भारतीय राजनीति का परिदृश्य तेजी से बदल रहा है। अभी हाल तक राजनीतिक मंच पर नरेंद्र मोदी लंबे-लबे कदम भर रहे थे और उनका रुकना मुश्किल लग रहा था। लेकिन अब प्रधानमंत्री की रेस में तीन नेता दिख रहे हैं, जिसमें मोदी और राहुल गांधी के अलावा अरविंद केजरीवाल भी हैं, जिनके बारे में यह अनुमान लगाया जा रहा है कि 7 रेस कोर्स रोड की तरफ मोदी के बढ़ते रथ को वह थाम सकते हैं।
वैसे इधर, पिछले कुछ समय से कांग्रेस के अंदरखाने से ऐसे संकेत आ रहे हैं कि 17 जनवरी को राहुल गांधी को आधिकारिक रूप से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया जा सकता है। लेकिन इस सूचना के बाहर आने के साथ ही पार्टी के अंदर कुछ लोगों की भवें भी टेढ़ी होती दिख रही हैं। दिग्विजय सिंह ने, जो पिछले एकाधिक अवसरों पर राहुल गांधी को प्रधानमंत्री उम्मीदवार बनाने की वकालत कर चुके थे, बयान दिया कि संसदीय लोकतंत्र में प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार पहले से घोषित नहीं किया जाता।
इसी तरह, राहुल की संभावित ताजपोशी के चार दिन पहले गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने कहा है कि यदि शरद पवार प्रधानमंत्री बनें, तो उन्हें खुशी होगी। मालूम रहे कि दिग्विजय सिंह 12 तुगलक लेन (राहुल गांधी का आवास) के करीब माने जाते हैं, तो शिंदे 10 जनपथ (सोनिया गांधी का आवास) के।
अगर दोनों नेता पार्टी आलाकमान के निर्देश के तहत काम कर रहे हैं, तो दिग्विजय सिंह के बयान का अर्थ राहुल को प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में पेश करने पर पुनर्विचार करना हो सकता है। कुछ का मानना है कि इसके बदले उन्हें पार्टी अध्यक्ष बनाया जा सकता है। वहीं शिंदे के बहाने मराठा दिग्गजों को शांत करते हुए उन्हें यह संदेश देना छिपा हो सकता है कि कांग्रेस राकांपा के नेतृत्व में एक 'तीसरे मोर्चे' की सरकार को समर्थन दे सकती है। वहीं, अगर ये दोनों नेता कांग्रेस आलाकमान के निर्देश के इतर काम कर रहे हैं, तो साफ है कि वे राहुल पर निशाना साध रहे हैं, जो बताता है कि कांग्रेस न सिर्फ पार्टी, बल्कि नेतृत्व के रूप में भी कमजोर साबित हो रही है।
बहरहाल, कांग्रेस नेता जिस तरह के भी दावें करें, वे जानते हैं कि संप्रग-तीन सत्ता में नहीं आ रहा। मौजूदा दौर में, जबकि कांग्रेस के खिलाफ इतनी नकारात्मकता है, राहुल को कमान सौंपना आसान फैसला नहीं होगा। निजी तौर पर कांग्रेस के कई नेतागण बदलते घटनाक्रम में उनकी योग्यता को लेकर अपनी आशंका जता रहे होंगे। अगर कांग्रेस 2014 के चुनाव में औंधे मुंह गिरती है, जो दिखता प्रतीत हो रहा है, तो राहुल गांधी की पहली चुनौती सभी को एक साथ जोड़कर रखने की होगी।
