राजकुमार सिद्धार्थ माता-पिता और महल का त्याग करने के वर्षों बाद महात्मा के रूप में कपिलवस्तु पहुंचे। उनके वहां पहुंचते ही यह समाचार फैल गया कि जो राजकुमार कभी सज्जित रथों पर सवार होकर निकला करता था, आज भिक्षा मांगता घूम रहा है।
बुद्ध के दर्शन के लिए नगर के लोग आने लगे। बुद्ध के पिता स्वयं महल से बाहर निकले और पुत्र को गले से लगाया। वह उन्हें आदर सहित महल में ले गए और उन्हें उच्चासन पर बैठने को कहा।
बुद्ध ने कहा, मैं आपका पुत्र हूं। आपके सामने उच्चासन पर कैसे बैठ सकता हूं? फिर अचानक उन्होंने कहा, महाराज, यह तो आप जानते ही हैं कि प्राचीन प्रथा के अनुसार पुत्र जब बाहर जाता है और कुछ अर्जित कर लौटता है, तो उसमें से सबसे बहुमूल्य रत्न अपने पिता को सौंपता है। आज्ञा दें, तो मैं अपना अर्जित कोष आपके चरणों में उपस्थित कर दूं।
उन्होंने आगे कहा, जो कोष मैं यहां उपस्थित कर रहा हूं, वह सांसारिक क्षणिक वस्तुओं का नहीं है। यह शाश्वत ज्ञान का कोष है। यह कहकर उन्होंने वहां सत्य, अहिंसा, सदाचार का उपदेश सुनाया, तो सभी उस अलौकिक धर्मज्ञान-संपदा को पाकर कृतकृत्य हो उठे। उस अनूठी ज्ञान-संपदा से राजा के हृदय को पहली बार संतोष और शांति प्राप्त हुई। इसके बाद पूरा परिवार ही सांसारिक सुख-संपत्ति का परित्याग कर धर्मप्रचार में संलग्न हो गया।