किसी कार्य के सार्थक होने के लिए जरूरी है कि किसी लक्ष्य में भी उसकी भागीदारी हो, जो काम करने वाले व्यक्ति को खुद से बड़ी चीज से जोड़ता हो।
हम सभी काम करते हैं। कुछ भाग्यशालियों को छोड़ दें, तो ज्यादातर लोग अपनी जिंदगी का बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा काम करते हुए ही बिताते हैं। अगर यह सच है, तो क्या आपको नहीं लगता कि हम सभी को इन कामों को अर्थपूर्ण बनाने के बारे में सोचना चाहिए। 2019 में इसे लेकर एक कंपनी में शोध किया गया, जिसमें 82 फीसदी लोगों ने यह स्वीकारा कि उनके काम का एक उद्देश्य होना चाहिए और सार्थक कार्य उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता में आना चाहिए। लेकिन सवाल यह है कि आखिर वह क्या चीज है, जो किसी काम को ‘सार्थक’ बनाती है? क्या यह बस लोगों की सोच है, जो मनोवैज्ञानिक तौर किसी काम को सार्थक मान लेती है या फिर, किसी काम के सार्थक होने की कुछ अलग कसौटियां हैं?
सिसिफस का यूनानी मिथक
इन सवालों का जवाब देने के लिए हमें यह सोचना होगा कि आखिर वह क्या है, जो किसी काम को अर्थहीन बनाता है। अब जरा सिसिफस के यूनानी मिथक को ही ले लीजिए, जिसे दुव्यर्ववहार के लिए सजा के तौर पर एक बड़ी चट्टान या गोल पत्थर को पहाड़ पर चढ़ाने के लिए कहा गया था, ताकि चोटी पर पहुंचने से ठीक पहले वह लुढ़ककर नीचे आ जाए। इसके बाद वह नीचे आता था और फिर उस पत्थर को धक्का देकर ऊपर चढ़ाता था। यह प्रक्रिया उसने बार-बार दोहराई। आज हम श्रमसाध्य और निरर्थक कार्यों को सिसिफियन कहते हैं। इस तरह के सिसिफियन काम करने वाले आज बहुत हैं और वह समझ सकते हैं कि ऐसे काम कितने कष्टकारी होते हैं।
फ्योदोर दोस्तोवस्की समझते थे
फ्योदोर दोस्तोयेव्स्की निश्चित रूप से इसे समझते थे। इस उपन्यासकार ने श्रमिकों के शिविर के अपने व्यक्तिगत अनुभव को कुछ हद तक यों स्पष्ट किया, 'यदि कोई किसी व्यक्ति को पूरी तरह से कुचलना और नष्ट करना चाहता है, तो उसे बस इतना करना होगा कि वह उस व्यक्ति से ऐसा काम करवाए, जो पूरी तरह से अनुपयोगी और निरर्थक हो। हालांकि लोग मान सकते हैं कि इस तरह के सिसिफियन कार्य सार्थक हो सकते हैं (शायद यही एक चीज है, जो इसे सहने योग्य बनाती है), लेकिन क्या सिर्फ यह विश्वास ही इसे सार्थक बनाने के लिए पर्याप्त है? कई दार्शनिक ऐसा नहीं सोचते। इसके बजाय वे तर्क देते हैं कि किसी कार्य के सार्थक होने के लिए जरूरी है कि किसी लक्ष्य में भी उसकी भागीदारी हो, जो काम करने वाले व्यक्ति को खुद से बड़ी चीज से जोड़ता हो। जैसा कि अमेरिकी दार्शनिक सुसान वुल्फ कहती हैं कि काम के अर्थ को समझने के लिए उसे सिर्फ अपने नहीं, बल्कि दूसरों के नजरिये से समझना भी जरूरी होता है।
चीजों को व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखें
काम को सार्थक बनाने के लिए व्यक्ति को एक बड़े ढांचे में खुद को देखना होता है। एक व्यापक उद्देश्य के संदर्भ में चीजों का आकलन करना होता है। आप खुद से पूछ सकते हैं कि क्या आप अपने काम से कुछ सकारात्मक बदलाव ला रहे हैं? क्या आपका काम उपयोगी है, और क्या यह दूसरों के जीवन को चलाने में उनकी मदद करता है? इन सवालों के जवाब आत्मविश्वास से ‘हां’ में देना आपके काम को समाज के व्यापक संदर्भ में रखता है। सिसिफियन कार्य स्पष्ट रूप से सामाजिक योगदान के इस मानक के हिसाब से विफल रहता है, इसलिए यह सार्थक नहीं हो सकता है।
