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आसियान से दोस्ती पूर्वोत्तर के लिए वरदान

Tue, 19 Feb 2013 09:24 PM IST
तरुण विजय
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नई दिल्ली में आज खत्म हो रहे पूर्वी-एशिया संवाद को अगर देश की सामरिक और आर्थिक कूटनीति का महत्वपूर्ण पड़ाव कहें, तो गलत नहीं। अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के क्षेत्र में दिल्ली संवाद भारत का शेष विश्व को एक कड़ा संदेश है। दरअसल पूर्वी एशिया विश्व की सर्वाधिक सशक्त अर्थव्यवस्था और सामरिक महत्व का क्षेत्र है, जहां हमारे हित अनिवार्य रूप से जुड़े हैं।
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न केवल सड़क और हवाई मार्गों में आसियान के 11 देशों का पारस्परिक जुड़ाव भविष्य के लिए एक अनिवार्यता बन गई है, बल्कि जितनी जल्दी क्षेत्रीय मार्गों को खोला जाना संभव हो सकता है, उतनी ही गति से भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र का विकास एवं दक्षिण-पूर्व एशिया और पूर्वी एशिया में चीन के बढ़ते प्रभाव को नियंत्रित करना संभव होगा।

भारत का आसियान क्षेत्र में प्रवेश थोड़ा विलंब से भले हुआ हो, लेकिन धीरे-धीरे उसने आसियान देशों से मैत्री संबंध काफी विस्तृत किए हैं। मेकांग-भारत आर्थिक गलियारे, थाइलैंड-म्यांमार तथा भारत को जोड़ने वाला त्रिदेशीय राजमार्ग, आसियान राजमार्ग नेटवर्क जलीय यातायात के लिए यांगोन, सित्वे और चेन्नई का चिह्नित होना आदि योजनाओं के साथ ही भारत को वियतनाम के हो ची मिन्ह नगर से जोड़ने वाला विराट रेलमार्ग का निर्माण, जो संपूर्ण हिंदी-चीनी क्षेत्र से होकर गुजरेगा, हमारी महत्वाकांक्षी दृष्टि का एक आत्मविश्वासी परिचय देता है।
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यूरोपीय संघ की तरह आसियान देशों का एक वैमानिक बाजार (आसियान सिंगल एविएशन मार्केट-असम) पर भी काम शुरू हो चुका है। विशाल राजमार्गों को जोड़ने की दिशा में सिंगापुर की चिंयागमाई, कोलकाता, ढाका और कुनमिंग (चीन) को जोड़ते हुए यांगोन और मांडले को भी साथ में जोड़ना भविष्य की रोमांचकारी योजनाएं हैं।

वास्तव में पूर्वी एशिया के साथ संबंधों का विस्तार हमारे पूर्वोत्तर के लिए एक वरदान युक्त भाग्योदय का भरोसा दिलाता है। आर्थिक विकास का झोंका आते ही वहां के विद्रोही और अलगाववादी संगठनों के प्रभाव को कम करने में मदद मिलेगी। ईरान तथा कजाकिस्तान की अपेक्षा हमारी ऊर्जा सुरक्षा के लिए म्यांमार, वियतनाम और मलयेशिया अधिक व्यावहारिक और भरोसेमंद सिद्ध होंगे।

वैसे हमारे प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह की पूर्वी एशिया क्षेत्र में कुछ अधिक ही रुचि रही है और यदि यह कहा जाए कि उनकी इस क्षेत्र के देशों में लगातार यात्राओं के कारण काफी बड़ी संख्या में प्रकल्प शुरू हुए हैं, तो यह उचित ही होगा। एक ओर चीन अपने सागर तटीय व्यापार को बढ़ाने के लिए 34 हजार किलोमीटर लंबी रेल लाइन बसाकर यूरोप के हृदय स्थल तक पहुंचा है और कोलकाता के ठीक ऊपर चीन के औद्योगिक नगर कुनमिंग से सिंगापुर तक रेल लाइन लगभग तैयार होने को है, वहीं भारत घरेलू राजनीति के भंवर से कुछ ऊपर उठते हुए सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण और संवेदनशील पूर्वी एशिया क्षेत्र में विकास के प्रकल्प को किसी तरह पूरा करने का प्रयास कर रहा है।

भारत का आसियान देशों के साथ वर्तमान व्यापार स्तर कुल वैश्विक व्यापार का केवल दस फीसदी है, जिसे अगले बीस वर्षों में 30 से 35 फीसदी तक ले जाने की आवश्यकता होगी। वर्ष 2011-12 में भारत का आसियान देशों के साथ व्यापार 79.3 अरब डॉलर था, जो अकेले चीन के साथ भारत के व्यापार की तुलना में भी कम है। आसियान देशों का चीन के साथ व्यापार 362.8 अरब डॉलर तक पहुंचा है, जबकि भारत अगले दस वर्षों में आसियान के साथ अपना व्यापार 200 अरब डॉलर तक ले जाने का सपना संजोए हुए है।

भारत के पूर्वोत्तर तथा पूर्वी देशों के बीच सरहदी बाजार, विश्वविद्यालयों के मध्य संबंध, संयुक्त व्यापार एवं पूंजी निवेश फोरम और विशेषकर म्यांमार के साथ भारत-म्यांमार सीमा क्षेत्र विकास और समझौते उल्लखनीय हैं। इस दिशा में आसियान देशों के साथ कई करार हो चुके हैं। इन देशों के आम लोगों के साथ हमारी मित्रता का संदेश पहुंचाने के लिए गत वर्ष नवंबर-दिसंबर में आसियान-भारत कार रैली का आयोजन एक मील का पत्थर माना गया। इस पृष्ठभूमि में दिल्ली का यह संवाद वास्तव में शेष विश्व को भारत का एक सशक्त संदेश है।
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