इस साझेदारी के तहत सहयोग के 21 प्रमुख क्षेत्रों की पहचान की गई है, जिनमें रक्षा, एआई, ऊर्जा, शिक्षा, अंतरिक्ष और महत्वपूर्ण खनिज शामिल हैं। दोहरे कराधान से बचाव समझौते के प्रोटोकॉल संशोधन पर भी दोनों देशों ने हस्ताक्षर किए हैं। वैश्विक परिप्रेक्ष्य में देखें, तो बढ़ती भू-राजनीतिक अस्थिरता, यूक्रेन संकट और हिंद-प्रशांत में चीन की आक्रामकता के बीच भारत और फ्रांस के बीच यह साझेदारी एक नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को मजबूत करने का महत्वपूर्ण प्रयास है।
गौरतलब है कि 2017 में फ्रांस के राष्ट्रपति का पद संभालने के बाद से मैक्रों की यह चौथी भारत यात्रा है, जो प्रधानमंत्री मोदी के साथ उनके व्यक्तिगत तालमेल को भी दिखाती है। इसके अतिरिक्त, बीती जनवरी में जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज की यात्रा, इस वर्ष गणतंत्र दिवस में यूरोपीय संघ के नेतृत्व की मौजूदगी और उससे पहले अरसे से लंबित मुक्त व्यापार समझौते पर सहमति, ये सभी बिंदु भारत के रणनीतिक विजन में यूरोप के बढ़ रहे महत्व को इंगित करते हैं।
उल्लेखनीय है कि नई दिल्ली की तरह, पेरिस भी लंबे समय से बहुध्रुवीय दुनिया की वकालत करता आया है और यही साझा मूल्य दोनों देशों के बीच गहरे संबंधों का आधार बना हुआ है। हालांकि, इस साझेदारी को कामयाब बनाने के लिए रक्षा सौदों में पारदर्शिता और तकनीकी हस्तांतरण सुनिश्चित करना अहम है। इसके अलावा, जलवायु लक्ष्यों को पाने के लिए फ्रांस की हरित ऊर्जा विशेषज्ञता का फायदा उठाते हुए भारत को अपनी नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता बढ़ानी चाहिए।
उसे अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखते हुए बहुपक्षीय संबंधों में संतुलन साधना होगा, वहीं फ्रांस के लिए जरूरी है कि वह, जैसा कि उसने घोषणा भी की है, भारत को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अधिक सक्रिय समर्थन प्रदान करे। कुल मिलाकर, मैक्रों की भारत यात्रा का महत्व सिर्फ द्विपक्षीय गर्मजोशी के लिहाज से नहीं, बल्कि इस रूप में भी है कि बदलती भू-राजनीति के दौर में भारत व फ्रांस ने अमेरिका और चीन से अलग एक तीसरी दिशा के समर्थक के रूप में खुद को प्रस्तुत किया है।