लेजी गर्ल्स जॉब्स
कुछ अध्ययनों के मुताबिक, आधुनिक अर्थव्यवस्थाओं में ऐसे काम की आश्चर्यजनक रूप से भरमार है। हाल ही में ‘लेजी गर्ल जॉब्स’ और ‘फेक ई-मेल जॉब्स’ के प्रति बढ़ते रुझान से पता चलता है कि कुछ युवा वाकई ऐसी ही नौकरियों की तलाश करते हैं, ताकि ऑफिस के काम और अपनी निजी जिंदगी में संतुलन रखा जा सके।
दूसरे को हानि न पहुंचे
मेरे कहने का मतलब यह है कि अगर कोई कार्य दूसरों की मदद करने के बजाय उन्हें नुकसान पहुंचाता हो, तो वह सार्थक कार्य नहीं हो सकता है। उदाहरण के लिए, इरादतन खराब उत्पादों को बाजार में बेचना, या ऐसे क्षेत्रों में काम करना, जिससे पर्यावरणीय संकट उत्पन्न हो या उससे जुड़े नुकसान हों। क्लाइमेट क्विटिंग (पर्यावरणीय कारणों से नौकरी या नियोक्ता को छोड़ना) की घटना को लोगों द्वारा सार्थक काम करने की इच्छा से नौकरी छोड़ने के निर्णय के नतीजे के रूप में देखा जा सकता है। ये उदाहरण बताते हैं कि नौकरी सिर्फ इसलिए सार्थक नहीं होती कि यह अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने में योगदान देती है।
बाजार और समाज
जब बाजार मूल्य और सामाजिक मूल्य एक-दूसरे से टकराते हैं (मसलन, सुपरमार्केट में काम करने से लोगों का पेट भरने में मदद मिलती है), ये दो तरह के मूल्य हैं, जो अलग-अलग हो सकते हैं। हमें इस बारे में सोचना चाहिए कि हमारे काम से किसे लाभ पहुंच रहा है। क्या यह लाभ दूसरों को नुकसान पहुंचाने की कीमत पर मिलता है, और क्या हमारे काम से अनपेक्षित नकारात्मक परिणाम की आशंका है।
संगठनों में सार्थक काम
सकारात्मक योगदान या दूसरों को नुकसान न पहुंचाने के अलावा, काम तब भी सार्थक नहीं होगा, जब तक कि आप अपने योगदान को स्पष्ट रूप से महसूस न करें। यह विशेष रूप से उन लोगों के लिए प्रासंगिक है, जो बड़ी कंपनियों या संगठनों में नौकरी करते हैं। ज्यादातर कंपनियां साधारण कर्मचारियों को बड़े निर्णयों में शामिल नहीं करतीं, जो इस बात को दर्शाता है कि कंपनी समाज में कैसे काम करती है (जैसे-किन उत्पादों का उत्पादन किया जाए, कौन-सी सेवा पेश की जाए या किन बाजारों में काम करें आदि से संबंधित निर्णय)। यह प्रबंधकों और अधिकारियों तक ही सीमित रहता है। नतीजतन कर्मचारी आसानी से अपने काम में निहित सामाजिक योगदान से अलग हो सकते हैं, जिससे यह उनके लिए सार्थक नहीं हो पाता। अधिक लोगों के लिए काम को ज्यादा सार्थक बनाने के लिए यह सोचना होगा कि बड़े संगठन इस प्रकार के निर्णयों में कर्मचारियों को अधिक लोकतांत्रिक तरीके से कैसे शामिल कर सकते हैं? इसका मतलब यह हो सकता है कि कर्मचारियों को रणनीतिक निर्णयों पर वीटो करने का अधिकार दिया जाए। कंपनी बोर्डों में कर्मचारी प्रतिनिधियों को रखा जाए, यहां तक कि कंपनी को एक श्रमिक सहकारी समिति में बदला जाए।
सिसिफियन टास्क
सिसिफियन किसी कार्य को अंतहीन और निरर्थक रूप में वर्णित करता है, जो कभी पूरा नहीं होता है। यह शब्द यूनानी (ग्रीक) पौराणिक कथाओं के एक पात्र सिसिफस से आया है, जिसे खड़ी पहाड़ी पर लगातार एक गोल चट्टान को ऊपर ले जाने की सजा दी गई थी।
क्लाइमेट क्विटिंग
दुबई में हुए जलवायु शिखर सम्मेलन में क्लाइमेट क्विटिंग की अवधारणा पर ध्यान दिया गया। इसका तात्पर्य पर्यावरणीय स्थिरता में सक्रिय योगदान देने वाले कॅरिअर को आगे बढ़ाने के लिए अपनी वर्तमान नौकरियों से इस्तीफा देने की उभरती प्रवृत्ति से है।