वैश्विक कहानी से परे भारत की समस्याएं काफी हद तक भारतीय प्रकृति की हैं। भारत एक बार फिर उस दोराहे पर आ खड़ा हुआ है, जहां उसे राजनीति को किनारे रखकर भविष्य की योजना बनानी होगी। हाल में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर में गिरावट को एक बार का विपथन मान कर नजरअंदाज किया जा सकता है। इसकी वजह यह है कि मांग में कमी जरूर आई है, लेकिन बाजार के आकार को लेकर कोई संदेह नहीं है। बीते नवंबर तक भारतीयों ने हर घंटे 500 से ज्यादा कारें और 2,000 दोपहिया वाहन खरीदे। इसी अवधि में भारतीय करीब सात करोड़ मोबाइल फोन खरीद चुके हैं, जिसके साल के अंत तक 15 करोड़ तक पहुंचने की उम्मीद है। इस साल भारत में करीब 800 टन सोना आयात होने की भी उम्मीद है।
स्पष्ट है कि भारत वैश्विक चुनौतियों का सामना तभी कर सकता है, जब वह अपनी विशाल आबादी का लाभ उठाए और अर्थव्यवस्था को आत्मनिर्भर बनाए। आंकड़े कुछ भी कहें, लेकिन वास्तविकता यही है कि देश में असमानता बढ़ी है और राजनीतिक वर्ग भी इससे भली-भांति परिचित है। मनरेगा पर 80 हजार करोड़ रुपये से अधिक का आवंटन, ढाई लाख करोड़ रुपये से अधिक की लागत से 81 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन, दो लाख करोड़ रुपये से अधिक की लागत से महिलाओं को नकद लाभ हस्तांतरण, ये सभी संकट के संकेत हैं। दरअसल, अभी कुछ ही समय पूर्व भारतीय रिजर्व बैंक ने राज्यों की सब्सिडी के 4.7 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने को लेकर आगाह भी किया था। देश में मौजूदा मंदी काफी हद तक खाद्य मूल्य मुद्रास्फीति का ही प्रभाव है। खराब रिटर्न की वजह से कृषि घरेलू आय 12 हजार रुपये प्रतिमाह बनी हुई है और उपलब्धता भी प्रभावित हुई है, जिससे वस्तुओं व सेवाओं की मांग व खपत पर भी असर पड़ा है।
1950 के दशक में जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि हर चीज इंतजार कर सकती है, पर खेती नहीं। लेकिन तथ्य यह है कि पिछले सात दशकों में राजनीतिक दलों ने कृषि को राजनीतिक दान का मामला बना दिया है। कृषि और संबद्ध गतिविधियों में लगा देश का 54 फीसदी से ज्यादा कार्यबल जीवीए के 18 फीसदी पर निर्भर है और यही वह मूल कारण है, जिसकी वजह से गरीबी खत्म होने का नाम नहीं लेती। जाहिर है कि भारत को अपनी कृषि को स्वतंत्र व आधुनिक बनाने की जरूरत है।
2024 के बजट में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने विकसित भारत का रोडमैप पेश किया, जिसमें उन्होंने अंतरालों, अवसरों व चुनौतियों की बात की। यह योजना राज्य सरकारों के सहयोगात्मक प्रयास पर भी निर्भर थी। लेकिन 13 राज्यों की सरकारें पूंजीगत व्यय के लक्ष्य को पूरा नहीं कर पाईं। एनटी रामा राव ने 1980 के दशक में जिस राजनीतिक और आर्थिक तथ्य पर प्रकाश डाला वह यह था कि भारत का हर इंच राज्यों द्वारा शासित है। केंद्र के प्रत्येक कार्यक्रम को राज्यों द्वारा क्रियान्वित किया जाना होता है। लेकिन संसदीय समितियों की रिपोर्ट वाटरशेड प्रबंधन, खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों की स्थापना, कृषि प्रसंस्करण के लिए पीएलआई योजना को आगे बढ़ाने, प्लास्टिक पार्क योजना के तहत विनिर्माण नौकरियों के सृजन और प्रशिक्षुओं को बढ़ावा देने में राज्यों के खराब प्रदर्शन का खुलासा करती है।
यह सच है कि बदलती भू-राजनीति के चलते भारत को विनिर्माण व सेवाओं के लिए निवेश आकर्षित करने का मौका मिलता है। लेकिन इसके लिए राज्य सरकारों को भी सचेत होने की जरूरत है। विकास के लिए उत्पादकता के कारक- भूमि व श्रम कानून, पूरी तरह से राज्य सरकारों के अधीन हैं। तथ्य यह भी है कि 2019 के नए श्रम कोड को अभी भी अपनाया जाना बाकी है। अवांतिस रेगटेक के मुख्य कार्यकारी अधिकारी ऋषि अग्रवाल कहते हैं, ‘उद्यमियों को 1,536 कानूनों, 69,233 अनुपालनों, फाइलिंग की 6,618 प्रक्रियाओं से निपटना होता है।’ हर दूसरे वर्ष राज्य निवेश शिखर सम्मेलन आयोजित करते हैं, लेकिन कामयाबी के लिए जरूरी है कि मुख्यमंत्री, मंत्री, विधायक और सांसद सुधारों व वादों पर अमल करें।
भारत की समस्याओं का समाधान हमेशा भारतीयों द्वारा किया गया है और समाधान भी भारतीय प्रकृति के रहे हैं। संकटों से मिली प्रेरणा ही देश में बदलावों को प्रेरित करती है। वर्गीज कुरियन द्वारा स्थापित राष्ट्रीय ग्रिड की बदौलत भारत दुनिया का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक देश बना। लाल बहादुर शास्त्री और सी सुब्रमण्यम द्वारा प्रेरित हरित क्रांति की बदौलत भारत खाद्यान्नों का सबसे बड़ा उत्पादक बना। राजनीतिक और आर्थिक संकटों के बीच भारत ने 1991 में उदारीकरण को अपनाया। कल्याणकारी योजनाओं में भ्रष्टाचार व रिसाव ने आधार को जन्म दिया। आज आधार, जनधन और यूपीआई की त्रिवेणी ने देश में लोगों की जिंदगियों को बदला है, तो पूरी दुनिया की नजर भी इन पर है। हॉलीवुड ने ग्रेविटी नामक फिल्म के निर्माण में जितना पैसा लगाया, जो राष्ट्र उससे भी कम बजट में मंगल मिशन लॉन्च कर दे, वह मितव्ययी अर्थशास्त्र के आधार पर समाधानों को जन्म दे सकता है। दरअसल, समस्या क्षमता में नहीं, बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति में है। सबसे पहले राष्ट्रीय विकास परिषद को पुनर्जीवित करना चाहिए। वित्त आयोग को परिणाम आधारित अनुदान शुरू करने चाहिए। भारत की अर्थव्यवस्था संरचनात्मक संकट का सामना कर रही है। वर्षों से देश के राजनीतिक वर्ग ने कमजोर सुधारों के लिए एक मजबूत आम सहमति बनाने के प्रयास किए हैं। विकसित भारत के सपने को पूरा करने के लिए इस आम सहमति को तोड़ने की जरूरत है।