्तार को लेकर उठ रही चिंताओं को नजरअंदाज करना आसान नहीं है। इसके बरक्स एक तर्क यह भी है कि अगर हम धीमे पड़े, तो हमारे प्रतिद्वंद्वी आगे निकल जाएंगे। यहीं भारत के पास दुनिया को देने के लिए एक अनोखा, व्यावहारिक और सौ साल पुराना आजमाया हुआ विचार है, जिसे ‘गांधीवादी एआई मॉडल’ कह सकते हैं।


गांधीवादी एआई मॉडल का अर्थ है एआई को साधन की कसौटी पर कसना। पहली कसौटी साधन की शुचिता व सत्य की है। नकल और छल-कपट से जीतने वाली मशीन सफल नहीं, खतरनाक मानी जाएगी। उस पर नियंत्रण का प्रावधान हो। परीक्षण निगरानी में हों, घटनाओं का तुरंत खुलासा हो और स्वतंत्र जांच जरूरी हो। एआई की बनाई सामग्री पर साफ लिखा हो कि वह एआई द्वारा बनाई गई है।


दूसरी कसौटी अहिंसा की है। जो एआई मनुष्य, मशीन और मानवता को नुकसान पहुंचा सकता है, उसकी डिजाइन में सुरक्षा फीचर्स पहले से शामिल हों; बाद में सुधार का इंतजार न किया जाए। इसके लिए विकसित, विकासशील और अल्पविकसित देशों की समान भागीदारी वाला वैश्विक सरकारी और विशेषज्ञ तंत्र बनाया जाए।


तीसरी कसौटी मनुष्य की सत्ता की है। एआई एजेंटों की आपसी बातचीत ऐसी हो, जिसे इन्सान पढ़ और परख सकें, और अंतिम निर्णय का अधिकार हमेशा इन्सान के हाथ में रहे।


चौथी कसौटी दांडी की चाल की है। दांडी मार्च की तर्ज पर शक्तिशाली एआई मॉडलों के लिए चरणबद्ध नियम, स्वतंत्र जांच और खतरे के संकेत पर अनिवार्य रोक की व्यवस्था हो।


पांचवीं कसौटी अंत्योदय, यानी गांधी जी के जंतर की है। हर कदम से पहले देखा जाए कि सबसे कमजोर राष्ट्र व व्यक्ति को उससे क्या मिलेगा? छठी कसौटी स्वदेशी और न्यासिता की है। जिस समुदाय की भाषा और ज्ञान से डाटा बनता है, उसकी उसमें भागीदारी और सहमति हो। इस राह पर भारत ने भी शुरुआत कर दी है।
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इंडिया एआई मिशन के लिए 10,371.92 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। भाषिणी पर 350 से अधिक एआई मॉडल उपलब्ध हैं, जबकि सर्वम और भारतजेन जैसे स्वदेशी एआई मॉडल विकसित किए जा रहे हैं। एआई इंपैक्ट समिट में प्रधानमंत्री मोदी ने नैतिकता, जवाबदेही, राष्ट्रीय संप्रभुता, समावेशन व वैधता पर आधारित मानव-केंद्रित एआई का दृष्टिकोण भी रखा।


गांधीवादी एआई मॉडल की जरूरत इसलिए है, क्योंकि दुनिया एआई की दौड़ जारी रखने और इसे पूरी तरह रोकने के दो धड़ों में बंट रही है। एक तरफ तो लोग कहते हैं कि कुछ भी हो, दौड़ नहीं रुकेगी। दूसरी तरफ कुछ लोग सब कुछ रोक देने की बात करते हैं। गांधी जी तीसरा रास्ता दिखाते हैं- तकनीक को अपनाओ, पर साधन शुद्ध रखो, शक्ति का विकेंद्रीकरण करो और सबसे कमजोर आदमी को पैमाना मानो।

-लेखक इलाहाबाद विश्वविद्यालय के गांधी विचार एवं बौद्ध शांति अध्ययन केंद्र के समन्वयक हैं।  

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