कांग्रेस के सामने विकल्प तब और भी मुश्किल-भरा हो सकता है, जब उसके सहयोग से गैर-कांग्रेस, गैर-भाजपा सरकार बनने की नौबत आ जाए। ऐसी स्थिति में ज्यादातर राज्य क्षत्रपों से बेहतर संबंध को देखते हुए शरद पवार की स्वीकार्यता प्रधानमंत्री पद के लिए हो सकती है। लेकिन कांग्रेस के नेताओं के साथ लंबे समय तक साथ बिताने की वजह से उनके पास कांग्रेस को तोड़ने या उसे अपने पक्ष में मोड़ने की शक्ति होगी। वैसे भी अधिकांश कांग्रेस सांसद अपनी योग्यता के बूते 16वीं लोकसभा में प्रवेश करेंगे, न कि राहुल गांधी के करिश्मे की वजह से। लिहाजा राहुल के लिए राह आसान नहीं होगी।
हालांकि कोशिश प्रियंका गांधी के भविष्य को लेकर भी रहस्य बनाने की हो रही है, लेकिन यह सब पार्टी कार्यकर्ताओं और सहयोगियों को यह बताना भर है कि कांग्रेस के पास अब भी एक ब्रह्मास्त्र है। लेकिन जो भी हो, यह सच है कि कांग्रेस इन दिनों कठिन दौर से गुजर रही है। डॉ मनमोहन सिंह के कमजोर नेतृत्व और पार्टी में उपाध्यक्ष से अधिक जिम्मेदारी लेने से राहुल के इन्कार की वजह से नेतृत्व में जो शून्यता उभरी है, उसी वजह से नरेंद्र मोदी और आम आदमी पार्टी जैसे कारकों को उभरने का मौका मिला है।
आम आदमी पार्टी दिल्ली में मिली जीत के बाद देश-भर में अपना प्रयोग करने को तैयार दिख रही है। दिल्ली के अलावा पार्टी की नजर उत्तर प्रदेश, बिहार और हरियाणा पर है। आप की गुजरात इकाई ने भी राज्य की सभी 26 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला लिया है। शहरी सीटों की वजह से बिहार और उत्तर प्रदेश में गुजरात के 'लौहपुरुष' को विकल्प के रूप में देखा जा रहा था, लेकिन अब फ्लोटिंग वोटर (जो किसी खास दल से बंधे नहीं होते, हालात देखकर अपने मत का निर्णय लेते हैं) आप को एक विकल्प के रूप में देख रहा है।
लिहाजा चिंतित भाजपा 'एक वोट, एक नोट' अभियान शुरू कर परिवर्तन लाने का प्रयास कर रही है। बतौर राजनीतिक पार्टी आप का जो भी भविष्य होगा, इसने स्थापित राजनीतिक दलों को अपनी कार्यप्रणाली बदलने को बाध्य कर दिया है। इस आशंका से कि कहीं मध्यवर्ग का साथ न छूट जाए, भाजपा आप को 'वोट काटने' वाली ऐसी पार्टी बता रही है, जो केंद्र में 'राजनीतिक अस्थिरता' ला सकती है।
वैसे अगर भाजपा लोकसभा चुनाव में 230-240 सीट तक पहुंच जाती है, तो तस्वीर बदल सकती है और इसका श्रेय मोदी को दिया जाएगा। लेकिन अगर आप 30-40 सीट भी जीतती है या उसकी वजह से भाजपा के वोट कटते हैं और कोई अन्य चुनाव जीतता है, तो भाजपा जैसी कल्पना कर रही है, 16वीं लोकसभा चुनाव की तस्वीर उससे अलग होगी। ऐसे में संभव है कि आप की नई चुनौतियों के मद्देनजर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भाजपा और मोदी को अपनी रणनीतियों में रद्दोबदल करने का दबाव बढ़ा दिया हो।
बहरहाल, आप के योगेंद्र यादव ने प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के तौर पर केजरीवाल का नाम आगे किया है, हालांकि वह खुद इससे इन्कार कर रहे हैं। लेकिन 1987-89 में विश्वनाथ प्रताप सिंह भी तो इसी तरह उभरे थे। केजरीवाल काम करने की जल्दबाजी में हैं, जिसमें कुछ गलतियां भी कर रहे हैं। लेकिन यह स्पष्ट है कि 2014 के आम चुनाव इन तीनों के इर्द-गिर्द होने जा रहा है।