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बड़े काम की यूरोपीय संघ से दोस्ती

रंजीत कुमार Updated Tue, 27 Nov 2018 07:19 PM IST
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रंजीत कुमार

सत्ताइस यूरोपीय देशों के संगठन यूरोपीय संघ (ईयू) की पहचान कुछ वर्षों बाद केवल आर्थिक ताकत के तौर पर ही नहीं रहेगी, बल्कि वह सामरिक और रक्षा मामलों में एक स्वतंत्र ताकत के तौर पर भी उभरेगा। जिस तरह से अमेरिका ने यूरोपीय सुरक्षा से हाथ खींचना शुरू किया है और यूरोपीय देशों से कहा है कि अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी खुद उठाएं, यूरोपीय संघ ने खुद के सामरिक हितों की रक्षा के लिए अपने सदस्य देशों से अपनी सैनिक ताकत को एकजुट करने और एशिया में अपने हितों की रक्षा के लिए भारत के साथ साझेदारी की रणनीति मंजूर की है, जो भारत के लिए काफी अहमियत रखती है। यूरोपीय संघ के देश सैन्य और परमाणु ताकत भी हैं, इसलिए यूरोपीय संघ भविष्य में अमेरिका, रूस और चीन के मुकाबले एक स्वतंत्र सैन्य ताकत के तौर पर भी खड़ा हो सकता है।



इसी आलोक में आज की बहुध्रुवीय दुनिया में अपने राष्ट्रीय हितों की पूर्ति के लिए कई ताकतों के साथ रिश्तों को संतुलित कर चलना भारत के लिए काफी अहम हो गया है। जिस तरह अमेरिका ने बाकी दुनिया के साथ अपने रिश्तों को अपने राष्ट्रीय हितों के नजरिये से विकसित करना शुरू किया है और कई अंतरराष्ट्रीय संधियों को तोड़ते हुए अपनी आर्थिक और सैनिक ताकत का धौंस दिखाना शुरू किया है और दूसरी ओर जिस तरह रूस ने भारत के साथ रिश्तों की परवाह नहीं करते हुए भारत के प्रतिद्वंद्वी देशों चीन औऱ पाकिस्तान के साथ रिश्ते बनाने शुरू किए हैं, उसके मद्देनजर भारत को बाकी दुनिया, खासकर यूरोपीय संघ के साथ अपने रिश्तों को आगे बढ़ाना होगा।


ऐसे जटिल विश्व माहौल में भारत के लिए यह सुकून वाली बात है कि यूरोपीय संघ ने उसके साथ अपनी रणनीति की नए सिरे से व्याख्या की है। विगत 21 नवंबर को यूरोपीय संघ के मुख्यालय ब्रसेल्स में यूरोपीय आयोग ने जिस तरह एक बयान जारी कर भारत को लेकर नई दृष्टि पारिभाषित की है, भारत में उसका स्वागत किया जाना चाहिए और यूरोपीय देशों के शक्तिशाली संगठन के साथ अपने रिश्तों को और गहरा बनाने की कोशिश करनी चाहिए। 125 अरब यूरो के सालाना आपसी व्यापार से यूरोपीय संघ पहले ही भारत का सबसे बड़ा आर्थिक साझेदार बन चुका है और अब सामरिक क्षेत्र में भी एक अहम साझेदार बनने की गुंजाइश देखी जा रही है।


यूरोपीय संघ ने भारत को लेकर अपनी ताजा रणनीति में कहा है कि वह भारत के साथ ऐसे सैन्य रिश्ते बनाना चाहता है, जिससे हिंद महासागर में शांति व स्थिरता सुनिश्चित की जा सके। भारत भी यही चाहता है, क्योंकि यह भारत का आंगन है, जहां किसी बाहरी ताकत द्वारा डेरा डालना भारत के दीर्घकालीन समुद्री हितों पर आंच डाल सकता है। हिंद महासागर में केवल समुद्री डाकूओं की वजह से ही शांति व स्थिरता को खतरा नहीं पहुंचता है, बल्कि जिस तरह चीन ने हिंद महासागर के द्वीपों पर अपने पांव जमाने की रणनीति को अंजाम देना शुरू किया है, वह खतरे की घंटी है। हाल के दिनों में हमने देखा है कि किस तरह चीन ने मालदीव ,श्रीलंका औऱ सेशल्स में अपनी मौजूदगी बनाई है और इस समुद्री इलाके के बाकी द्वीप देशों मॉरीशस, मैडगास्कर आदि पर भी उसकी तिरछी नजरें हैं।


हालांकि भारत चार देशों के गुट (क्वाड) में  अमेरिका, जापान और आस्ट्रेलिया के साथ है और इसके इरादे भी हिंद और प्रशांत महासागरों में चीन की विस्तारवादी रणनीति पर अंकुश लगाना है। भारत को यदि उसके सामरिक साझेदार यूरोपीय संघ की ओर से यह संदेश मिला है कि वह हिंद महासागर में सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए भारत के साथ सैन्य रिश्ता बनाना चाहता है, तो यह न केवल आर्थिक और सैन्य ताकत की मान्यता है, बल्कि इससे भारत के सामरिक और समुद्री हितों की भी रक्षा होगी।

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